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बुधवार, 19 मई 2021

सप्तमी को गंगा स्वर्ग से शिव की जटाओं में पहुँची

गंगा सप्तमी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को कहा जाता है। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वैशाख मास की इस तिथि को ही माँ गंगा स्वर्ग लोक से भगवान शिव की जटाओं में पहुँची थीं। इसलिए इस दिन को 'गंगा सप्तमी' के रूप में मनाया जाता है। कहीं-कहीं पर इस तिथि को 'गंगा जन्मोत्सव' के नाम से भी पुकारा जाता है। गंगा को हिन्दू मान्यताओं में बहुत ही सम्मानित स्थान दिया गया है। पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार जब कपिल मुनि के श्राप से सूर्यवंशी राजा सगर के 60 हज़ार पुत्र जल कर भस्म हो गए, तब उनके उद्धार के लिए राजा सगर के वंशज भगीरथ ने घोर तपस्या की। वे अपनी कठिन तपस्त्या से माँ गंगा को प्रसन्न करने में सफल रहे और उन्हें धरती पर लेकर आए। गंगा के स्पर्श से ही सगर के 60 हज़ार पुत्रों का उद्धार हो सका। गंगा को 'मोक्षदायिनी' भी कहा जाता है। विभिन्न अवसरों पर गंगा नदी के तट पर मेले और गंगा स्नान आदि के आयोजन होते हैं। इनमें 'कुंभ पर्व', 'गंगा दशहरा', 'पूर्णिमा', 'व्यास पूर्णिमा', 'कार्तिक पूर्णिमा', 'माघी पूर्णिमा', 'मकर संक्रांति' व 'गंगा सप्तमी' आदि प्रमुख हैं।

गुरुवार, 6 मई 2021

इस्राईल की बर्बरता के खिलाफ घरों में रहकर विरोध

माहे रमज़ान के आखरी जुमा पर यौमे क़ुद्स दिवस पर होगा बैतुल मुक़द्दस की आज़ादी और इस्राईली आतंकवाद का ऑनलाईन विरोध
बृजेश केसरवानी  
प्रयागराज। माहे रमज़ान के आखरी जुमा जुमम्तुल विदा को प्रत्येक वर्षों की भांति इस वर्ष भी विश्व क़ुद्स दिवस के मौक़े पर कोरोना संक्रमण को देखते हुए बाद नमाज़ ए जुमा अपने अपने घरों से इस्राईल की बर्बरता के खिलाफ और बैतुल मुक़द्दस की आज़ादी के लिए ओलमाओं ने घरों मे रहकर विरोध दर्ज कराने की अपील की है।मदरसा अनवारुल उलूम के प्रधानाचार्य व शिया धर्म गुरु मौलाना जवादुल हैदर रिज़वी ने 7 मई शुक्रवार को जुमत्तुल विदा के मौक़े पर अन्तराष्ट्रीय क़ुद्स दिवस पर मरजईयत की आवाज़ पर लब्बैक कहते हुए अपनी दीनी व समाजिक फरीज़े को कोरोना संक्रमण को दृष्टि मे रखते हुए अपने अपने घरों से विरोध स्वरुप बाँहों मे काली पट्टी बाँध कर विरोध दर्ज कराने की अपील की।कहा विरोध की फोटो और वीडियो को सोशल साईट पर अपलोड कर इस्राइली आतंकवाद का विरोध और बैतुल मुक़द्दस की आज़ादी को संयुक्त राष्ट्र कार्यालय तक पहोँचा कर ज़िन्दा और अमन पसन्द होने का सबूत पेश करें।उम्मुल बनीन सोसाईटी के महासचिव सै०मो०अस्करी,मस्जिद क़ाज़ी साहब के मुतावल्ली शाहरुक़ क़ाज़ी,मस्जिदे खदीजा करैली के हसन आमिर,शिया करबला कमेटी के नायब सद्र शाहिद अब्बास रिज़वी,अन्जुमन नक़विया रजिस्टर्ड के रौनक़ सफीपुरी,हसन नक़वी,मस्जिद गदा हुसैन के नायब मुतावल्ली शाहरुक़ हुसैनी आदि ने भी अहले इसलाम से मज़हबे इसलाम का पहला क़िबला बैतुल मुक़द्दस की आज़ादी व इस्राइली आतंकवाद का विरोध घरों मे रहकर विभिन्न तरीक़े से करने और  वैश्विक शक्तियों को इसका ऐहसास कराने को जुम्मतुल विदा के दिन अन्तराष्ट्रीय यौमे क़ुद्स पर शान्तिपूर्वक विरोध करने की अपील की।

यात्रा स्थगित, धामों में कपाट खोल पूजा-अर्चना होगी

कपाट खोलने की ब्यवस्थायें जुटायेगा दल

-कोरोना महामारी के कारण मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के दिशानिर्देश से फिलहाल यात्रा स्थगित धामों में कपाट खुलेंगे, पूजा अर्चना चलती रहेगी:सतपाल महाराज

-कोरोना महामारी को देखते हुए सांकेतिक रूप से खुलेंगे कपाट,यात्रियों को अनुमति नहीं : रविनाथ रमन

पंकज कपूर 

उखीमठ/ रूद्रप्रयाग/ देहरादून। श्री केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की ब्यवस्थाओं हेतु देवस्थानम् बोर्ड का 12 सदस्यीय दल आज प्रात: श्री ओंकारेश्वर मंदिर उखीमठ से प्रात: 8.30 बजे केदारनाथ हेतु रवाना हुआ। 
दल की अगवाई देवस्थानम बोर्ड के अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी बी. डी. सिंह कर रहे है।

पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने कहा है कि कोविड-19 को देखते हुए माननीय मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के दिशा निर्देश में फिलहाल चारधाम यात्रा पर रोक लगायी गयी है केवल कपाट खुलेंगे नियमित पूजाअर्चना चलती रहेगी। स्थितियां सामान्य होने पर चारधाम यात्रा को चरणबद्ध रूप से शुरू किया जायेगा।

देवस्थानम बोर्ड का अग्रिम दल केदारनाथ मन्दिर में पेयजल, विद्युत, बर्फ हटाने का कार्य को, साफ सफाई, सेनिटाईजेशन, रावल/पुजारी आवास निर्माण प्रगति के कार्यों का अवलोकन करेगा। गढ़वाल आयुक्त/उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रविनाथ रमन ने कहा है कि सरकार के निर्देश पर कोरोना महामारी को देखते हुए चारधाम यात्रा पूर्णत:स्थगित है केवल सांकेतिक रूप से धामों के कपाट खोले जाने हैं। कोरोना प्रोटोकाल का पालन करते हुए केवल रावल पुजारी एवं संबंधित हकहकूकधारियों के चुनिंदा प्रतिनिधि धामों में जायेंगे। देवस्थानम बोर्ड के कार्याधिकारी एनपी जमलोकी ने बताया कि अग्रिम दल में सहायक अभियंता गिरीश देवली, भंडार प्रभारी उमेश शुक्ला, अवर अभियंता विपिन कुमार सहित विद्युत कर्मी, पलंबर और सात स्वयंसेवक शामिल है।

इस अवसर पर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी राजकुमार नौटियाल, प्रबंधक अरविंद शुक्ला, पुष्कर रावत, प्रेमसिंह रावत, पुजारी शिवशंकर लिंग, विदेश शैव भी मौजूद रहे। देवस्थानम बोर्ड के मीडिया प्रभारी डा. हरीश गौड़ ने बताया कि ग्यारहवें ज्योर्तिलिंग भगवान केदारनाथ के कपाट इस यात्रा वर्ष 17 मई प्रात: पांच बजे खुल रहे है जबकि यमुनोत्री धाम के 14 मई, गंगोत्री के 15 मई तथा श्री बदरीनाथ धाम के कपाट 18 मई को खुल रहे है किसी भी धाम में फिलहाल यात्रियों को जाने की अनुमति नहीं है।

गुरुवार, 11 मार्च 2021

कानपुर: 'महाशिवरात्रि' के पर्व पर लगीं भक्तो की भीड़

कानपुर। महानगर में शिवरात्रि के महा पर्व पर देर रात से ही शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई देने लगी। इस दौरान लाखो की संख्या में पहुचे भक्तों ने बाबा पर बेल पत्थर, दूध, दही, शहद, फूल, रोली, चन्दन से अभिषेक किया गया। शहर के सिद्धनाथ धाम मन्दिर में रात्रि दो बजे मंगला आरती के बाद से भक्तों के लिए बाबा के पट खोल दिये गए। जहा श्रद्धालुओ ने अपने आराध्य की स्तुति करते हुए दिखाई दिए। इस दौरान बाबा का श्रृंगार भी किया गया। जो अपनी अलौकिक छटा बिखेर रही थी। 

44 घंटे दर्शन के लिए खुला बाबा महाकाल का दरबार

अकांशु उपाध्याय  
नई दिल्ली। 12 ज्योतिर्लिंगों में विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकाल के दरबार में आज गुरुवार को शिव पार्वती विवाह महोत्सव महाशिवरात्रि मनाया जा रहा है। 44 घंटे अनवरत दर्शन के लिए बाबा का दरबार खुला रहेगा। देश भर से श्रद्धालुओं ने बाबा के दर्शन पानी के लिए बुकिंग पहले ही करा ली थी। तड़के भस्म आरती के बाद श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश खोल दिया गया था। जो शुक्रवार रात 11 बजे तक जारी रहेगा।
धार्मिक नगरी में आज शिवमय बनी हुई है। महाशिवरात्रि पर्व पर बाबा महाकाल के दरबार में गर्भगृह रात 2.30 बजे खोला गया था। विधि विधान के साथ पूजा अर्चना कर बाबा को निराकार स्वरूप में लाया गया और भस्म रमाकर महानिर्वाणी अखाड़े के गादीपति महामंडलेश्वर विनीत गिरी महाराज द्वारा भस्मारती की गई। महापर्व होने पर भस्मा आरती के बाद श्रद्धालुओं के लिए अनवरत 44 घंटे दर्शन प्रवेश खोल दिया गया। आज दिन भर श्रद्धालु बाबा के दर्शन कर सकेंगे। कोरोना संक्रमण काल के चलते प्रशासन ऑनलाइन अनुमति प्राप्त करने वाले श्रद्धालुओं को ही बाबा के दरबार में प्रवेश दे रहा है। श्रद्धालुओं ने 8 दिन पूर्व ही अनुमति प्राप्त करना शुरू कर दी थी। करीब 31 हजार आम श्रद्धालुओं को ऑन लाइन अनुमति मिली है। जिन्हें मंदिर में प्रवेश दिया जाएगा। वीआईपी दर्शन व्यवस्था का शुल्क 250 रुपए रखा गया है। वीआईपी श्रद्धालुओं को भी बाबा के दर्शन की अनुमति जारी है। वहीं जो श्रद्धालु बिना अनुमति मंदिर तक पहुंचे हैं। उन्हें भी व्यवस्था अनुरूप दर्शन कराए जा रहे हैं। महाशिवरात्रि पर्व को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन ने बुधवार शाम के ही सुरक्षा की कमान संभाल ली थी। श्रद्धालुओं को आसानी से दर्शन हो सके इसके पूरे इंतजाम किए गए हैं। श्रद्धालुओं को चार धाम मंदिर मार्ग से कतार लगाकर मंदिर में प्रवेश कराया जा रहा है। 45 से 50 मिनट में श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन हो रहे हैं। बिना परेशानी के श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन आसानी से हो रहे हैं। और पूरा दरबार बाबा के जयकारों से गुंजायमान हो रहा है। दर्शन के लिए अग्रिम बुकिंग के आधार पर प्रवेश दिया जा रहा है। इसके अलावा 250 रुपये के शीघ्र दर्शन पास के लिए पार्किंग स्थलों पर काउंटर स्थापित किए गए हैं। दर्शनार्थियों को मास्क, पानी की बोतल नि:शुल्क दिया जा रहा है। कलेक्टर आशीष सिंह ने कहा है। कि कोरोना नियमों का पालन कराते हुए अधिक से अधिक श्रद्धालुओं को दर्शन कराए जाएंगे।

