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शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

आहार 'संपादकीय'

आहार    'संपादकीय'
शाकाहार की एक अत्यंत तार्किक परिभाषा यह है कि शाकाहार में वे सभी चीजें शामिल हैं जो वनस्पति आधारित हैं। पेड़-पौधों से मिलती हैं एवं पशुओं से मिलने वाली चीजें, जिनमें कोई प्राणी जन्म नहीं ले सकता जैसे दूध-घी आदि, इसके अतिरिक्त शाकाहार में और कोई चीज़ शामिल नहीं है। इस परिभाषा की मदद से शाकाहार का निर्धारण किया जा सकता है। 
उदाहरण के लिये दूध, शहद आदि से बच्चे नहीं होते जबकि अंडे जिसे कुछ तथाकथित बुद्धजीवी शाकाहारी कहते है, उनसे बच्चे जन्म लेते हैं। अतः अंडे मांसाहार है। प्याज़ और लहसुन शाकाहार हैं किन्तु ये बदबू करते हैं अतः इन्हें शुभकर्म और पूजा-उपासना के अवसरों पर प्रयोग नहीं किया जाता है। यदि कोई मनुष्य अनजाने में, भूलवश, गलती से या किसी के दबाव में आकर मांसाहार कर लेता है तो भी उसे शाकाहारी ही माना जाता है।
सनातन धर्म भी शाकाहार पर आधारित है। जैन धर्म भी शाकाहार का समर्थन करता है एवं जैन भोजन में जिमीकन्द आदि त्याजय है। सनातन धर्म के अनुयायी जिन्हें हिन्दू भी कहा जाता है वे शाकाहारी होते हैं। यदि कोई व्यक्ति खुद को हिन्दू बताता है किंतु मांसाहार करता है तो वह धार्मिक तथ्यों से (सनातन) हिन्दू नहीं रह जाता। अपना पेट भरने के लिए या महज़ जीभ के स्वाद के लिए किसी प्राणी की हत्या करना मनुष्यता कदापि नहीं हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त एक अवधारणा यह भी है कि शाकाहारियों में भोलापन और बीमारियों से लड़ने की क्षमता ज़्यादा होती है।
नैतिक, स्वास्थ्य, पर्यावरण, धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सौंदर्य, आर्थिक, या अन्य कारणों से शाकाहार को अपनाया जा सकता है। अनेक स्वादिष्ट, लाभदायक और गुणकारी शाकाहारी आहार हैं। एक लैक्टो-शाकाहारी आहार में दुग्ध उत्पाद शामिल हैं' लेकिन अंडे नहीं। एक ओवो-शाकाहारी के आहार में अंडे शामिल होते हैं लेकिन गोशाला उत्पाद नहीं और एक ओवो-लैक्टो शाकाहारी के आहार में अंडे और दुग्ध उत्पाद दोनों शामिल हैं। एक वेगन अर्थात अतिशुद्ध शाकाहारी आहार में कोई भी 'प्राणी' उत्पाद शामिल नहीं हैं, जैसे कि दुग्ध उत्पाद, अंडे और सामान्यतः शहद। अनेक वेगन प्राणी-व्युत्पन्न किसी अन्य उत्पादों से भी दूर रहने की चेष्टा करते हैं, जैसे कि कपड़े और सौंदर्य प्रसाधन (चमड़े के जूते अथवा बेल्ट)।
अर्द्ध-शाकाहारी भोजन में बड़े पैमाने पर शाकाहारी खाद्य पदार्थ हुआ करते हैं, लेकिन उनमें मछली या अंडे शामिल हो सकते हैं। या यदा-कदा कोई अन्य मांस भी हो सकता है। एक पेसेटेरियन आहार में मछली होती है, मगर मांस नहीं। 
जिनके भोजन में मछली और अंडे-मुर्गे होते हैं वे "मांस" को स्तनपायी के गोश्त के रूप में परिभाषित कर सकते हैं और खुद की पहचान शाकाहार के रूप में कर सकते हैं। हालाँकि, शाकाहारी सोसाइटी जैसे शाकाहारी समूह का कहना है कि जिस भोजन में मछली और पोल्ट्री उत्पाद शामिल हों, वो शाकाहारी नहीं है, क्योंकि मछली और पक्षी भी प्राणी हैं।
राधेश्याम 'निर्भयपुत्र'

रविवार, 5 मई 2024

सत्ता परिवर्तन 'संपादकीय'

सत्ता परिवर्तन  'संपादकीय' 

जीत का मंसूबा लेकर, हम हरेक बाज़ी हार गए। 
भारत में 143 शेष है, इंडिया वाले 400 पार गए।

देश में एक बड़े परिवर्तन की हवा चल रही है, नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का स्तर तेजी से गिर रहा है, वहीं विपक्ष के नेतृत्व का स्तर बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। पत्रकारिता के बड़े-बड़े चेहरो का भाव बदल गया है, देश और दुनिया का हाल बताने वालों के बोल बदल गए हैं। जिनकी जुबां भाजपा-भाजपा बोलते थकती नहीं थी, आज आप भी देख रहे हैं कि उनके हाल-चाल ही बदल गए हैं। 
सामान्य लोकसभा चुनाव के दो चरणों के चुनाव और समीकरण भाजपा के हित में नहीं दिख रहे हैं। जनता खुले मंच से अपने आत्मीय भाव प्रकट कर रही है। देश में महंगाई, बेरोजगारी और सत्ताधारी पार्टी के द्वारा किए गए निजीकरण की सच्चाई जनता के होठों पर मुखर हो गई है। मोदी के नेतृत्व में भाजपा के पीछे चलने वाली भीड़ तीतर-भीतर हो गई है। ढेर सारा रुपया खर्च करने के बाद भी भाजपा की रैलियों का आलम ऐसा हो गया है कि जैसे बिन दूल्हा बारात होती है। 'मुफ्त का राशन और घटिया भाषण' जनता को जंच नहीं रहा है। भाजपा के हालात पर तरस करने का भी कोई फायदा नहीं है। क्योंकि प्रकृति का एक ही नियम है परिवर्तन। जनता मन बना चुकी है और परिवर्तन के आसार भी दिखाई देने लगे हैं। 
इंडिया गठबंधन और कांग्रेस के राहुल व प्रियंका को बोलना आ गया है, जो कल तक पप्पू था आज राहुल बाबा हो गया है। इतना प्रारंभिक परिवर्तन जन भावना को परिवर्तित करने का काम कर रहा है। कांग्रेस 400 पार जाएगी या नहीं ? लेकिन भाजपा किनारे लग गई है। जिस प्रकार से चुनाव प्रचार में आरोप-प्रत्यारोप और घोषणाओं की खचापच हो गई है। ऐसा लगता है कि भाजपा के नेता विषय से भटक गये है। 
प्रधानमंत्री महिलाओं के मंगलसूत्र की चिंता कर रहे हैं। राहुल गांधी मनरेगा में दहाड़ी मजदूरों की दहाड़ी बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। राहुल की यात्रा उनकी मनोदशा का प्रमाण है, उनकी चिंता और लक्ष्य का कोई उदाहरण उनकी बढ़ती हुई दाढ़ी पर प्रतीत नहीं होता है। लेकिन उनका चुनावी समर रणक्षेत्र में शत्रु की रणनीति पर विशेष प्रभाव छोड़ रहा है। भाजपा की कूटनीति और राजनीति का रंग उनके सामने फीका पड़ रहा है। राहुल के पीछे जनता का स्नेह जन सैलाब बनाकर उफन रहा है। भाजपा का आत्मविश्वास और मनोबल धराशाई हो रहा है। एक पप्पू, एक दिन राहुल बाबा बन जाएगा। यह तो सत्तारुढ भाजपा ने सोचा ही नहीं था। परिणाम स्वरुप यह चुनाव भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं दे रहा है। 
राधेश्याम   'निर्भयपुत्र'

सोमवार, 8 जनवरी 2024

श्रीराम जन्मभूमि 'संपादकीय'

श्रीराम जन्मभूमि     'संपादकीय'

श्रीराम जी करेगें भाजपा की चुनावी नैया पार ? - खबरीलाल

पुनर्विकसित अयोध्या रेलवे स्टेशन का उद्घाटन व कई अन्य रेलवे परियोजनाओं व हवाई अड्डे की सौगात।

विनोद कुमार सिंह
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की भुमिका वैश्विक राजनीति की हमेशा ही रहा है। सन 2024 के आगमन के संग ही सूर्यदेव की दर्शन नही देने व कड़ाके की ठण्ड से देशवासी जुझ रहे है। वही दूसरी ओर भारतीय राजनीति व सता के गलियारों में सन 2024 होने वाते लोक सभा चुनाव के गरमी की चर्चा चहुँ दिशाओं हो रही है। सभी राजनीतिक दल चुनावी मैदान में अपनी अपनी रणनीति बनाने में व्यस्त है।
खासकर केन्द्र की भाजपा सरकार के अपने समस्त शक्तियों लगाकर पुनः सता के सिंघासन पर आसीन होना चाहती है। इसका सबसे बडा प्रमाण इसी माह के 22 जनवरी कोअयोध्या में भव्य नवर्निमित राम मंदिर उद्घाटन है। केद्र की भाजपा सरकार के लिए राम मंदिर निर्माण का श्रेय का सेहरा पहने के लिए कितना उतावली है। इससे लगाया जा सकता है कि बीते बर्ष के 27 दिनों के अन्दर प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी का तीन बार अयोध्या दौरे पर आना है। फिलहाल आप के मन अयोध्या के बारे में जानने उत्सुकता बडी गई होगी। आप के मन में कुछ प्रशन वह जिज्ञासा होगी कि आखिर अयोध्या में क्या है ? जो नरेन्द् मोदी को यहाँ आने के लिए विवस कर दिया है।
मै आप को परेशान ना करते हुए अयोध्या के बारे कुछ बताने का प्रयास कर रहा हूँ। बीते वर्ष 2023 के अन्तिम तीन दिनो तक मुझे भी अयोध्या को नजदीक से देखने का मौका स्वर्णिम अवसर मिला।भारत की प्राचीन नगरियों में से अयोध्या एक है। इसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में सप्त पुरियों इस प्रकार है-
अयोध्या,मथुरा,माया(हरिद्वार),काशी,कांची,अवंतिका(उज्जयिनी)और द्वारका में शामिल किया गया है। अयोध्या को अथर्ववेद में ईश्वर का नगर बताया गया है। स्कंदपुराण के अनुसार अयोध्या शब्द 'अ' कार ब्रह्मा,'य' कार विष्णु है तथा 'ध' कार रुद्र का स्वरूप है। अयोध्या नगरी में कई महान योद्धा,ऋषि-मुनि और अवतारी पुरुष हो चुके हैं। भगवान श्रीराम ने भी यहीं जन्म लिया था।वही जैन मत के अनुसार यहां आदिनाथ सहित 5 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था।अयोध्या की गणना भारत की प्राचीन सप्तपुरियों में प्रथम स्थान पर की गई है।जैन परंपरा के अनुसार भी 24 तीर्थंकरों में से 22 इक्ष्वाकु वंश के थे।इन 24 तीर्थंकरों में से भी सर्वप्रथम तीर्थंकरआदिनाथ(
ऋषभदेव जी) के साथ चार अन्य तीर्थंकरों का जन्मस्थान भी अयोध्या ही है। बौद्ध मान्यताओं के अनुसार बुद्ध देव ने अयोध्या अथवा साकेत में 16 वर्षों तक निवास किया था। अयोध्या नगरी की स्थापना सरयू नदी के तट पर बसे इस नगर की रामायण अनुसार विवस्वान(सूर्य)के पुत्र 
वैवस्वत मनु महाराज द्वारा स्थापना की गई थी।माथुरों के इतिहास के अनुसार वैवस्वत मनु लगभग 6673 ईसा पूर्व हुए थे। ब्रह्माजी के पुत्र मरीचि से कश्यप का जन्म हुआ। कश्यप से विवस्वान और विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु थे। वैवस्वत मनु के10 पुत्र-इल,इक्ष्वाकु,कुशनाम,अरिष्ट,धृष्ट,नरिष्यन्त,करुष,महाबली, शर्याति और पृषध थे।इसमें इक्ष्वाकु कुल का ही ज्यादा विस्तार हुआ। इक्ष्वाकु कुल में कई महान प्रतापी राजा,ऋषि,अरिहंत और भगवान हुए हैं। इक्ष्वाकु कुल में ही आगे चलकर प्रभु श्रीराम हुए। अयोध्या पर महाभारत काल तक इसी वंश के लोगों का शासन रहा। पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा से जब मनु ने अपने लिए एक नगर के निर्माण की बात कही तो वे उन्हें विष्णुजी के पास ले गए।विष्णुजी ने उन्हें साकेत
धाम में एक उपयुक्त स्थान बताया। विष्णुजी ने इस नगरी को बसाने के लिए ब्रह्मा तथा मनु के साथ देवशिल्‍पी विश्‍वकर्मा को भेज दिया। इसके अलावा अपने रामावतार के लिए उपयुक्‍त स्‍थान ढूंढने के लिए महर्षि वशिष्‍ठ को भी उनके साथ भेजा। मान्‍यता है कि वशिष्‍ठ द्वारा सरयू नदी के तट पर लीलाभूमि का चयन किया गया,जहां विश्‍वकर्मा ने नगर का निर्माण किया।स्‍कंदपुराण के अनुसार अयोध्‍या भगवान विष्‍णु के चक्र पर विराजमान है। उत्तर भारत के तमाम हिस्सों में जैसे कौशल,कपिलवस्तु,वैशाली
 और मिथिला आदि में अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश के शासकों ने ही राज्य कायम किए थे। अयोध्या और प्रतिष्ठानपुर(झूंसी)के इतिहास का उद्गम ब्रह्माजी के मानस पुत्र मनु से ही सम्बद्ध है। जैसे प्रतिष्ठानपुर और यहां के चंद्रवंशी शासकों की स्थापना मनु के पुत्र ऐल से जुड़ी है,जिसे शिव के श्राप ने इला बना दिया था,उसी प्रकार अयोध्या और उसका सूर्यवंश मनु के पुत्र इक्ष्वाकु से प्रारम्भ हुआ। .
अयोध्या रघुवंशी राजाओं की बहुत पुरानी राजधानी थी।पहले यह कौशल जनपद की राजधानी थी।प्राचीन उल्लेखों के अनुसार तब इसका क्षेत्रफल 96 वर्ग मील था। बाल्‍मीकि रामायण के 5वें सर्ग में अयोध्‍या पुरी का वर्णन विस्‍तार से किया गया है। भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने एक बार पुन: राजधानी अयोध्या का पुनर्निर्माण कराया था। इसके बाद सूर्यवंश की अगली 44 पीढ़ियों तक इसका अस्तित्व बरकरार रहा। रामचंद्र से लेकर द्वापरकालीन महाभारत और उसके बहुत बाद तक हमें अयोध्या के सूर्यवंशी इक्ष्वाकुओं के उल्लेख मिलते हैं।इस वंश का बृहद्रथ,अभिमन्यु के हाथों 'महाभारत' के युद्ध में मारा गया था।महाभारत के युद्ध के बाद अयोध्या उजड़-सी गई लेकिन उस दौर में भी श्रीराम जन्मभूमि का अस्तित्व सुरक्षित था जो लगभग14वीं सदी तक बरकरार रहा। प्राचीन भारतीय ग्रंथों के आधार पर इनकी स्थापना का काल ई.पू. 2200 के आसपास माना है। इस वंश में राजा रामचंद्रजी के पिता दशरथ 63वें शासक हैं।... बृहद्रथ के कई काल बाद यह नगर यह नगर मगध के मौर्यों से लेकर गुप्तों और कन्नौज के शासकों के अधीन रहा।
यहाँ महमूद गजनी के भांजे सैयद सालार ने तुर्क शासन की स्थापना की। वो बहराइच में 1033 ई. में मारा गया था। उसके बाद तैमूर के पश्चात जब जौनपुर में शकों का राज्य स्थापित हुआ तो अयोध्या शर्कियों के अधीन हो गया। 
आईन-ए-अकबरी के अनुसार इस नगर की लंबाई 148 कोस तथा चौड़ाई 32 कोस मानी गई है। सरयू नदी के तट पर संतुष्ट जनों से पूर्ण धनधान्य से भरा-
पूरा,उत्तरोत्तर उन्नति को प्राप्त कौशल नामक एक बड़ा देश था।इसी देश में मनुष्यों के आदिराजा प्रसिद्ध महाराज मनु की बसाई हुई तथा तीनों लोकों में विख्यात अयोध्या नामक एक नगरी थी। इन्द्र की अमरावती की तरह महाराज दशरथ ने उस पुरी को सजाया था।आप को बता दें कि अयोध्या घाटों और मंदिरों की प्रसिद्ध नगरी है। सरयू नदी यहाँ से होकर बहती है। सरयू नदी के किनारे 14 प्रमुख घाट हैं।
इनमें गुप्त द्वार घाट,कैकेयी घाट, कौशल्या घाट,पापमोचन घाट, लक्ष्मण घाट आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।राम जन्मभूमि मंदिर,यह स्थान रामदूत हनुमान के आराध्य प्रभु श्रीराम का जन्म स्थान है।राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं।शोधानुसार पता चलता है कि भगवान राम का जन्म 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था।
अपुष्ट खबरें के अनुसार 1528 में बाबर के सेनापति मीरबकी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर स्थित मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई थी। फिलहाल भाजपा समर्थको व रामभक्तो को आगामी 22 जनवरी का बेसब्री से इंतजार है। जब प्रधान मंत्री मोदी राम मंदिर का उद्घाटन करेगें।नव र्निमाणाधीन राम मंदिर के उद्घाटन के पूर्व 30 दिसम्बर को स्वयं नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या को देश के विभिन्न हिस्सों से जोड़ने के उदश्यों से दो नई अमृत भारत ट्रेनों व छह नई वंदे भारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाई तथा पुनर्विकसित अयोध्या रेलवे स्टेशन का उद्घाटन किया। उन्होनें यहाँ एक सार्वजनिक कार्यक्रम में  कहा कि अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन पर 10 हजार लोगों को संभालने की क्षमता है। लेकिन नवीनीकरण पूरा होने के बाद अब यह क्षमता बढ़कर 60 हजार तक पहुंच जाएगी।प्रधानमंत्री ने वंदे भारत एवं नमो भारत के बाद नई ट्रेन श्रृंखला ‘अमृत भारत’ के बारे में जानकारी दी।प्रधान मंत्री प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि आज प् पहली अमृत भारत ट्रेन प्रभु श्री जन्म स्थली अयोध्या से होकर जा रही है।उन्होनें यूपी,दिल्ली,बिहार,पश्चिम बंगाल और कर्नाटक के लोगों को ये ट्रेनें मिलने पर बधाई दी।स्वदेशी र्निमित आधुनिक उपकरणों से  सुसज्जितअमृत भारत ट्रेनों में निहित गरीबों की सेवा की भावना की क्रद करते हुए कहा कि “जो लोग अक्सर अपने काम के सिलसिले में लंबी दूरी की यात्रा करते हैं और जिनकी उतनी आय नहीं है,वे भी आधुनिक सुविधाओं वआराम दायक यात्रा के हकदार हैं।इन ट्रेनों को गरीबों के जीवन की गरिमा को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है।”प्रधान
मंत्री ने विकास को विरासत से जोड़ने में वंदे भारत ट्रेनों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। “देश की पहली वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन काशी से चली थी। आज देश में 34 मार्गों पर वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनें चल रही हैं। वंदे भारत ट्रेनें काशी,कटरा, उज्‍जैन पुष्‍कर,तिरूपति,शिरडी, अमृतसर,मदुरै जैसे आस्था के हर बड़े केंद्र को जोड़ती हैं।इसी कड़ी में,आज अयोध्या को भी वंदे भारत ट्रेन की सौगात मिली है।”
पुनर्विकसित अयोध्या रेलवे स्टेशन के अयोध्याधाम नाम कर दिया गया है।जिसके पहले चरण 240 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से विकसित किया गया है।इस तीन-मंजिला आधुनिक रेलवे स्टेशन में सभी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है। 
रेल बुनियादी ढांचे को मजबूत करने हेतु 2300 करोड़ रुपये की तीन रेलवे परियोजनाओं को भी राष्ट्र को समर्पित किया है। रामायण के रचियता संत बालमिकी के नाम अयोध्या में र्निमित हवाई अड्डे का लोकापर्ण कर प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की यह सौगात,भाजपा कार्यकताओ की उत्साह व राम भक्तों की "जय श्रीराम "की जयघोष गुजंयामान स्वर व विपक्षी राजनीतिक दलों की भय से भारतीय राजनीति के पंडितओं की चर्चा व चिन्तन का दौर जारी है,भाजपा व उसके समर्थक  भक्ति की शक्ति जानती है।तभी तो वह आजकल भाजपा व उसके समर्थको की ओर से एक स्वर आने लगा है कि " जय श्री राम - -- -- जय श्री राम के जय धोष से वातावरण राम मय हो गया है। तभी तो भाजपा के शीर्ष नेतृत्व व उसके समर्थक कहने लगे है कि राम जी करेगे भाजपा की नैया पार, उदासी मन तु काहे को डरें।फिलहाल आप से यह कहते हुए विदा लेते है-ना ही काहुँ से दोस्ती, ना ही काहुँ से बैर। खबरीलाल तो मांगे, सबकी खैर। 

बुधवार, 11 अक्तूबर 2023

विरोध की चिंगारी 'संपादकीय'

विरोध की चिंगारी    'संपादकीय' 

उत्तर प्रदेश की राजनीति को केंद्र की राजनीति की नींव से परिभाषित करने पर कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। लोकसभा चुनाव से पहले ही भाजपा विरोधी गतिविधियां प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय हो गई है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे करीबी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन में सरकार सनातन आस्था विरोधी गतिविधियां, कानून लागू करना, हिंदुत्व की भावना को पीड़ा प्रदान करने का कार्य कर रही है। 
हो सकता है कि कानून जनहित में लागू किया गया हो ? परंतु सनातन समुदाय को ठेस पहुंचाने वाला व्यक्ति 'शिवशक्ति' विरोधी होने का दंभ तो कर ही रहा है। यह किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं है। बल्कि, संपूर्ण सनातन अनुयायियों की आस्था है। 'हिंदू रक्षा दल' के अध्यक्ष के विरुद्ध कानूनी कारवाई का प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ रहा है। 
आस्था के बीच में आने वाला कोई भी साधारण या विशेष व्यक्ति घृणा और दुत्कार का अधिकारी बन जाता है। हिंदू रक्षा दल के द्वारा योगी विरोधी कोई बयान जारी नहीं किया गया है। 
किंतु उसके विचार के समर्थन का दायरा बढ़ गया है। वहीं, परोक्ष रूप से भाजपा विरोधी विचारधारा का दायरा तीव्र गति से असीमित होता जा रहा है। भाजपा की नीतियों में केवल राजनीतिक एजेंडा शेष रह गया है। 
सत्तारूढ़ भाजपा नेतृत्व में विवेकहीनता का आधिपत्य स्थापित हो गया है। ऐसे नियम लागू करना, जन मानस की आस्था को हताहत करने के समान है। जिसे कोई भी आस्तिक व्यक्ति, किसी भी रूप में स्वीकार नहीं करेगा। परिणाम स्वरुप महंत यति नरसिंहानंद ने योगी आदित्यनाथ और लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश) को खुले मंच से ललकारा है। असभ्यता, अशिष्टता और अभद्रता की पाराकाष्ठा को पार कर दिया है। महंत के बयान से संत और सरकार, दोनों के विरुद्ध अपना रोष प्रकट किया गया है।
इससे सीएम योगी के सम्मान को ठेस पहुंचना स्वाभाविक है। लेकिन ऐसे हालत क्यों उत्पन्न हुए ? इस पर विचार करने की आवश्यकता है। यति के विरुद्ध भी स्थानीय पुलिस ने नियम अनुसार कार्रवाई की है। परंतु विरोध की चिंगारी का प्रसार स्थापित हो गया है। हिंदू विरोधी सरकार का विचार जनता के मन में घर करने लगा है। सत्ता का लोभ और दमनकारी नीतियों का विश्लेषण स्वयं जनता अपने आप करने के लिए आगे आ खड़ी हुई है। यह विरोध स्वाभाविक है या कोई छलावा है ? इसका निष्कर्ष लोकसभा चुनाव परिणाम ही बता पाएंगे।
राधेश्याम  'निर्भयपुत्र'