कोई भी पर्व क्यों मनाया जाता है, जानिए महत्व

महाशिवरात्रि। कोई भी पर्व क्यों मनाया जाता है और उसका महत्व क्या है आपको ये ज़रूर जानना चाहिए

महाशिवरात्रि हो या कोई अन्य धार्मिक पर्व हो। आप मनाते हों या न मनाते हों। लेकिन कोई भी पर्व क्यों मनाया जाता है और उसका महत्व क्या है ? आपको ये ज़रूर जानना चाहिए। महाशिवरात्रि भगवान् शिव का दिन है और इसकी अपनी एक अलग महत्वता है। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में क्या फर्क है। और ये क्यों इतना शुभ है। आइये इसको समझते हैं।
पंचांग के अनुसार हर माह के चौदहवें दिन या फिर अमावस्या से एक दिन पहले वाली रात शिवरात्रि कहलाती है। पंचांग का आखिरी महीना फाल्गुन का होता है। और इस माह कि शिवरात्रि महाशिवरात्रि कहलाई जाती है। जोकि फरवरी या मार्च के महीने में पड़ा करती है। महाशिवरात्रि का अपना अलग महत्व है। और सनातन धर्म के तमाम बड़े पर्वों में से महाशिवरात्रि का पर्व एक है। यह पर्व अपने नाम के ज़रिए ही पहचाना जा सकता है। महाशिवरात्रि यानी कि शिव की महान रात। इसीलिए महाशिवरात्रि की रात में जागरण व अन्य तरह के धार्मिक कर्म किए जाते हैं। इस रात को बेहद खास रात माना जाता है। इस दिन के जितने धार्मिक महत्व बताए जाते हैं उतने ही महत्व इसके विज्ञान से जोड़े जाते हैं। इस रात को इंसान को भगवान से करीब करने की रात कहा जाता है। महाशिवरात्रि की रात से ही ग्रीष्म ऋतु की नींव पड़ जाती है। कहा जाता है। कि इंसान गर्मी के प्रभाव या फिर सूर्य के जलते प्रकाश से बचने के लिए अपने आपको इस रात भगवान शिव को समर्पित कर देतै है।
महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव का पर्व होता है। इस पर्व में भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाती है। इस रात मनुष्य अपने तमाम तरह की परेशानियों से निजात भी पा सकता है। क्योंकि भगवान शिव के पास हर समस्या का समाधान होता है। इसीलिए इस पर्व के दिन व्रत रखने की परंपरा है। व्रत शुद्धीकरण के लिए ही जाना जाता है. व्रत रखने से जहां हमारे पेट और आंत की सफाई हो जाती है। और रक्त शुद्ध हो जाता है वहीं कई तरह के रोगों से भी व्रत के सहारे मुक्ति मिल जाया करती है। और व्रत रख कर भगवान शिव की पूजा करने से भगवान से एक अलग तरह का जुड़ाव हो जाया करता है। 
महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है। और इस पर्व को किस तरह से खास पर्व कहा जाता है। यह भी हर किसी को ज़रूर जानना चाहिए। महाशिवरात्रि से पहले शिवरात्रि क्यों मनाई जाती है। इसको समझ लीजिए। ज्योतिषों का मानना है। कि हर माह की अमावस्या की रात को चंद्रमा सिकुड़ जाता है। या खिसक जाता है। ऐसे में इसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए हर माह भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाती है। क्योंकि भगवान शिव ही हैं। जो चंद्रमा के किसी भी नुकसान से मनुष्य प्रजाति को बचाने का कार्य कर सकते हैं। अब महाशिवरात्रि की बात करते हैं। हिंदू नव वर्ष शुरू होने से पहले ही साल के आखिरी महीने में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इसको इसलिए मनाया जाता है ताकि आने वाले पूरे नये साल को ही किसी भी तरह के दुष्प्रभाव से बचाया जा सके। हालांकि महाशिवरात्रि मनाए जाने और भी कई वजहें है। कुछ प्रसिद्ध मान्यताओं की बात की जाए तो उसमें ये मान्यताएं प्रसिद्ध हैं।
1. महाशिवरात्रि की रात ही भगवान् शिव ने देवी पार्वती से विवाह किया था। इसलिए हिंदू धर्म में रात को ही विवाह के लिए शुभ माना जाता है।
2. कहते हैं। कि जब देवता और राक्षस अमृत की खोज में समुद्र मंथन कर रहे थे। तब मंथन से विष निकला था। जिसे भगवान शिव ने पी लिया था। इस विष को पी लेने के कारण उनका पूरा शरीर नीला पड़ गया था। जिसकी वजह से ही भगवान शिव को नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है। इस विष को पीकर भगवान शिव ने देवताओं के साथ-साथ संसार को भी नुकसान होने से बचाया था। इसीलिए इस दिन को भगवान शिव का दिन कहा जाता है। और उनकी अराधना की जाती है। 
3. मान्यता ये भी है। कि पवित्र नदी देवी गंगा इस दिन पृथ्वी पर उतर रही थी। और पूरे पृथ्वी पर फैल रही थी। जिसे भगवान शिव ने अपनी जटाओं में धर लिया था। और पृथ्वी का विनाश होने से बचा लिया था। इसलिए भगवान् शिव को पूजा जाता है।
4. ऐसी भी मान्यता है। कि भगवान शिव ने इसी रात को सदाशिव से लिंग स्वरूप लिया था। इसलिए इसी रात भगवान् शिव को की अराधना की जाती है।
ये कुछ मान्यताएं महाशिवरात्रि के बारे में प्रसिद्ध हैं। जिनका वर्णन अलग अलग जगहों पर मिल जाता है। कहा जाता है। कि महाशिवरात्रि की रात बेहद पवित्र होती है। इस रात को कभी सोकर नहीं गवांना चाहिए। इस दिन मनोकामनाएं जल्दी पूरी होती है।
महाशिवरात्रि के दिन पवित्र नदी में स्नान करने की भी अपनी एक अलग विशेषता है। महाशिवरात्रि के दिन ही प्रयाग कुंभ का समापन होता है। जबकि हरिद्धार कुंभ का आरंभ महाशिवरात्रि के दिन से होता है। इस वर्ष यानी की साल 2021 में हरिद्धार में कुंभ मेले का आज से आगाज़ हो रहा है। जोकि प्रत्येक 12 वर्षों के अंतराल पर आयोजित किया जाता है। इस बार ग्रहों के योग से 11 वर्ष बाद ही हरिद्धार में कुंभ मेला आज से शुरू हो चुका है।
महाशिवरात्रि के इस पर्व पर आप सभी की मनोकामनाएं पूरी हो इसके लिए आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