शनिवार, 26 अगस्त 2023

आधुनिक भारत 'संपादकीय'

आधुनिक भारत     'संपादकीय'

साजिस - ए- शहर मे मुजरिम के सिवा कोई नहीं,
बस वही खतरे में है जिसकी खता कोई नही।
वक्त बदल गया साहब उपरोक्त पंक्तियों को जब किसी ने लिखा होगा, हालात तमाम सवालात के साथ गर्दिश का रहा होगा।आजादी के बाद भी सरहद की सीमा पर बसे गांवों में सुरक्षा के अभावों के चलते दहशत गर्दो के लिए महफूज स्थान बना हुआ था। आजादी के सत्तर साल तक कश्मीर हांफती रही। कश्मीर की वादियां कांपती रही, निरीह लोगों की हत्या देश के सामने समस्या बनी रही। मां भारती की जिस जगह आज आरती हो रही है, वहीं धरती आज से महज दस साल पहले कराहती थी‌। बेबस और बेजुबान हो चुके थे सेना के जवान। मुस्कराता था पूरा पाकीस्तान। सिकुड़ कर रह गया था भारत का सम्विधान। आजादी के समय चाटुकारिता में लिया गया निर्णय कितना घातक साबित हुआ? इसका उदाहरण कश्मीर के रहने वाले स्थाई निवासी कश्मीरी पंडितों के नरसंहार से बड़ा क्या हो सकता है? आज भी देश द्रोही पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती जिन्दा देश की सार्वभौमता को ललकार रही है? जो 370 हटने के सवाल पर बवाल करती थी, कश्मीर में कोई तिरंगा फहराने वाला नहीं मिलेगा ? आज जब सारा कश्मीर अपनी बदलती तकदीर पर इतरा रहा है तब अलगाव वादियो का सर चकरा रहा है। कोई फांसी के फन्दे का इन्तजार कर रहा है तो कोई हिन्दुस्तान जिन्दाबाद का नारा लगाकर कश्मीर के कशीदे पढ़ रहा है! कल तक जहां देशभक्त अपना रक्त हर दिन बहा रहे थे, वहां आज आतंकवादियों के सीने छलनी किए जा रहे हैं। जो फौज बेबस थी आज ललकार रही है। कल तक मुस्कराने वाला पाक आज थर्रा रहा है। भारत का नाम सुन कर घबरा रहा है।आजादी के सत्तर‌ साल‌ तक लाल चौक पर भारतीय तिरंगा फहराने के सवाल पर‌‌ लोग हलाल‌ होते रहे! मगर आज हालात बदल गया है। जिधर देखिए वन्दे मातरम की धुन पर लोग थिरक रहे हैं। तिरंगा हर घर की शान बनकर आसमानी उड़ान पर है। हर कश्मीरी नाज कर रहा है हिन्दुस्तान पर। दुनियां के फलक पर चमक बिखेरता हिन्दुस्तान पाकिस्तान के झन्डा पर लगने वाले चांद पर ही तिरंगा फहरा दिया। अपनी ताकत का लोहा दुनिया को मनवा लिया। कभी कश्मीर‌ को आजाद कराने का सपना देखने वाला भारत चांद पर भी अपना कब्जा जमा लिया।उसके सीने पर रोबर अपना निशान बना रहा है जो सदियों तक कायम रहेगा। हर कोई कहेगा मोदी का भारत जिन्दाबाद। आज यह सच साबित होता दिख रहा है मोदी है तो कुछ भी मुमकिन है! बात सोलह आने सच की तरफ इशारा कर रही है। मेरी कलम न किसी की गुलाम है न किसी के साथ साझेदार है, जो सच देखेगी वहीं लिखेगी। वैश्विक पटल पर भारत की ताकत अभी चढान पर है। दुनियां की नजर केवल हिन्दुस्तान पर है। भारत वंशी अमेरिका सहित तमाम देशों मे अपनी परम्परा अपनी संस्कृतियों का खुल्लम खुल्ला हल्ला मचाकर प्रचार प्रसार कर रहे हैं। अपनी सनातन संस्कृति अपनी पहचान विश्वगुरु होने का पुख्ता निशान छोड़ रहे हैं। जिस देश की सत्ता के अधीन सैकड़ों साल भारत बेहाल रहा उसी देश का प्रधान मन्त्री बनकर भारत का लाल ब्रिटेन में कमाल कर रहा है। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में भी सनातनी धमक होने लगी है। भारतवंशी नौजवान अमेरिका की सियासत का चमकता सितारा बनकर कीर्तिमान स्थापित करने जा रहा है।
बदल गया पूरी तरह से हिन्दुस्तान, देखिए वक्त अभी क्या‌-क्या नजारा पेश करता है, भारत को कैसा देश करता है ?
जगदीश सिह  

रविवार, 20 अगस्त 2023

302 धारा, 301 'संपादकीय'

302 धारा, 301    'संपादकीय' 

भारतीय दंड संहिता (इंडियन पेनल कोड) के मुताबिक, आपको बता दें कि अगस्त सन् 2023, में लोकसभा सत्र के दौरान संशोधन के बाद नया विधेयक पारित कर दिया गया है। जिसमें धारा-302 का वास्तविक स्वरूप धारा-301 में निहित कर दिया गया है। जिसका संपूर्ण विवरण आप स्वयं समझ सकते है !
'धारा-301 का विवरण'
भारतीय दंड संहिता की धारा 301 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति कोई ऐसी बात करके, जिसका आशय मॄत्यु कारित करना हो, या जिससे वह जानता हो कि मॄत्यु कारित होना सम्भाव्य है, किसी ऐसे व्यक्ति की मॄत्यु कारित करके, जिसकी मृत्यु कारित करने का न तो उसका आशय हो और न वह यह संभाव्य जानता हो कि वह उसकी मॄत्यु कारित करेगा, आपराधिक मानव वध करे, तो अपराधी द्वारा किया गया आपराधिक मानव वध उस भांति का होगा जिस भांति का वह होता, यदि वह उस व्यक्ति की मॄत्यु कारित करता, जिसकी मॄत्यु कारित करना उसका आशय था या वह जानता था कि उस व्यक्ति की मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है।
'धारा-302 का विवरण'
भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अनुसार, जो भी कोई किसी व्यक्ति की हत्या करता है, तो उसे मृत्यु दंड या आजीवन कारावास और साथ ही आर्थिक दंड से दंडित किया जाएगा।
हत्या करना...
सजा- मृत्यु दंड या आजीवन कारावास + आर्थिक दंड
यह एक गैर - जमानती , संज्ञेय अपराध है और सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।
परिचय...
हमें अक्सर सुनने और पढ़ने को मिलता है कि हत्या के मामले में अदालत ने आई. पी. सी. यानी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के तहत मुजरिम को हत्या का दोषी पाया है, ऐसे में न्यायालय दोषी को मृत्यु दंड या फिर आजीवन कारावास की सजा सुनाती है। फिर भी काफी लोगों को अभी भी धारा 302 के बारे में सही ज्ञान नहीं है, आइए चर्चा करते हैं कि क्या है भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 ?
भारतीय दंड संहिता की धारा 302 कई मायनों में महत्वपूर्ण है। हत्या के आरोपी व्यक्तियों पर इस धारा के तहत ही मुकदमा चलाया जाता है।
चंद्रमौलेश्वर शिवांशु  'निर्भयपुत्र'

शुक्रवार, 21 जुलाई 2023

प्यार की परिभाषा   'संपादकीय'

प्यार की परिभाषा   'संपादकीय'

अब सीमा के पास घुटन भरे जीवन के अलावा कोई रास्ता शेष नहीं रह गया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी जांच में जुट गई है। हिंदुस्तान-पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधों में सीमा और तनाव बढ़ाने का काम पहले ही कर चुकी है। अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने से आशंकाओं का दायरा भी बढ़ गया है। 

परंतु जिस धैर्य और विश्वास पूर्ण सहजता से सीमा पत्रकारों से बात करती है। उनके सवालों का रटा-रटाया या सही सही जवाब देती है। इसके कारण दूसरे पहलू पर भी गौर करने की आवश्यकता है। कहा जाता है कि प्रेम मर्यादाओं के बंधन से मुक्त होता है, जिसकी कोई उम्र नहीं होती है, कोई मापदंड या पैमाना भी नहीं होता है। प्यार में उत्पन्न भावनाओं को बांधकर रखने वाले किसी पिंजरे का भी अभी तक अविष्कार नहीं हुआ है। प्यार में लोग कातिल हो गए हैं, प्यार में लोग फना हुए हैं। धरती पर तो ऐसी कोई जगह नहीं है जहां प्यार नहीं है। प्यार है तो कहानियां और किस्से भी बहुत है। आए दिन हम रूबरू होते हैं कि पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी। पति ने प्रेमिका के लिए पत्नी की हत्या कर दी। चार बच्चों की मां, 6 बच्चों के मां-बाप, 45-50 साल की औरत या आदमी किसी के साथ चली गईं अथवा लेकर भाग गया ? युवा वर्ग की तो बात छोड़िए, केवल बालिग होने का इंतजार करते हैं फिर वह किसी के बाप की नहीं सुनते हैं। बल्कि यहां तक कहा गया है कि 'प्यार की कोई परिभाषा ही नहीं होती' है।

सीमा के कथन के अनुसार सीमा की कहानी रोमांच तो उत्पन्न करती ही है, साथ ही साथ सोचने के लिए विवश भी करती है। सीमा का आत्मविश्वास जांच एजेंसियों के लिए चुनौती बना हुआ है। यदि सीमा के इस नाटक के पीछे भारत विरोधी सोच अथवा गतिविधियों में संलिप्त है तो उसे अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत दंडित किया जाना चाहिए। परंतु यदि सीमा अपने प्यार को पाने के लिए यह सब कर रही है, तब उसकी हिम्मत की दाद देनी चाहिए। परस्पर एक-दूसरे के विरोधी दो देशों के बीच संबधो को दरकिनार कर, अपनी जान हथेली पर रखकर, दुस्सह रास्ते पर, भयानक झंझावतों को भेदकर, अपने प्यार तक पहुंचने में कितनी यातनाओं का सामना किया होगा ? इसका अनुमान लगाना कठिन है। चार बालकों सहित धर्मांतरण करना और 27 वर्षों तक जिन संस्कारों और सभ्यता में रही है, उसे त्याग कर नवीन संस्कार और सभ्यता का वरन करना साहसिक कार्य है।यदि सीमा सच्चे प्यार के वशीभूत सब बंधन, सीमाएं और मर्यादाओं को त्याग कर, अपना प्यार पाना चाहती है, भारत में अपना जीवन व्यतीत करना चाहती है, ऐसी स्थिति में मानवीय आधार पर उसकी सहायता की जानी चाहिए।