बुधवार, 10 मार्च 2021

"महामृत्युंजय" मंत्र 'संपादकीय'

ओम त्रयंबकम यजामहे, सुगंधिम पुष्टिवर्धनम।उर्वारुकमिव बंधनात, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। नम्ः शिवाय्

'महाशिवरात्रि
' भगवान शिव के विवाह की कथा के अनुसार, (शिव महापुराण आदि ग्रंथ) यह पारंपरिक त्योहार मनाने की परंपरा है। भारत के साथ नेपाल, आदि दुनिया के कई अन्य देशों में भी 'महाशिवरात्रि' का पर्व बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। सनातन उत्पत्ति का आधार और अंत भगवान शिवशंकर को ही माना जाता है। इस दिन आस्था पूर्वक व्रत और वृतांत का तुरंत प्रभाव देखने को मिलता है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को 'महाशिवरात्रि' का व्रत किया जाता है। हिन्दू पुराणों के अनुसार, इसी दिन सृष्टि के आरंभ में मध्यरात्रि मे भगवान शिव ब्रह्मा से रुद्र के रूप में प्रकट हुए थे। इसीलिए इस दिन को महाशिवरात्रि कहा जाता है। 'महाशिवरात्रि के प्रसंग को हमारे वेद, पुराणों में बताया गया है, कि जब समुद्र मन्थन हो रहा था उस समय समुद्र में चैदह रत्न प्राप्त हुए। उन रत्नों में हलाहल भी था। जिसकी गर्मी से सभी देव दानव त्रस्त होने लगे तब भगवान शिव ने उसका पान किया। उन्होंने लोक कल्याण की भावना से अपने को उत्सर्ग कर दिया। इसलिए उनको महादेव कहा जाता है। जब हलाहल को उन्होंने अपने कंठ के पास रख लिया तो उसकी गर्मी से कंठ नीला हो गया। तभी से भगवान शिव को नीलकंठ भी कहते हैं। शिव का अर्थ कल्याण होता है। जब संसार में पापियों की संख्या बढ़ जाती है, तो शिव उनका संहार कर लोगों की रक्षा करते हैं। इसीलिए उन्हें शिव कहा जाता है। योगिक परम्परा में इस दिन और रात को इतना महत्व इसलिए दिया जाता है। क्योंकि यह आध्यात्मिक साधक के लिए जबर्दस्त संभावनाएं प्रस्तुत करते हैं। आधुनिक विज्ञान कई चरणों से गुजरने के बाद आज उस बिंदु पर पहुंच गया है। जहां वह प्रमाणित करता है, कि हर वह चीज जिसे आप जीवन के रूप में जानते हैं। पदार्थ और अस्तित्व के रूप में जानते हैं। जिसे आप ब्रह्मांड और आकाशगंगाओं के रूप में जानते हैं। वह सिर्फ एक ही ऊर्जा है। जो लाखों रूपों में खुद को अभिव्यक्त करती है। माना जाता है, कि इस दिन शंकर और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इस दिन लोग व्रत रखते हैं और भगवान शिव की पूजा करते है। 'महाशिवरात्रि' का व्रत रखना सबसे आसान माना जाता है। इसलिये बच्चों से लेकर बूढ़ो तक सभी इस दिन व्रत रखते हैं। 'महाशिवरात्रि' के व्रत रखने वालों के लिये अन्न खाना मना होता है। इसलिये उस दिन फलाहार किया जाता है। राजस्थान में व्रत के समय गाजर, बेर का सीजन होने से गांवों में लोगों द्धारा गाजर, बेर का फलाहार किया जाता है। लोग मन्दिरों में भगवान शिव की पूजा करते हैं व उन्हे आक, धतूरा चढ़ाते हैं। भगवान शिव को विशेष रूप से भांग का प्रसाद लगता है। इस कारण इस दिन काफी जगह शिवभक्त भांग घोट कर पीते हैं। पुराणों में कहा जाता है कि एक समय शिव पार्वती जी कैलाश पर्वत पर बैठे थी। उसी समय पार्वती ने प्रश्न किया, कि इस तरह का कोई व्रत है। जिसके करने से मनुष्य आपके धाम को प्राप्त कर सके ? तब उन्होंने यह कथा सुनाई थी, कि प्रत्यना नामक देश में एक व्यक्ति रहता था। जो जीवों को बेचकर अपना भरण पोषण करता था। उसने सेठ से धन उधार ले रखा था। समय पर कर्ज न चुकाने के कारण सेठ ने उसको शिवमठ में बन्द कर दिया। सयोग से उस दिन फाल्गुन बदी त्रयोदशी थी। वहां रातभर कथा, पूजा होती रही, जिसे उसने भी सुना। अगले दिन शिघ्र कर्ज चुकाने की शर्त पर उसे छोड़ा गया। उसने सोचा रात को नदी के किनारे बैठना चाहिये। वहां जरूर कोई न कोई जानवर पानी पीने आयेगा। अतः उसने पास के बील वृक्ष पर बैठने का स्थान बना लिया। उस बील के नीचे शिवलिंग था। जब वह अपने छिपने का स्थान बना रहा था। उस समय बील के पत्तों को तोडकर फेंकता जाता था, जो शिवलिंग पर ही गिरते थे। वह दो दिन का भूखा था। इस तरह से वह अनजाने में ही शिवरात्रि का व्रत कर ही चुका था। साथ ही शिवलिंग पर बेल-पत्र भी अपने आप चढ़ते गये। एक पहर रात्रि बीतने पर एक गर्भवती हिरणी पानी पीने आई। उस व्याध ने तीर को धनुष पर चढ़ाया, किन्तु हिरणी की कातर वाणी सुनकर उसे इस शर्त पर जाने दिया कि सुबह होने पर वह स्वयं आयेगी। दूसरे पहर में दूसरी हिरणी आई। उसे भी छोड़ दिया। तीसरे पहर भी एक हिरणी आई उसे भी उसने छोड़ दिया और सभी ने यही कहा कि सुबह होने पर मैं आपके पास आऊंगी। चैथे पहर एक हिरण आया। उसने अपनी सारी कथा कह सुनाई, कि वे तीनों हिरणियां मेरी स्त्री थी। वे सभी मुझसे मिलने को छटपटा रही थी। इस पर उसको भी छोड़ दिया और कुछ और भी बेल-पत्र नीचे गिराये। इससे उसका हृदय बिल्कुल पवित्र, निर्मल तथा कोमल हो गया। प्रातः होने पर वह बेल-पत्र से नीचे उतरा। नीचे उतरने से और भी बेल पत्र शिवलिंग पर चढ़ गये। अतः शिवजी ने प्रसन्न होकर उसके हृदय को इतना कोमल बना दिया, कि अपने पुराने पापों को याद करके वह पछताने लगा और जानवरों का वध करने से उसे घृणा हो गई। सुबह वे सभी हिरणियां और हिरण आये। उनके सत्य वचन पालन करने को देखकर उसका हृदय दुग्ध सा धवल हो गया और वह फूट-फूट कर रोने लगा। 'महाशिवरात्रि' आध्यात्मिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण है। इस रात धरती के उत्तरी गोलार्ध की स्थिति ऐसी होती है, कि इंसान के शरीर में ऊर्जा कुदरती रूप से ऊपर की ओर बढ़ती है। इस दिन प्रकृति इंसान को अपने आध्यात्मिक चरम पर पहुंचने के लिए प्रेरित करती है। गृहस्थ जीवन में रहने वाले लोग महाशिवरात्रि को शिव की विवाह वर्षगांठ के रूप में मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाएं रखने वाले लोग इस दिन को शिव की दुश्मनों पर विजय के रूप में देखते हैं। योगियों और संन्यासियों के लिए यह वह दिन है। जब शिव कैलाश पर्वत के साथ एकाकार हो गए थे। योगिक परम्परा में शिव को ईश्वर के रूप में नहीं पूजा जाता है। बल्कि उन्हें प्रथम गुरु, आदि गुरु माना जाता है। जो योग विज्ञान के जन्मदाता थे। कई सदियों तक ध्यान करने के बाद शिव एक दिन वह पूरी तरह स्थिर हो गए। उनके भीतर की सारी हलचल रुक गई और वह पूरी तरह स्थिर हो गए। वह दिन 'महाशिवरात्रि' था। इसलिए संन्यासी 'महाशिवरात्रि' को स्थिरता की रात के रूप में देखते हैं।

चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

सोमवार, 1 मार्च 2021

इस महीने कौन-कौन से त्योहार आएंगे, जानिए

फाल्गुन का महीना शुरू हो गया है। जी हाँ, रविवार से यानी 1 मार्च से फाल्गुन का महीना शुरू हो गया। इसे हिन्दू पंचांग का अंतिम महीना कहा जाता है। आप सभी जानते ही होंगे कि इस महीने की पूर्णिमा को फाल्गुनी नक्षत्र होने के कारण इसे फाल्गुन कहा जाता हैं। इस महीने को ही आनंद और उल्लास का महीना भी कहते है। दरअसल इस महीने बसंत का प्रभाव बढ़ जाता है और इसी के वजह से प्रेम और रिश्तों में मिठास आने लगती है। आप सभी को बता दें कि इस बार फाल्गुन मास 28 फरवरी से 28 मार्च तक रहेगा। इस बीच महाशिवरात्रि, होली, जानकी जयंती , प्रदोष व्रत , फाल्गुन अमावस्या, शनि अमावस्या, खरमास प्रारंभ, होली भाई दोज, होलिका दहन, फाल्गुन पूर्णिमा व्रत जैसे पर्व आने वाले हैं। अब आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस महीने कौन-कौन से त्योहार पड़ने वाले हैं।