राधेश्याम  'निर्भयपुत्र'

बुधवार, 12 जुलाई 2023

रिश्तों का तराजू   'संपादकीय'

रिश्तों का तराजू   'संपादकीय'


मैंने निभाया है हर रिश्ते को ईमानदारी से,

यकीन मानो कुछ नहीं मिलता इस वफादारी से।

अवतरण दिवस के बाद से ही रिश्तों की डोर में बंधा आदमी कदम-कदम पर अपने-पराये की अटूट श्रृंखला की कड़ी बनकर रह जाता है।

जीवन के अग्नि पथ पर हर लम्हा समर्पण भाव लिए स्वभाव के संरक्षण में अपनी निरन्तरता बनाएं रहता है। उम्र के गुजरते लम्हे धीरे-धीर जब परिपक्वता की परिधी में पहुंच जाते हैं, स्वयं की सम्वेदना निज हित को सर्वोपरि मानते हुए दिन रात सामाजिकता के आवरण को मजबूत कर इस स्वार्थी दुनिया के रस्मों रिवाज में अहर्निश सुख सम्पदा के उन्मोचन में सुख-चैन को त्याग कर, सुखद भविष्य की चाहत में खुद‌ आहत रह कर भी 

तरक्की की राह पर अपनों को अग्रसर करने के लिए हर दर्द को सह जाता है। बदलता परिवेश जिस विशेष वातावरण का निर्माण कर‌ रहा है, उसमें तो एक निश्चित अवधि के पार होते ही जो कल तक अपने थे सपने कि बात बन जा रहे हैं।परिवर्तन की पराकाष्ठा देखिए साहब! आधुनिकता के इस अघोषित युद्ध में लोगों की मानसिकता जिस तरह प्रबुद्ध होने का एहसास करा रही है, वह भारतीय परम्परा भारतीय संस्कृति में कभी शामिल नहीं रही है।

इस देश में तो सदियों से मातृ देवो भव: पितृ देवो भव: का सारगर्भित सम्मान सर्वोपरि रहा है।

मगर, इस भौतिक वादी युग में रिश्तों की अहमियत खत्म हो गई। डंकल प्रजाति के नए रिश्तों से समाज सम्बृध हो रहा है।पुरातन काल के सम्बन्ध जो पौराणिक अनुबन्ध पर कायम थे, अब विलुप्त हो चले हैं।आधुनिकता के प्रथम चरण में ही सामाजिक सम्बन्धों की परिभाषा बदल गई। अब वह परम्परा परिवर्तित हो गई, जिसमें शान से कहा जाता, जिस जाति धर्म में जन्म लिया, बलिदान उसी में हो जाए ! 

जननी जन्म भुमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी !  खुशहाल जीवन के महकते उपवन में जिस दिन उर्वशी का आगमन हुआ, उसी दिन खुशी पर ग्रहण लग गया। रिश्ते दरकने लगा, घर परिवार खटकने लगा। उसमें भी अगर नौकरी है तो सोने में सुहागा‌। वह पथिक जो जीवन भर कठिन राहों पर अपनों के लिए नंगे पांव भटकता रहा, उसके नसीब में खुशी करीब आकर दूर चली गई, जिसके आसरे सारे ख्वाब सजाए थे, जीवन उस पर तुषारापात हो गया।

सम्बन्धों की तुरपाई जब मोहब्बत के धागे से होती है, तब जाकर अपनापन वजूद मुस्कराता है ।लेकिन आजकल तो एक नई व्यवस्था ने ऐसी आस्था को प्रतिपादित किया है, जिसके चक्रव्यूह में जो एक बार फंस गया,  वह अपना समूल नाश कर मूल को भूल जाता है। जीवन की जगमगाती ज्योति को आंधियों के हवाले करने की नवसृजित परम्परा भारतीय संस्कृति को विनाश के तरफ ले जा रही है। विघटित होते संयुक्त परिवार  एकाकी जीवन की संकल्पना का आधार बन रहे हैं। पुरातन भारतीय जीवन पद्धति अब कल की बात हो गई। घर विरान हो रहे है, अनाथ आश्रम तथा बृद्धा आश्रम आबाद हो रहे हैं। शहर से लेकर गांव तक बदल गए। हर तरफ गजब की उदासी है, हर तरफ गम जदा मंजर है। वैमनस्यता की देवी पूजी जा रही घर-घर है। 

अब रिश्तों का तोल नहीं, 

मां-बाप अनमोल नहीं। 

आने वाला कल विकल भाव लिए एकल जीवन का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।

सबके करीब जाना, 

मेरी मजबूरी तो नहीं।

हर ज़ख्म दिखाऊं, रोऊं... 

ये जरुरी तो नहीं।

देख लिया है जीकर,

मैंने सबके लिए।

बिना मेरे ज़िन्दगी,

किसी की अधूरी तो नहीं।

जगदीश सिंह

बुधवार, 5 जुलाई 2023

एक-एक बूंद पानी    'संपादकीय' 

एक-एक बूंद पानी    'संपादकीय'   

जिसके पांव न फटी बिवाई, 

वो क्या जाने पीर पराई ?

प्रचंड प्रत्यंचा पर आरुढ भीषण गर्मी का प्रहार जन-जन को आहत करने का कार्य कर रहा है। अत्याधुनिक समाज में समर्थवान और सुविधा भोगी वर्ग को दरकिनार कर दिया जाए तो देश की 52 प्रतिशत आबादी इस भीषण गर्मी का तरह-तरह से दंश झेल रही है और विभिन्न तरह की पीड़ा सहती है। "यह विधाता ने जनता के भाग्य में नहीं लिखा है।" यह राज्यों और राष्ट्र में सत्तारूढ़ प्रजापतियों की देन है। जो केवल और केवल किसी भी क्रिया अनुरूप अधिपत्य प्राप्त करना चाहते हैं। राज धर्म से विमुख कोई भी राजनेता जन संरक्षक कैसे हो सकता है? 

वर्तमान समय में संपूर्ण देश पेयजल की विकट समस्या से जूझ रहा है। 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार देश में 14 वर्ष से कम आयु के 1000 बालक प्रत्येक घंटे में अतिसार का शिकार हो जाते हैं। अशुद्ध पेयजल से होने वाली यह बीमारी देश में प्रति घंटा 1000 बच्चों को निगल जाती है। भाजपा सरकार में कई विधायक और सांसद ऐसे हैं, जिन्होंने पेयजल को कभी गंभीरता से नहीं लिया। उत्तर प्रदेश की लोनी विधानसभा से विधायक ने तो 1 प्याऊ तक नहीं लगवाई। हालांकि ऐसे खोखले जनप्रतिनिधित्व को जनता एक सिरे से खारिज कर देती है। किंतु परिणाम स्वरूप भोली-भाली जनता को कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है? जो व्यक्ति अनुभव कर सकता है, वही 'एक-एक बूंद पानी' का मूल्य समझ सकता है।

2014 से मोदी नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 'स्वच्छ भारत अभियान' का आगाज किया था। जिसमें भारत को 2019 तक स्वच्छ पेयजल प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया था। परंतु राजनीतिक चिंताओं में सभी विदूषक इसमें असफल सिद्ध हुए। पेयजल की वस्तुतः परिभाषा को देश की आधे से अधिक आबादी समझती ही नहीं है। इसी कारण किसी राजनेता ने इसे चुनौतीपूर्ण विषय ही नहीं समझा। संपूर्ण भारत के 196 लाख घरों में उपयोग होने वाले पानी में फ्लोराइड और आर्सेनिक  जैसे खतरनाक रसायन मौजूद है। जो मानव जीवन को पीड़ा कारक बनाने के लिए काफी है। देश के 718 जनपदों में दो तिहाई हिस्सों में पेयजल की अत्यधिक कमी है।

रिपोर्ट के मुताबिक देश में 3 करोड़ भूजल आपूर्ति केंद्रों (बोरिंग) से ग्रामीण क्षेत्रों में 85 प्रतिशत एवं नगरीय क्षेत्रों में 48 प्रतिशत पेयजल आपूर्ति की जा रही है। कुल आबादी में 30 प्रतिशत आबादी पेयजल संकट से जूझ रही है। इस विषय पर राज्य स्तरीय एवं राष्ट्र स्तरीय कमेटियों का गठन किया जाता रहा है। परंतु इस विकराल समस्या के स्थाई समाधान की कोई योजना धरातल पर उपस्थित नहीं है। देश की जनता की आवश्यकता और अपेक्षा अनुरूप कोई कार्य नहीं किया गया है। जनता को मीठे स्वप्न दिखाने के बजाय कटु सत्य से अवगत कराना चाहिए। संभवत नागरिक स्वयं समस्या का समाधान करने का प्रयास करेगा। 

राधेश्याम  'निर्भयपुत्र'

बुधवार, 25 जनवरी 2023

गणतंत्र दिवस    'संपादकीय'

गणतंत्र दिवस    'संपादकीय'


'भारत' देश है हमारा,

संविधान पर विवाद नहीं।

'सभ्यता' सबसे पहले आई,

भाषा पर संवाद नहीं।

भारतीय परंपराओं के अनुरूप, भारत में हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में वर्षों पहले 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था। जब से यह परंपरा जारी है। इसके साथ ही आपको बताते चलें, कि भारत में हर साल 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) को राष्ट्रीय अवकाश रहता है। इस बार यह 74वां गणतंत्र दिवस है। इसके पश्चात आपको यह खास एवं महत्वपूर्ण बात भी बताते चलें, कि भारत ही दुनिया का एक ऐसा देश है, जिसकी भारतीय संविधान में लिखित 'राष्ट्रभाषा' कोई भी नहीं है। इस बात को ध्यान में रखते हुए एक नज़रिए से देखा जाएं, तो यह एक 'गर्व' की बात है और 'चिंता' की भी...।

'गर्व' की बात इसलिए है, क्योंकि दुनिया में केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसकी भारतीय संविधान में लिखित राष्ट्रभाषा कोई भी नहीं है और हिंदी को राजभाषा की उपाधि दी गई है। ज्यादातर 'हिंदी' भाषा का प्रयोग भारत में किया जाता है। भारत के अलावा, हिंदी का प्रयोग बहुत ही कम देशों में किया जाता है। इसलिए, यह एक गर्व की बात है।

'चिंता' की बात इसलिए है, क्योंकि दुनिया में भारत एक अकेला देश है, जिसकी भारतीय संविधान में लिखित राष्ट्रभाषा कोई भी नहीं है, तथा बाकी सभी देशों की अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा है। इसलिए, यह एक चिंता की बात है।बहरहाल, आपको यह जरूर बता दें, कि 'हिंदी' भारत की राष्ट्रभाषा नहीं, बल्कि राजभाषा है।

चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

सोमवार, 23 जनवरी 2023

गुरबत का सांप    'संपादकीय'

गुरबत का सांप    'संपादकीय'


कभी-कभी जिंदगी में,

ऐसा समय आता है।

एक निर्जीव पत्थर भी,

जीवन बन जाता है।

विश्व के आलेखन के अनुसार,  विश्व में अक्सर अनेकों तरह के अजूबे होते रहते है। इसके अनुरूप पृथ्वी पर प्रकट हुए अनेक प्रकार के सांप पत्थरों पर चलना ही अधिक पसंद करते है। लेकिन, इन सबसे अलग एक सांप, जिसे 'गुरबत का सांप' कहा जाता है। वह ना दिखता है, ना चलता है, ना उड़ता है और ना तैरता है‌‌। वह फिर भी 'गुरबत का सांप' कहलाता है। वर्तमान में देखा जाए, तो भारत में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर 'गुरबत का सांप' सवार है। उसके पश्चात अब 'गुरबत के सांप' के कटघरे में भाजपा आ गई है। हालांकि, यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता है। वैसे, एक नजरिए से देखा जाएं, तो कुछ-कुछ ऐसा ही लगता है। इसके बाद भी इस मामले की गंभीरता से पुष्टि नहीं हुई है। फिर भी यह एक कड़वा सच लगता है। 