1 मार्च- महाशिवरात्रि और दूसरा होली।
2 मार्च : संकष्टी चतुर्थी।।
6 मार्च- जानकी जयंती (सीताष्टमी)।
9 मार्च-  विजया एकादशी।
10 मार्च- प्रदोष व्रत (कृष्ण)।

11 मार्च- महाशिवरात्रि, मासिक शिवरात्रि, हरिद्वार कुंभ प्रथम शाही स्नान।
13 मार्च- फाल्गुन अमावस्या, शनि अमावस्या।
14 मार्च- मीन संक्रांति, पंचक, चंद्रदर्शन।
15 मार्च- खरमास प्रारंभ,।।
17 मार्च- विनायकी चतुर्थी।

20 मार्च- रोहिणी व्रत।
21 मार्च- होलाष्टक प्रारंभ।
25 मार्च- आमलकी एकादशी।
26 मार्च- प्रदोष व्रत (शुक्ल)।
28 मार्च- होलाष्टक स। होलिका दहन, फाल्गुन पूर्णिमा व्रत।

29 मार्च- होली, धुलेंडी, वसंतोत्सव, आम्रकुसुम प्राशन पोडषकारण व्रत प्रारंभ।
30 मार्च- चित्रगुप्त पूजा, होली भाई दोज।
31 मार्च- संकष्टी चतुर्थी।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

श्रीराम मंदिर निर्माण, रिद्धि-सिद्धि ने 5 लाख दिए

विधायक संजय गुप्ता की बेटियां रिद्धि-सिद्धि ने 5 लाख रुपए मंदिर निर्माण हेतु किया दान

कौशाम्बी। अयोध्या में बन रहें प्रभु श्रीराम के मंदिर के लिए धन संग्रह का कार्य से प्रारंभ हुआ। इस संबंध में एक महत्वपूर्ण बैठक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक आदरणीय रमेश एवं भाजपा के प्रदेश सह संगठन मंत्री भवानी सिंह ने विधायक चायल संजय कुमार गुप्ता के आवास से शुरुआत किया। प्रभु श्रीराम की भव्य मंदिर के निर्माण में सर्वप्रथम चायल विधायक संजय कुमार गुप्ता की बेटियां रिद्धि और सिद्धि ने 5 लाख रुपए की धनराशि मंदिर निर्माण हेतु दान किया। विधायक चायल संजय गुप्ता ने कहा 500 वर्ष के संघर्ष के बाद प्रभु श्री राम के मंदिर का निर्माण हो रहा है। यह हम सब का सौभाग्य है, हमें भी मंदिर निर्माण रूपी अनुष्ठान में आहुति करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। मेरी देवी स्वरूपा बेटी रिद्धि और सिद्धि के पवित्र हाथों से उनके नाम का यह दान प्रदान किया जा रहा है। अभी इसके अलावा भी मैं अपने नाम से और अपने विधानसभा रूपी परिवार से भी दान संग्रह करके इस मंदिर के निर्माण में अपने विधानसभा का योगदान प्रस्तुत करूंगा। इस अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री एवं कौशांबी सांसद विनोद सोनकर फूलपुर की सांसद केसरी देवी पटेल, विधायक विक्रमाजीत मौर्य, हर्षवर्धन बाजपेई, प्रवीण पटेल, डॉ. अजय भारती, लाल बहादुर शीतला प्रसाद, श्रीमती नीलम करवरिया वा पूर्व विधायक दीपक पटेल मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन जिलाध्यक्ष श्रीमती अनीता त्रिपाठी और जिला अध्यक्ष गणेश केसरवानी ने किया।
गणेश साहू 