कोविड-19 महामारी से बचाव हेतु अभियान चलाया गया था। टीकाकरण अभियान भाजपा की 'भयावह' रणनीति का एक अहम हिस्सा है। इसके अतिरिक्त आपको यह भी बताते चलें, कि (कोविड-19) महामारी को मजाक में लेना, भारी पड़ सकता है। दुनिया भर में अभी तक कोरोना के कुल केसों की संख्या-66,86,46,404 हो गई। इसके साथ-साथ अभी तक कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या-67,38,653 हो गई। इससे अधिक खास बात यह है, कि दुनिया भर में कोरोना की कुल 13,22,61,15,781 खुराकें दी गईं। 

इससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है, कि भारत में बीते वर्ष-2020 में कोविड-19 महामारी का आर्थिक प्रभाव काफी हद तक विघटनकारी रहा है। सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2020 की चौथी तिमाही में भारत की विकास दर घटकर 3.1% रह गई। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा, कि यह गिरावट मुख्य रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोरोना वायरस महामारी के प्रभाव के कारण है। विशेष रूप से, भारत भी महामारी से पहले मंदी का सामना कर रहा था और विश्व बैंक के अनुसार, कोरोना वायरस महामारी ने "भारत के आर्थिक दृष्टिकोण के लिए पहले से मौजूद जोखिमों को बढ़ा दिया है"।

(कोविड-19) महामारी भी एक 'गुरबत के सांप' की तरह ही है, जो अगर किसी पर चिपक जाएं, तो छाप मारकर ही दम लेती है। अगर एक अलग दृष्टिकोण से देखा जाए, तो इसमें भाजपा की एक महत्वपूर्ण भूमिका एवं प्रतिस्पर्धा भी हो सकती है। भाजपा की सख्त नजर भी, एक 'गुरबत के सांप' की तरह ही है।

चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

मंगलवार, 13 दिसंबर 2022

जीवनकाल    'संपादकीय'

जीवनकाल    'संपादकीय'


'लिबास' देखकर हमें गरीब न समझ,

हमारे 'शौक़' ही तेरी जायदाद से ज्यादा है।

आजकल युवा पीढ़ी फैशन परस्ती में लोक-लाज, लिहाज सब भूलकर भारतीय संस्कृति का अपमार्जन करते हुए, अपमान की सभ्यता को तवज्जो देने लग गई है। जबसे पाश्चात्य सभ्यता ने दस्तक दी है, भारतीय संस्कृति का विलोपन होने लगा है। हर कोई पराया हो गया, कोई भी सगा नहीं है। रहन-सहन, पहनावा दिखावे का प्रचलन जोर पकड़ रहा है। जिधर देखिए देहउघारु कपड़े का चलन है। राह चलते आए दिन छेड़खानी और लफड़े होते हैं। सुन्दर काया लिए आज का आदमी पाश्चात्य पहनावा में जोकर लग रहा है। फिर भी गुमान है, हम आधुनिक इन्सान है? गजब साहब कभी सिर पर पल्लू रखें महिलाओं घर से निकलती थी तो उनके संस्कार का बखान होता था। परिवार का उनका चाल-चलन देखकर नाम होता था वो भी कोशिश करती थी कि राह चलते पैर का अंगूठा भी न दिखे। मगर आज साहब क्या बात है आधुनिक जमाने की पढ़ी लिखी जनरेशन का फैसला देखिए।

कोशिश करती है विवाह के मंडप में ही उसका सब कुछ सब लोग देखे? गजब गिरावट है। अब तो कुछ भी नहीं बचा। जिसमे नहीं होती मिलावट है। पुरानी पीढ़ी जो हिन्दुस्तानी संस्कृति के पहचान थी अब समापन के तरफ है। धोती कुर्ता सदरी का प्रचलन खत्म हो रहा है। फटा जीन्स पैन्ट फटी कमीज़ बिना तमीज सड़कों पर आवारा गर्दी किसी ने रोका तो बिना लाग लपेट बोल देते है यह हमारी मर्जी। अगर सलीके से साड़ी बांधे औरत और धोती कुर्ता में कोई मर्द दिखा तो जाहील गंवार गरीब अनपढ़ कहकर उपहास आज की युवा पीढ़ी करती है। उनको पता ही नहीं है की यही हमारी पहचान यही हमारी धरोहर है। इसी से हमारी शान है। यही आर्यावर्त, भारत, हिन्द,का असली हिन्दुस्तान है? मगर बदलते परिवेश में बदलाव की जो हवा विषाक्त वातावरण का निर्माण कर रही है। उसकी चपेट में आकर आज का वातावरण पूरी तरह प्रदूषित हो चला है।

शहरो में दिखावा फ़ूहड़ पहनावा फैसन मस्ती फैसन परस्ती आम बात है। वहां उनका अलग मिजाज  अलग जज़्बात है। लेकिन गांव जहा भोले भाले लोग आपसी मुखालफत में भी सराफत लिए आपसी भाई चारा के साथ पुरातन परम्परा के अनुगामी रहे है। आज वहां भी फैसन परस्ती ने बदनामी का मंजर तैयार कर दिया है। पूरुष हो या महिलाएं शर्म, हया, लाज लिहाज खत्म होता जा रहा है।पर्दा के भीतर जो मर्यादा सुरक्षित थी। आज बिना पर्दा खुलेआम बेशर्मी की सारी हदें पार कर रही है। नंगापन, फूहडपना,देह शउघारू कपड़ों का प्रचलन, जोर पकड़ लिया है।

अब पहले वाली बात गांवों में नहीं रही निरंकुश ब्यवस्था उफान पर है। घर का मुखिया दुखिया बना बर्बाद होते परिवार को देखकर कूढ रहा है। मगर हालात दिन पर दिन बेकाबू हो रहा है। न किसी का डर न किसी का लिहाज। घर घर बर्बादी का दीपक जल रहा है। आज, कितना बदल गया समाज। जो कुछ पहले था ठीक उसके उल्टा हो गया। इस बदलाव के मौसम में आदमी की पहचान उसके मान सम्मान स्वाभिमान से नहीं उसके  मकान से मापा जा रहा है।उसकी हैसियत उसके कपड़ों से नापा जा रहा है। जिसके पास इज्जत का खजाना है। वह सबसे पिछड़ा है समाज में बेगाना है।जिनका जितना दिखावा आधुनिक पहनावा है उसी का जमाना है। समय के जिस तरह दरिया बदलता उसी तरह वक्त अपना नजरिया बदलता रहता है।अब न पुरातन संस्कार रहे। न पुरातन घर परिवार रहे। न लोगों में आपसी सद्भावना रहा। बिखराव बहाव का अन्धड चल रहा है। मजबूरी में आंखें बन्द करना है। अब न कोई रिश्ता है। न कोई फरिश्ता है। स्वार्थ की दरिया में उफान है।

साथ तभी तक है जब तक जरूरत पूरी नहीं होती है। ज्योही ज़िन्दगी की कश्ती झंझावात करती हवाओं से बचकर साहिल पर लंगर डाली वहीं औलाद बेगाना होगा गई ज्योहीं मिल गई घर वाली। अरमानों का महल बनाकर ख्वाब सजाकर सपनों की दुनियां में हर रात आखरी सफर के सौगात का भ्रम पाले वो मां बाप मुगालते में रहे जिनके अपने-सारे सपने तोड़कर मुंह मोड़कर तन्हाई में रहने को विवश कर दिए। परिवर्तन की पराकाष्ठा में आस्था धाराशाई है। जो कल तक अपना था आज वही बना तमाशाई है। गमों का बोझ लिए हर पल सिसकते हुए जीवन का हर क्षण सुख सम्बृधि की चाहत में आहत मन के साथ अपनों के भविष्य के लिए जिसने होम कर दिया। वहीं, आज आखरी सफर के कंटीले राह में अथाह दर्द की बेदना लिए सम्वेदना शून्य समाज में तिरस्कृत हो गया। उसी घर से वहिष्कृत हो गया, जिसको अपने खून पसीने से संवारा था।

जगदीश सिंह

शनिवार, 19 नवंबर 2022

'यकीन'   संपादकीय

'यकीन'   संपादकीय 

बचपन की ख्वाहिशें आज भी खत लिखती हैं मुझे,

शायद,

बेखबर है इस बात से कि वो जिंदगी अब इस पते पर नहीं रहती है।

बदलाव की बढ़ती शोहरत अनवरत अपनों के बीच गुमनामी की गुस्ताख़ इबारत ग़म की स्याही से गमगीन भरे वातावरण में रोज तहरीर कर रही है। बचपन से पचपन तक आते-आते सब कुछ बदल गया। मौसम का मिज़ाज बदला सियासी ताज बदला,शहर बदली गांव बदला अन्त और आगाज बदला'। इन्सानियत का लोप हो गया। लोगों के दिलो में मनुष्यता पर परजीवी फफूंद जैसे वैमनस्यता का कब्जा हो गया। संस्कार शब्द का अर्थ बदल गया। पुरातन सभ्यता का अर्थ ब्यर्थ हो गया। सम्बन्धों की परिभाषा ‌अभिलाषा के दहलीज पर दम तोड रही है। इस मतलबी जमाने में फरिस्ता भी बदल रहे रिश्ता को देखकर हैरान हैं। लोग बरबस ही कह रहे हैं कैसी दुनियां बनाई भगवान है? अजीब मंजर है। सबके दिल में घुल चुका जहर है। हर चीज में तिजारत है। घर-घर में शकुनी घर-घर में महाभारत है ? स्वार्थ के वशीभूत अपनो के लिए जीवन भर सपना देखने वालों का आखरी सफर का हश्र भी मिश्र की पिरामिड की तरह रहस्यमी बनता जा रहा है। एक ही नदी के दो किनारे है दोस्तों।

दोस्ताना जिन्दगी से मौत से यारी रखो' मालिक की बनाई कारनामा में सबसे बुद्धिमान प्राणी आदमी है लेकिन जिस तरह से आज दुर्दशा झेल रहा है उतना तो पशु भी नहीं झेलते। वो भी मौत के दिन तक अपनी खुशहाली में खेलते हुते मरते! कितना गिर गया है आज का आदमी झूठ फरेब बेइमानी उसके खून के कतरे कतरे में समाहित हो गया है। बाप, मां, भाई जिनके बाजुओं में पलकर जमाने की खुशियां पाई वहीं रिश्ते- होते ही सगाई -कैसे -बदल जाते हैं?

वहीं घर बार सगे सम्बन्धी दिल से कैसे निकल जाते हैं!जीवन भर मर मर कर खून पसीना से पैदा की गई कमाई जिस औलाद पर उसकी खुशियों पर लुटाई वहीं आखरी सफर में बन गया कसाई! घर से निकला शहर के लिए तो फिर कभी वापस नहीं हुआ अपना पता तक गुमनाम कर दिया ?