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

मकर सक्रांति के साथ माघ मेले का आगाज

मकर संक्रांति के साथ माघ मेले का आगाज, श्रद्धालु लगा रहे पुण्य की डुबकी
बृजेश केसरवानी  
प्रयागराज। मकर संक्रांति से शुरू होकर महाशिवरात्रि तक चलने वाला आस्था का मेला ‘माघ मेला’ कोरोना महामारी के बीच गुरुवार से संगम की रेती पर शुरू हो गया। संक्रमण और ठंड व कोहरे पर आस्था भारी पड़ रही है। इस दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ पुण्य डुबकी लगाती नजर आ रही है। माघ मेला के पहले स्नान पर्व यानी मकर संक्रांति पर संगम सहित गंगा तथा यमुना के सभी स्नान घाटों पर ब्रह्म मुहूर्त से ही श्रद्धालुओं के स्नान का सिलसिला शुरू हो गया।
सुबह के समय संगम व आसपास के घाटों पर श्रद्धालु कम नजर आए। लेकिन सुबह सात बजे के बाद से श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।
संगम के अलावा गंगा के अक्षयवट, काली घाट, दारागंज, फाफामऊ घाट पर भी स्नान चल रहा है।
माघ मेले के दौरान छह प्रमुख स्नान होंगे। इसकी शुरूआत मकर संक्रांति से होती है।
श्रद्धालु कोरोना संक्रमण से बेफिक्र नजर आ रहे हैं। आधी-अधूरी तैयारी के बीच पहले स्नान पर्व पर श्रद्धालुओं का उत्साह देखने लायक है। मेला क्षेत्र में साधु संतों के पंडाल में भजन पूजन का दौर भी शुरू हो गया है। वैसे माघ मेला 27 जनवरी के आसपास रंग में आएगा। 28 जनवरी को पौष पूर्णिमा है। और इस दिन से एक महीने का कल्पवास शुरू हो जाता है।
प्रशासन का अनुमान है कि इस बार साढ़े तीन करोड़ श्रद्धालु प्रयागराज आएंगे। मेला क्षेत्र में कोरोना की गाइडलाइन को पूरा कराने के लिए सभी तैयारियां की हुई हैं। सभी तीर्थ पुरोहितों से आने वाले कल्पवासियों का ब्योरा लेकर इसे वेबसाइट पर अपलोड किया गया है। माघ मेला में कोविड-19 गाइडलाइन के चलते इनकी संख्या पिछले स्नान पर्व से कम है। पर, आस्था में कहीं कोई कमी नहीं दिखी। उधर, इसी तरह कानपुर, वाराणसी, फरुर्खाबाद और गढ़मुक्तेश्वर में भी श्रद्धालु सुबह से ही पुण्य की डुबकी लगाने स्नान घाटों पर पहुंचने लगे।
हर-हर गंगे, जय मां गंगे के जय घोष के साथ मकर संक्रांति पर्व का पुण्य प्राप्त करने को गंगा में डुबकी लगा रहे हैं। इस दौरान कई स्नान घाटों पर स्नान के मद्देनजर कोविड-19 प्रोटोकाल का पालन होता नजर नहीं आ रहा है। मेले में हर साल की तरह इस बार 5 पांटून ब्रिज, 70 किमी चेकर्ड प्लेटें बिछाई गई है। कोरोना को देखते हुए 16 पॉइंट्स बनाये गए है। हर जगह पर्याप्त मात्रा में पुलिस बल तैनात है। मेले में बिजली, पानी और स्वच्छता के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। मेलाधिकारी विवेक चतुवेर्दी के अनुसार, मेले में हर तरह से तैयारी पूरी है। सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक इंतजाम हैं। कोविड संक्रमण को देखते हुए तैयारी और बेहतर की गई है। सभी को गाइडलाइन जारी की गई है।
उधर 14 जनवरी के बाद मलमास के कारण रूके हुए मांगलिक कार्य शुरू होते हैं। इस बार गुरु शुक्र अस्त के चलते विवाह आदि मांगलिक कार्य अप्रैल से होंगे। सूर्य सुबह 8.30 बजे उत्तरायण हुआ और मकर राशि में प्रवेश कर गया।

बुधवार, 13 जनवरी 2021

संपूर्ण देश में सूर्य पूजा का पर्व 'मकर सक्रांति'

मकर संक्रांति का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व !!
‘रसो वै सः’- भारतीय तत्ववेत्ताओं ने जीवन को इसी रूप में परिभाषित किया है। रस यानि आनन्द-उल्लास, उमंग-उछाह। ये अवसर जीवन में बार-बार आएं, अनवरत आएं और सदा-सदा के लिए बने रहें, इसीलिए देवसंस्कृति में पर्वों का सृजन किया गया। निर्मल आनन्द के पर्याय ये सभी पर्व लोक-जीवन को देव-जीवन की ओर उन्मुख करते हैं। परन्तु इनमें भी मकर-संक्रान्ति के साथ ये अनुभूतियां कुछ अधिक ही गहराई के साथ जुड़ी हैं। यह जन-आस्था तथा लोकरुचि का पर्व है। इसे समूची सृष्टि में जीवन अनुप्राणित करने वाले भगवान सूर्य की उपासना का पर्व भी कहते हैं। इस अवसर पर उमड़ने वाले सात्विक भव देश की सांस्कृतिक चेतना को पुष्ट करते हैं। तभी तो लोकसंस्कृति पर्व-मकर संक्रान्ति सम्पूर्ण भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

मकर संक्रांति लगभग प्रतिवर्ष 14 जनवरी को ही पड़ती है। सूर्य के उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ते जाने की अवधि को दक्षिणायन तथा दक्षिण से उत्तर की ओर के यात्राकाल को उत्तरायण कहते हैं।
 वृत के 360 अंशों के समान ही पृथ्वी की परिक्रमापथ 360 अंशों में विभाजित है। इसके अण्डाकार परिक्रमापथ को 30-30 अंशों के समूहों में 12 राशियों में विभक्त किया गया है। पृथ्वी की परिक्रमा करते समय सूर्य जिस राशि में दिखाई देता है, वही सूर्य की राशि कही जाती है। संक्रांति बारह राशियों में सूर्य का संक्रमण है-रवेः संक्रमण राषौ संक्रान्तिरिति कथ्यते। मकर संक्रान्ति नवम् धनु राशि से दशम मकर राशि में संक्रमण है।

चन्द्रमास साढ़े उन्तीस दिन का एवं चन्द्रवर्ष 354 दिन का होता है, परन्तु सौर-दिन 30 दिन का एवं सौर वर्ष 365 दिन 6 घण्टे का होता है, चन्द्रवर्ष निश्चित नहीं होता है, उसमें परिवर्तन आता रहता है। इसी परिवर्तन के कारण चार वर्षों में फरवरी उन्तीस दिन की होती है। सूर्य का संक्रमण एक निश्चित अवधि एवं समय में सम्पन्न होता है। इसी कारण मकर-संक्रान्ति प्रायः हर वर्ष 14 जनवरी को ही आती है।

संक्रमण पर्व मकर संक्रान्ति का मकर शब्द का भी विशेष महत्व माना जाता है। इस महत्व को अलग-अलग भाषियों ने अपने-अपने ढंग से प्रतिपादित किया है। हरीति ऋषि के अनुसार, मकर मत्स्य वर्ग के जल-जन्तुओं में सर्वश्रेष्ठ है- मत्स्यानां मकरः श्रेष्ठो। इसीलिए यह गंगा का वाहन है। प्रायः सभी शास्त्रकारों ने गंगा को मकरवाहिनी माना है।

कामदेव की पताका का प्रतीक मकर है। अतएव कामदेव को मकरध्वज भी कहा जाता है। बिहारी सतसई में महाकवि बिहारी ने भगवान श्रीकृष्ण के कुण्डलों का आकार मकरकृत बताया है। मकराकृत गोपाल के कुण्डल सोहत कान। ध्स्यो मनो हिय धर समर ड्येढी लसत निसान॥

ज्योतिष गणना की बारह राशियों में से दसवीं राशि का नाम मकर है। पृथ्वी की एक अक्षांश रेखा को मकर रेखा कहते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार, सुमेरु पर्वत में उत्तर में दो पर्वत में से एक का नाम मकर पर्वत है। तमिल वर्ष में ‘तई’ नामक महिला का उल्लेख है, जो सूर्य के मकर रेखा में आने के कारण उसका नामकरण हुआ !!