'क्यों खाक छानते हो शहर की गलियों का'

जो दिल से ताल्लुक तोड़ते हैं फिर कही नही मिलते। हालात इस कदर ग़म जदा हो गया है की कदम कदम पर दर्द का तूफान आसमान पर छा गया। गलती कर रहा है इन्सान आरोप भगवान पर आ गया। आज गांव बीरान हो रहे हैं। कभी सम्बृधि की अलख जगाने वाली मकान सुनसान हो रहे हैं। पढ़-लिखकर ओहदा पाते ही वहीं सन्तान भूल गए जिनके लिए खेत खलिहान तक बिक गये! मकान गिरवी पड गया!सिसकते अरमान के साथ बूढ़े मां बाप का इम्तिहान भी भगवान खूब लेता है!आने वाली नस्लों को नसीहत देता है! सम्हल जा ए मगरुर इन्सान तेरा कोई नहीं! मत रह मुगालते में तेरा कोई नहीं! कोई घर ऐसा नहीं बचा जहां इन्सानियत रोई नहीं!अपना पराया का भेद आज पारिवारिक विच्छेद का जो नजारा पेश कर रहा उसी का दुष्परिणाम हर जगह देखने को मिल रहा है।

समाज में बढ़ रही बुराईयों को देखना हो तो एक बार बृद्धा आश्रमों में कराहती सिसकती आखरी सफर के तन्हा रास्तों पर बेसहारा अश्रु धारा बहाती उन बूढ़ी आंखों में अपनों के लिए गए दर्द की रुसवाईभरी जिन्दगी को जरुर देखें! सच सतह पर आकर आप के   इन्सानियत को जगा देगी! बता देगी देख यही सच्चाई है। वक्त को पहचानिए!वर्ना एक दिन सिर्फ पश्चाताप के आंसू साथ रह जाएंगे।समाज में फैली रही हकीकत को जो करीब से होकर गुजरती है उसी को कलमबद्ध कर लिखता हूं।हो सकता है कुछ भाईयों को ठीक न लगे लेकिन सच हमेशा कड़वा होता है। 

जगदीश सिंह सम्पादक


मंगलवार, 18 अक्तूबर 2022

आस्तीन का सांप  'संपादकीय' 

आस्तीन का सांप 

'संपादकीय' 

कुछ तो जुल्म बाकी है जालिम, 

हाजिर है कतरा-कतरा लहू। 


आधुनिक विकासशील भारत गणराज्य महंगाई, मंदी और बेरोजगारी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। यह सरकार की अभावग्रस्त नीति का परिणाम है। प्रौद्योगिक विकास की प्रतिस्पर्धा में कम शिक्षित मध्यवर्गीय व्यापारियों का दमन अंतिम छोर तक पहुंच चुका है। आधुनिक परिवर्तनों की सुनामी में मध्यवर्ग का व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस बात से गुरेज नहीं किया जा सकता है कि भारत विश्व की 5 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सम्मिलित हो गया है। लेकिन इस बात की आड़ लेकर हम सच्चाई को ना छुपा सकते हैं और ना दबा सकते हैं। 

संयुक्त राष्ट्र के सर्वेक्षण के द्वारा बहुआयामी दरिद्रता सूचांक (एमपीआई) 2022 के अनुसार देश की कुल 138 करोड़ की आबादी में लगभग 9.70 करोड (गरीब बालक) नागरिक गरीबी, भुखमरी और कुपोषण से प्रभावित है। ग्रामीण क्षेत्र में लगभग 21.2% वहीं नगरीय क्षेत्र में 5.5% नागरिक दरिद्रता पूर्ण जीवन जी रहे हैं। देश विश्व पटल पर उन्नति कर रहा है, प्रगति की गाथा गाने वाले तांता लगाकर, ढोल पीटकर इस बात का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। क्या किसी के द्रवित हृदय में यह टीस शेष से नहीं रह गई है कि बनावटी मुस्कुराहट वास्तविक पीड़ा के आवरण में भाव-भंगिमा को स्वरूपित करती है। कुल 138 करोड़ की आबादी में भारत के 9.70 करोड़ दरिद्र बच्चे दुर्भाग्यवश भारत में निवास करते हैं। यह जीवन मार्मिक अवस्था  की पराकाष्ठा का अंत है। इतने लोगों का जीवन कष्टदायक होने के बाद हमें कैसा जश्न मनाना चाहिए? किस आधार पर हम सुखी होने का आभाष व्यक्त कर सकते हैं? देश के नागरिकों की इस दुर्दशा का दायित्व किसी को तो स्वीकार करना ही होगा। सरकार गरीबी और भुखमरी उन्मूलन और उध्दार के लिए जनकल्याणकारी योजनाओं का संचालन कर रही है। सरकार का बोझ उठा कर चलने वाले आए दिन कहीं ना कहीं जनकल्याणकारी योजनाओं का उद्घाटन कर, उन्मुक्त योजनाओं को जनता को समर्पित कर रहे हैं। मंच पर गाल बजाना, जनता को जुमले सुनाना आसान काम हो सकता है। 

परंतु जनता की सहृदयता से सेवा करना कल भी दुर्गम कार्य था और आज भी दुर्गम ही बना हुआ है। भारत की जनता की पीड़ा का बखान करना देश के सभी विदूषियों का दायित्व बनता है। सच कड़वा होता है। लेकिन सच से भाग पाना संभव नहीं है। विश्व में भारत के नाम इस प्रकार की विशेष उपाधि प्रभावित नागरिकों की सत्यता स्पष्ट करतीं हैं। किसी राष्ट्र चिंतक ने इस विषय पर आत्मग्लानि प्रतीत नहीं की। 9.70 करोड़ गरीब, कुपोषित वर्ग के लिए कोई सांत्वना, संवेदना शेष नहीं रह गई है। राष्ट्र के नेता तो कर्तव्यनिष्ठा से इस समस्या के समाधान पर दिन-रात बिना रुके, बिना थके कार्य कर रहे हैं। परंतु देश के ठेकेदारों में कोई तो 'आस्तीन का सांप' है जो इस देश को ड़सने का कार्य कर रहा है।

राधेश्याम   'निर्भयपुत्र'


शनिवार, 15 अक्तूबर 2022

चांद बता तेरा मजहब क्या 'संपादकीय'

कभी ईद पर दीदार, कभी करवा चौथ पर इन्तजार

तो चांद बता तेरा मजहब क्या है ?

अगर तू इसका-उसका हैं, सबका है तो फिर

ये ज़मीं पर तमाशा किसका है ?

कभी कभी मन अनायास ही इस देश के भीतर चल रही जाति वादी प्रतिद्वन्दिता पर सोचने का प्रयास करने लगता है। प्रकृति अपनी पुरातन परम्परा पर आज भी कायम है। नियमित समय के अनुसार उसका होता रहता स्वयंमेव संचालन है। मगर मगरुर मानव समाज मुगालता पाले खुद को ही खुदा साबित करने में वह हर काम कर रहा है। जिसको प्रकृति कभी स्वीकार नहीं करती ? तमाम हिस्सों मे बंट गई धरती! मगर न आसमान बंटा! न हवा, न पानी बंटा! जलजला में बंटवारा हुआ। न सुनामी में हिस्सा लगा! न सूरज की गर्मी बंटी! न चांद की  नर्मी में हिस्सा हुआ! कोई चांद का दीदार कर जीवन धन्य समझता है। तो कोई जिन्दगी के खेवनहार की सलामती के लिए चांद का दीदार कर अपने परिवार के सुखमय जीवन की कामना करता है? हवा भी उभयलिंगी है। फिर कीस बात को लेकर समाज धर्म मजहब के ठिकेदार करते रहते हैं कूराफात! जब ईद' दीवाली' वराफात' एक ही साथ एक धरा पर परम्परा बनकर जिवन्तता बनाए हुए हैं। धर्म के भगवान, मजहब के रब को भी सोचना पड़ता होगा जब एक ही धरती एक ही आसमान तो किस बात के लिए बन गये हिन्दू और मुसलमान। जीवन का आखरी सफर भी तन्हा तन्हा गुजरता है, न धार्मिक लोग साथ साथ जाते! न मजहबी लोग साथ आते हैं। हर कोई अकेला अकेला ही कायनात के मालिक के पास पहुंचता है।कर्मों का लेखा जोखा अपना देखता है। इन्सानियत को बांटने वालों औकात हो तो रब और भगवान के सम्विधान को भी बदल दो! वहां क्यों असहाय बन जाते हो! लोगों के दिलो में तफरका का अवसाद भर कर इन्सानियत का कत्लेयाम कराने वालों कुछ तो शर्म करो? इस धरा पर जब अवतरित होते हो तो इन्सान पैदा होते हो लेकिन समाज के स्वार्थी उपर वाले के बिधान में भी हस्तक्षेप कर किसी को हिन्दू किसी को मुसलमान बना देते हैं। कोई मस्जिद में अपनी जीद्द पूरी करने की कसम खाता है! तो कोई मन्दिर में अपनी अहमियत को तबज्जह देने का वीणा उठाता है! इस इन्सानी खेल को देखकर बिधाता हैरान होकर मूस्कराता हैं?धरती एक आसमान एक भगवान एक प्रकृति का सम्विधान एक इन्सानियत का रास्ता नेक, तो फिर मानव समाज कैसे हो गया अनेक? सूरज चांद में बंटवारा क्यों नहीं होता ? हवा पानी में हिस्सा क्यों नहीं लगता?नदीयो तथा समन्दर का नाम आज तक नहीं बदला! पर्वत पहाड़ की दहाड़ आज तक सदियों से एक ही तरह कायम है! पशु पक्षियों का नाम भी न हिन्दू बदल पाए न मुसलमान!!दिशाएं आज भी सदियों से अपने पुरातन नाम के साथ प्रचलन में प्रतिबिम्बित हो रही है। ऋतुएं भी सदियों से एक ही नाम से परिभाषित है। फूल भी अपनी परम्परा के नाम में सुवाषित है। उनके नाम के साथ कोई बदलाव नहीं हुआ! फिर इन्सान क्यों बदल गया! धर्म मजहब के ठीकेदार बताएंगे चांद का धर्म क्या है?सूरज का धर्म क्या है? धरती किस धर्म को मानती है? हवा का धर्म क्या है‌। अगर नहीं बता सकते तो समाज के ठेकेदारों इन्सानियत में विखंडन की सियासत बन्द कर दो!उपर वाला कभी माफ नहीं करेगा? आज मानवता के बिनास‌ के लिए धर्म मजहब के ठेकेदारों केवल तुम जिम्मेदार हो?कायनात के संचालन के लिए बनाए गए कानून का परिवर्तन करने वाले तुम कौन होते हो। न आजतक न कोई अल्लाह को देखा न भगवान को लेकिन इन्सान को तो सभी ने देखा है। फिर भी मन्दिर मस्जिद की जिद्द में इन्सानियत का कत्लेयाम आम बात हो गई है। इन्सानियत का पूजारी बनो नेकी के रास्ते पर चलो मालिक की नजर में दरबदर होने से बचो। कुछ भी साथ नहीं जायेगा! न रियासत न सियासत। मानवता के संरक्षण में सहयोगी बनो। हर खता पर विधाता इन्तकाम ले रहा है। कभी महामारी बन कर तो कभी बिमारी बनकर!जब सब कुछ सबका है, तो दिलों में क्यों तफरका है‌। सम्वेदना के सागर में इन्सानियत की कश्ती पर विडम्बना के भार से बोझिल मानवता के पतवार के सहारे समरसता के साहिल पर एकता के लंगर को मजबूती से स्थापित होने में अवरोध न बने। मतलब की बस्ती में वैमनश्यता की खेती बन्द करें वर्ना मालिक का कहर गांव से लेकर शहर तक को मिनटों में खाक में मिला देगा।

जगदीश सिंह



रविवार, 14 अगस्त 2022

तिरंगा   'संपादकीय'

तिरंगा   'संपादकीय' 

मेरी आन तिरंगा है, मेरी शान तिरंगा है, 
मेरी जान तिरंगा है।
व्यापार तिरंगा है, नवाचार तिरंगा है। 
कितना बदला हमारा देश, गरीब नंगा है।

15 अगस्त, सन 1947 की उस रात जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आजाद भारत में अपना पहला भाषण दे रहे थे, तब गांधी ने समारोह में शामिल होने से मना कर दिया। स्वत्रंता दिवस समारोह में शामिल होने के लिए नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने साझा निमंत्रण गांधी को भेजा लेकिन इसके बावजूद गांधी नहीं आए। शायद वो यह सब कुछ देख पा रहे थे, जो धर्म के आधार पे किए गए विभाजन के बाद होने वाला था।
आज ही के दिन हुए इस शर्मनाक विभाजन में हिन्दुस्तान और पाकिस्तान तो बन गया। लेकिन, थोड़ा हिन्दुस्तान पाकिस्तान में रह गया और थोड़ा पाकिस्तान हिन्दुस्तान में। शायद यह सर्जरी पूरी सफल नहीं हुई थी, बस भौगोलिक विभाजन किया गया। लाहौर और अमृतसर के बीच कुछ तथाकथित जानकारों ने एक लकीर खींच कर समझा कि बस हो गया। सबने ज़मीन तो बाँट ली, लेकिन लोगों का क्या ?
जो अपना घर नहीं छोड़ना चाहते थे, उन्हें लगा कि ये सब समय के साथ धीरे-धीरे समान्य हो जाएगा। वह इस उम्मीद में घरों में रहकर सब बर्दाश्त करते रहे, कि जिन्ना है तो क्या हुआ हमारे पुरखे तो नवाब शाह के ही है, मैं अपना घर छोडकर क्यूं जाऊं ? या इस तरफ़ नेहरू है तो क्या हुआ ? मैं तो यही दिल्ली में पैदा हुआ हूँ, यहाँ मेरा घर है, मैं तो यहीं पैदा हुआ यही मरूंगा। फिर मेरे बाप दादा भी तो यहीं दफन हैं। मैं उन्हें यहाँ ऐसे छोड़कर कैसे चला जाऊँ ?

लेकिन हुआ कुछ और ही...
जिन्होनें घर नहीं छोड़ा वो जबरन निकले गए उनका दर्द तो शब्दों में बयां भी नहीं किया जा सकता। उनकी तो उम्मीद तक ने दम तोड़ दिया था। मुश्किल से अनजान जगह आकर नई शुरुआत करना, उस पार अपना सब कुछ होते हुए भी बेघर मैदानों में एक टेंट में बच्चों के साथ सालों तक जिंदगी गुजारना।

कभी सोचा ? ये सब किस के लिए था ? उन नेताओं की कुर्सी के लिए ? जिन्होनें आजादी तो दिलवा दी, लेकिन सत्ता के स्वार्थ के लिए हिन्दू और मुस्लिम जैसे शर्मनाक धार्मिक आधार पर लोगों को बटवारा स्वीकार कर लिया ? सूखी लकड़ी की तरह सबको वर्षों तक झोंकते रहे दंगों की भट्टी मे अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए ? ताकि, उनकी सात पुश्तों का इन्तेजाम हो जाए। फिर उसकी कीमत चाहे हजारों लाखों बच्चों के सिर से उनके माँ-बाप का साया छिन जानां ही क्यूँ न हो ? लड़ा दो बस, कभी मुस्लमान के पक्ष में खड़े हो जाओ, तो कभी हिन्दू के पक्ष में ?  कितना सब कुछ सबने खोया है।
लेकिन, दुःख इस बात का है, कि आम आदमी को अब तक यह गंदा खेल समझ नहीं आ रहा।
इस मुल्क में सभी मतलब सभी नेताओं ने शुरू से ही अपनी सत्ता की हवस के चलते जो आम लोगों के साथ किया है, वह क्षमा योग्य बिल्कुल नहीं हैं। चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लमान, सिंधी हो या दिल्ली के सिक्ख, चाहे वो कश्मीरी पंडित हो या फिर गोधरा के दंगों में मारे गये देश के नागरिक या फिर कश्मीर घाटी अथवा मुंबई की होटल ताज में हुए आतंकी हमले में मारे गए आम नागरिक। सबने कीमत चुकाई है, सत्ता सुख भोगने को लालायित लोगों के अहम की।
राजनीति के पास दिल तो होता नहीं, जो सत्ता की भूख से ऊपर उठ कर य़ह दर्द महसूस कर सके।
जिस तरह से मुस्लिम तुष्टीकरण की बात की जाती रही है इतने सालों तक, और हर सवाल का जवाब वर्षों तक नेताओं द्वारा सर्वधर्म समभाव , अल्पसंख्यक संरक्षण और पिछड़े वर्ग का उत्थान बता कर सत्ता साधने का धूर्त खेल खेला जाता रहा है, बिल्कुल उसी तरह से अब एक नया दौर चल पड़ा है। जिसके चलते जातीय ध्रुवीकरण और इतिहास में की गई गलतियों को सुधारने के नाम पर, सत्ता साधन किया जा रहा है। वैचारिक अभिव्यक्ति की आजादी के रास्ते संकरे हो गए हैं। जिस तरफ देखो उस तरफ लोगों ने अलग-अलग रंग के चश्मे लगा रखे हैं। जिससे उन्हें उसी रंग का भारत दिखाई देता है, जो उन्हें अपनी सत्ता साधने में मशगूल राजनीतिक दल दिखाना चाहते है। मन की बात कहने सुनने से ज्यादा पकड़ कर सुनाने का चलन चल पड़ा है। योग्यता हो या न हो, बस परंपराओं के नाम पर अयोग्य लोगों को देश की बागडोर संभलाने की आतुरता देखी जा रही है। योग्यता अयोग्य के सिंहासन के पाये के तले दम तोड़ रही है। पिछड़े वर्ग के संरक्षण का भारी दंभ भरने वाले लोगों के बीच एक 8 साल के बच्चे को मात्र इसलिए जान से मार दिया जाता है। क्योंकि उसने अपने उच्च जाति है। शिक्षक के मटके में से पानी पी लिया। सही बात खुल कर कहने वालों की राष्ट्रभक्ति पर जातिवाद की चिलम लिए घूम रहे समूह प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं। कौन कितना राष्ट्रभक्त है ? उसका निर्णय सत्ता की ड्योढी पर बैठे हुए स्वामिभक्त कर रहे हैं। लेकिन, इस सबके बीच में भी यह देश किसी भी कीमत पर अपना मूल रूप खोने को तैयार नहीं है।
देश के वैज्ञानिक मंगल तक जा पहुंचे हैं, देश की प्रतिभाएं पूरे विश्व में अपनी योग्यता का झंडा गाड़ रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का गौरव बड़ा है। विश्व को भारत में विश्व गुरु की आंशिक झलक दिखाई देने लगी है, सोशल मीडिया के माध्यम से सूचना की गति बढ़ी है। जिससे आम आदमी वैचारिक तौर पर पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है। आम आदमी में राष्ट्रीयता का भाव बड़ा है। रुपया कमजोर हुआ है। लेकिन, हमारे उद्यमियों का हौसला अब भी बुलंद है और उम्मीद अब भी कायम है।

राजनीति का क्या है ? 
राजनीति दोष लगाने और श्रेय खाने का खेल है और इस खेल के पारंगत खिलाड़ी इस देश में शुरू से ही बहुत तादाद में रहे है। जिसका शिकार आम आदमी सदा से होता रहा है। लेकिन अब लगता है कि वह समय आ गया है कि इन राजनीतिक खिलाड़ियों को इस देश का आम आदमी सामने बैठकर आंखों में आंखें डाल कर य़ह कह दे कि नेताजी! मैं बेवकूफ नहीं हूँ, मुझे सब दिखाई दे रहा है। तुम्हें राज करना है राज करो। लेकिन, तुम्हारा राज करना इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्वपूर्ण है इस देश में एकता और शांति बनाए रखना।
आजादी की 75 वीं वर्षगांठ पर आजादी का अमृत महोत्सव मनाने के लिए जिस तरह से 15 अगस्त इस बार आम आदमी के त्योहार के रूप में मनाया जा रहा है। ऐसा आज से पहले कभी भी देखने को नहीं मिला है। जिसके लिए यह देश, आप और हम सब लोग बधाई के पात्र हैं। तिरंगा हमारा स्वाभिमान है, उसका अपमान नहीं होगा।
नरेश राघानी

शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

मेरे बच्चे 'संपादकीय'

मेरे बच्चे    'संपादकीय' 

सबसे सुंदर, सबसे अच्छे।
नंगे हो या पहने हो कच्छे।
काले-गौरे, प्यारे-प्यारे बच्चे।

दुनिया में थलचर-जलचर, नभचर-निशाचर आदि कई प्रकार के जीव सार्वभौमिक अनुसरण करते हैं। ज्यादातर लोग इस विषय से परिचित है। सभी पशु-पक्षी, जीव-जंतु प्रजनन करते हैं, अपने बच्चों का पालन पोषण करते हैं, परिवार, जाति और समूह की रक्षा करते हैं। जब तक शिशु सामाजिक परिवेश में ढलने की स्थिति में नहीं होता है, तब तक उसका संरक्षण, पोषण माता-पिता पूरी निष्ठा के साथ करते हैं। यह एक स्वाभाविक गुण है, सभी का यह स्वाभाविक गुण है। सभी जीव-जंतु विवेक और बुद्धि का उपयोग करते हैं। परंतु, केवल मनुष्य एक ऐसा विवेकी जीव हैं, जो सर्वाधिक तीव्रबुद्धि का स्वामी है। मनुष्य की तीव्र बुद्धि के कारण सार्वभौमिक सृष्टि में कुल मानव जाति का 60 प्रतिशत हिस्सा कुपोषण का शिकार है। 
प्रतिस्पर्धा, अत्याधुनिकता, साम्राज्यवाद नीति, प्रभावी वित्त व्यवस्था, शक्तिसंचय एवं अधिकारिक शासन प्रणाली के मकड़ जाल में संपूर्ण मानव जाति फंस गई है। परिणाम स्वरूप केवल भारत में कुपोषण से होने वाली बीमारियों के कारण 17 लाख लोगो की मृत्यु हो जाती है। केवल भारत में 71 प्रतिशत नागरिक कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं। आयात-निर्यात एवं वैश्विक सामंजस्य में संतुलन स्थापित करने के प्रयास में यह भीमकाय संकट विश्व के साथ-साथ भारत में भी गहराता जा रहा है। एक तरफ जलवायु परिवर्तन संपूर्ण पृथ्वी के लिए संकट बन चुका है। यह समस्या अमीर-गरीब, छोटे-बड़े के भेदभाव से इतर है। किंतु भुखमरी और कुपोषण ऐसी समस्या नहीं है, जो मानव के नियंत्रण से बाहर है।
विश्व में एक करोड़ से अधिक लोग भुखमरी व कुपोषण से उत्पन्न होने वाले रोगों के कारण मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में कोई विकसित या विकासशील देश का प्रत्येक नागरिक मेरे बच्चों की चिंता में व्यस्त है। इसी कारण हमने उन बच्चों को बेगाना कर दिया है, जो हमारे स्नेह और सानिध्य के अधिकारी हैं। यदि समय रहते लालची और स्वार्थी मानव वातानुकूलित समावेशी विचारों की अंतोगत्वा  गृहण नहीं करेगा, तो मानव दुष्कर परिणाम झेलने के लिए तैयार रहें।
चंद्रमौलेश्वर शिवांशु  'निर्भयपुत्र'

शुक्रवार, 24 जून 2022

हमाम में सब नंगे 'संपादकीय'

हमाम में सब नंगे   'संपादकीय' 

देश में कहीं धुआं तो कहीं शोर है, 
चौकीदार बैठा है दर पर या कोई चोर है। 
नमन, खून से राष्ट्र को सिंचने वाले सैनिक, 
सामने दुश्मन ताकतवर और मुंह जोर है। 

सैनिक भर्ती प्रक्रिया में 'अग्निवीर' योजना सम्मिलित करने से देश का युवा आक्रोशित हो गया है। आक्रोश ने आंदोलन का रूप धारण कर लिया है। आंदोलन हिंसक बनने से पूर्व ही राज्यों की सरकारों ने सख्ती बरतनी शुरू कर दी हैं। जिसके कारण युवा वर्ग अपने अधिकार की लड़ाई को विराम लगा कर, मुंह बंद करने के लिए विवश हो गया। युवा वर्ग योजना लागू करने से आहत है। सेना में यह उपयोग किस परिणाम तक पहुंचेगा या 'अग्निवीर' योजना के सामने बेरोजगार युवा नतमस्तक होंगे, यह कहना कठिन है। इतना तो कहा ही जा सकता है कि राष्ट्र की आधारशिला के दो स्तंभ है, 'जवान और किसान'। इन दोनों वर्गों की उपेक्षा राष्ट्र निर्माण में सदैव बाधा उत्पन्न करती है। 
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि योजना के संबंध में पक्ष-विपक्ष दोनों हमलावर बने हुए हैं। सत्ता पक्ष योजना के लाभ बताते नहीं थकता है। दूसरी तरफ विपक्ष युवा वर्ग की अनदेखी के आरोप लगाने से बाज नहीं आ रहा है। सत्तापक्ष की उदारता और युवा वर्ग के हित को सामान्य तौर पर समझा जा सकता है। 4 वर्ष की सैन्य सेवा का अवसर सरकार की महान सोच का अनुसरण करती है। किंतु पेंशन आदि सुविधाओं को प्रदान न करना, उपेक्षा को उजागर करता है। सैन्य सेवा प्रदान करने वाला कोई भी व्यक्ति सेवा समाप्ति के पश्चात सामान्य जीवन से विरक्त ही रहेगा। कुछ लोग सामान्य जीवन यापन कर सकते हैं, परंतु सभी नहीं। ऐसी परिस्थिति में सैनिक को पेंशन आदि की सुविधा प्रदान करनी चाहिए। 
युवा वर्ग बेरोजगारी की दलदल में धंसा जा रहा है पक्ष और विपक्ष राजनीति का शुद्ध लाभ कमा रहे हैं। विधायक-सांसद 5 वर्ष के लिए निर्वाचित होते हैं और पेंशन, भत्ता आदि सब सुविधाएं प्राप्त करते हैं। किसी विधायक ने किसी राज्य की विधानसभा में यह प्रस्ताव नहीं रखा है कि हमारी पेंशन, भत्ते व अन्य सुविधाएं प्रतिबंधित कर दी जाए। किसी सांसद ने लोकसभा या राज्यसभा में यह आवेदन नहीं किया है। क्योंकि जनता का शोषण हो या कल्याण, दोनों स्थिति में स्वयं का स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए। बयान बाजी के अलावा किसी नेता ने 'अग्निवीर' के विरुद्ध आंदोलन का समर्थन करने की चेष्टा मात्र भी नहीं की है। क्योंकि राजनेताओं का यही काम है। 
4 वर्ष की सेवा के पश्चात 75 प्रतिशत युवा पकौड़े तलना तो सीख ही जाएगा। यह नीति युवा वर्ग के विरुद्ध है। किंतु युवा वर्ग को किसी दल अथवा संगठन का साथ नहीं मिला है। सख्त कार्रवाई का भय दिखाकर मुंह बंद करने का घृणित कार्य किया गया है। युवा वर्ग को अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखने चाहिए। आंदोलन का आधार हिंसा नहीं है अहिंसा है। किसी राजनेता से कोई अपेक्षा करना धूल में लट्ठ मारने के जैसा है, क्योंकि हमाम में सब के सब नंगे हैं।
राधेश्याम 'निर्भयपुत्र'

मंगलवार, 21 जून 2022

योगेश्वर 'संपादकीय'

योगेश्वर    'संपादकीय' 

योग भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। योग-प्राणायाम सनातन संस्कृति में एक विशेष महत्व रखता है। पुरातन काल से योग-साधना का वर्णन किया गया है। कई साधक-तपस्वियों ने योगी पद प्राप्त किया है। भगवान श्री कृष्ण को 'योगेश्वर' नाम से संबोधित भी किया गया है। अर्थात, योगियों के ईश्वर का वर्णन भी किया गया है। इससे यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि योग की उत्पत्ति और सामूहिक उपयोग का सदैव भारत में प्रचलन रहा है। योग के महत्व को विश्व स्तर पर प्रचारित करने का श्रेय माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है। आज 'विश्व योग दिवस' पर संपूर्ण विश्व में योगासन अभ्यास किए गए। इस माध्यम से योग-आसन को विश्व में बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है। आधुनिकता और प्रतिस्पर्धा की होड़ में योग के लाभ को जन-जन तक पहुंचाने का सराहनीय प्रयास किया जा रहा है। यह जनकल्याण की भावना को प्रदर्शित भी करता है। लेकिन दिखावा कुछ ज्यादा हो गया है। योग दिवस पर योगासन करते हुए फोटो-वीडियो को प्रचारित करना योगासन का परिहास हो गया है। योग हमारे जीवन में दैनिक गतिविधियों में सम्मिलित होना चाहिए। असाध्य व जटिल रोग मुक्ति का एक सरल साधन योग हैं। इंद्रियों और ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करने का एकमात्र उपाय योग हैं। 
हालांकि इसके विपरीत कुपोषित-अव्यवस्थित वर्ग इस मर्म से अनभिज्ञ हैं।कुपोषण-भुखमरी के कारण चटनी के साथ रूखा-सूखा खाने वाले व्यक्ति को योग की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है। न तो उनके शरीर में इतनी चर्बी चढ़ी होती है और नए कोई वसा वाला भोजन ही उन्हें प्राप्त होता है। जिसके कारण वसा से होने वाला कोई रोग उत्पन्न हो। ऐसी स्थिति में योग के उपभोग का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है। परंतु जीवन पर मोटापा बोझ बनने लगता है। शरीर रोगों का घर बन जाता है। ऐसी स्थिति में योग का विशेष महत्व हो जाता है। योग की सख्त आवश्यकता वालों की संख्या भारत की कुल आबादी की 20 प्रतिशत से अधिक नहीं है। इसके विपरीत कुपोषण के शिकार, भुखमरी से जुझने वालों की संख्या 80 प्रतिशत के लगभग है। सीधे तौर पर कहा जाए तो योग की सख्त आवश्यकता मात्र 20 प्रतिशत लोगों को ही है। 80 प्रतिशत लोगों को योग कि नहीं पौष्टिक भोजन की है। कुपोषण के शिकार भुखमरी से जुझने वालों की संख्या 4 गुना अधिक है। 
ऐसी स्थिति में जो खर्च योग शिविरों के आयोजनों पर किया जा रहा है। यदि वह धन कुपोषित वर्ग के प्रति खर्च किया जाए तो कुछ लोग, कुछ समय तक भरपेट पौष्टिक भोजन कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि नमक-मिर्च की चटनी और रुखा-सुखा भोजन उनकी जटाग्नि शांत नहीं कर पाता है। पेट तो खूब पानी पीकर भी भर जाता है। किंतु आवश्यक तत्वों की आपूर्ति नहीं हो पाती है। 'योगेश्वर' की इतनी अनुकंपा तो उन पर बनी हुई है। इसके बाद तो हमें खुद के गिरेबान में झांकने की जरूरत है।
राधेश्याम   'निर्भयपुत्र'

रविवार, 22 मई 2022

पहली कल्पना 'संपादकीय'

पहली कल्पना    'संपादकीय' 

क्या तुमने कुछ ऐसा देखा है....
रात भरी अंधेरी में, सूरो सा, 
दिन के उजालों में, गूढ़ सा, 
मैंने गज-लख दूरो से, 
विहीन व्योम में उसको देखा है.... 
जो तेरा है, ना मेरा है सन्यासी है, 
मन फिर भी उसका अभिलाषी है, 
चाहत है मिथ्या, निकृष्ट, 
रख लिया जैसे कोई श्वेत पृष्ठ, 
सबने उठना यूं ही सीखा है....
प्रतीत रहता है तुझमें-मुझमें, 
अतीत रहता है उसी दिन से, 
साये में, काया में हर् फराह में, 
जुर्म-धर्म की सहस्त्र बांहों में, 
लेखों में सारे उसका लेखा है.... 
क्या तुमने कुछ ऐसा देखा है....

संपूर्ण ब्रह्मांड में मनुष्यों के जीवन में साहित्य विशेष महत्व रखता है। गद्य-पध दोनों स्थानों पर रचित कृतियों में कल्पना का सजीव अस्तित्व स्थित है। किसी प्रक्रिया के घटित होने से पूर्व ही विवरण रचना कल्पना ही तो है। किसी पात्र अथवा परिस्थिति की कल्पना का सामान्य जीवन में सीधा संबंध बना रहता है। मात्र, कल्पना की सच्चाई से रूबरू कराना ही है। किसी रचनाकार के मस्तिष्क में कोई कल्पना स्थित हो जाती है। कल्पना के मूल आधार पर कोई रचनाकार कल्पनाओं को स्वरूपित-अंकित करके, पंख लगा देता है। पात्र के साथ न्याय अथवा अन्याय की उधेड़बुन में रचनाकार कल्पना के सागर में डूबता चला जाता है। पात्र हित को ध्यान में रखकर कल्पनाएं गढ़ना, जीवंत करना विषय वस्तु पर यथास्थिति बनाए रखना। कहानी, उपन्यास, नाटक, छंद, चौपाई आदि कोई भी शैली हो। रचना में पात्र की विशेषता को बरकरार रखने की रचनाकार की रचना का विश्लेषण करता है। कोई भी रचनाकार किसी सत्य आधारित रचना को शत प्रतिशत सत्य से जोड़ कर नहीं रख सकता है। किंतु कल्पनाएं रिक्त स्थान को पूर्ण कर लेती है। जो भविष्य में घटित होने वाला है उसकी कल्पना करना, विस्मृत से रोमांच उत्पन्न करने वाला है। जब कोई कल्पना सच में अवतरित हो जाती है। तब रचनाकार मन ही मन कल्पना को उकेरने का हर्ष प्रतीत करता है। परंतु कल्पना के दूसरे कुरूप पहलू को देख कर ठिठक जाता है। कल्पना का आधा सच रचनाकार को निराश करता है। परंतु उसी के साथ अगली कल्पना की गहराइयों में डूब जाने के लिए प्रेरित करता है। महर्षि वेदव्यास के द्वारा महाकाव्य 'महाभारत' एवं महान साहित्यकार बाल्मीकि के द्वारा 'रामायण' की रचना घटना के घटित होने से पूर्व कर ली जाती थी। सूरदास की साहित्य में कल्पना के महत्व को समझना भी एक कल्पना ही है। आप स्वयं देखिए, "नहीं पहुंच पाता रवि, वहां पहुंच जाता है कवि"। कल्पना अद्भुत है, आखिरकार एक कल्पना ही तो है।
 वैसे तो विवेकी मनुष्य कल्पनाएं करता ही रहता है। ज्यादातर कल्पनाएं सच में रूपांतरित नहीं हो पाती है। जो कल्पना सच का रूप ले लेती है, वह कल्पना ही मर जाती है। संसार की पहली कल्पना को श्रद्धा सुमन और नवीन कल्पनाओं का स्वागत करते हैं।
राधेश्याम 'निर्भयपुत्र'

'बुंदेलखंड' को निवेश का नया गंतव्य बनाया

'बुंदेलखंड' को निवेश का नया गंतव्य बनाया  संदीप मिश्र  लखनऊ। कभी पिछड़े क्षेत्र के रूप में पहचान रखने वाले बुंदेलखंड को योगी सरकार न...