पुराणों में मकर संक्रान्ति का काफी विस्तार से वर्णन मिलता है। पुराणकारों ने सूर्य के दक्षिण से ऊर्ध्वमुखी होकर उत्तरस्थ होने की वेला को संक्रान्ति पर्व एवं संस्कृति पर्व के रूप में स्वीकार किया है। पौराणिक विवरण के अनुसार, उत्तरायण देवताओं का एक दिन एवं दक्षिणायन एक रात्रि मानी जाती है।

यह वैज्ञानिक सत्य है कि उत्तरायण में सूर्य का ताप शीत के प्रकोप को कम करता है। शास्त्रकारों ने भी मकर संक्रान्ति को सूर्य उपासना का विशिष्ट पर्व माना है। इस अवसर पर भगवान सूर्य की गायत्री महामंत्र के साथ पूजा-उपासना, यज्ञ-हवन का अलौकिक महत्व है। मकर संक्रान्ति पर्व के देवता सूर्य को देवों में विश्व की आत्मा कहकर अलंकृत किया गया है। आयुर्वेद के मर्मज्ञों का मानना है, शीतकालीन ठण्डी हवा शरीर में अनेक व्याधियों को उत्पन्न करती है।

इसीलिए तिल-गुड़ आदि वस्तुओं का इस अवसर पर प्रयोग करने का विशेष विधान है। चरक संहिता स्पष्ट करती है:- ’शीते शीतानिलर्स्पषसंरुद्धो बलिनां बली। रसं हिन्स्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रयुप्यति।’ इस प्रकोप के निवारण के लिए आयुर्विज्ञान विशेष घी-तेल, तिल-गुड़, गन्ना, धूप और गर्म पानी सेवन की सलाह देते हैं।

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

श्रीराम के जयघोष के साथ निकली कीर्तन मंडली

अश्वनी उपाध्याय  
गाजियाबाद। वैशाली सेक्टर पांच में भगवान श्री राम के अयोध्या मंदिर के निर्माण के उपलक्ष में वैशाली सेक्टर 5 में संकीर्तन पदयात्रा निकली गई। सिद्धि प्रधान अग्रवाल ने बताया कि वैशाली सेक्टर पांच में बड़ी संख्या राम भक्त सड़कों पर भगवान श्री राम के जयगोष के साथ पदयात्रा कर भगवान श्री राम नाम का कीर्तन करते हुए पूरे सेक्टर से गुजरी। स्थानीय लोगों ने उत्साह के साथ संकीर्तन पदयात्रा का स्वागत किए। श्री राम संकीर्तन पदयात्रा में बड़ी संख्या में सेक्टर के राम भक्तों ने भगवान का गुणगान किया।संकीर्तन पदयात्रा के दौरान धर्मेंद्र गुप्ता ,आशा सक्सेना, एमसी मोदी, एसडी आर्य, कर्मवीर अत्री, योगेंद्र शर्मा, नंदिनी शर्मा जी, अरुण सक्सेना, आशीष गुप्ता, महेश, सरोज वर्मा, केके खरे, राजपाल, कुलदीप सिंह रघुवंश शर्मा बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित रहे।

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

श्री जगन्नाथ मंदिर के कपाट खोलें, करें दर्शन

पुरी। कोविड-19 वैश्विक महामारी के मद्देनजर करीब नौ महीने बंद रहने के बाद आखिरकार श्री जगन्नाथ मंदिर बुधवार को दोबारा खुल गया, लेकिन लोग तीन जनवरी से ही यहां भगवान के दर्शन कर पाएंगे। अधिकारियों ने बताया कि सेवकों और उनके परिवार के सदस्यों के लिए सुबह सात बजे मंदिर के द्वार खोले गए।इस दौरान कोविड-19 से जुड़े नियमों का सख्ती से पालन किया गया। उन्होंने बताया कि वैश्विक महामारी के कारण मंदिर मध्य मार्च से बंद था। 12वीं शताब्दी के भगवान विष्णु के मंदिर के द्वार इतिहास में पहली बार भक्तों के लिए बंद किए गए थे। पुरी के कलेक्टर बलवंत सिंह ने पत्रकारों को बताया कि पहले तीन दिन 23,24 और 25 दिसम्बर को केवल सेवकों और उनके परिवार के सदस्यों को दर्शन करने की अनुमति होगी।

अधिकारियों ने बताया कि 26 से 31 दिसम्बर के बीच केवल पुरी के निवासी भगवान के दर्शन कर पाएंगे। इसके बाद नव वर्ष पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होने के मद्देनजर एक और दो जनवरी को मंदिर को फिर बंद कर दिया जाएगा। तीन जनवरी से मंदिर के द्वार सभी श्रद्धालुओं के लिए खुल जाएंगे। उन्होंने बताया कि तीन जनवरी से आने वाले श्रद्धालुओं को कोरोना वायरस से संक्रमित ना होने की पुष्टि करने वाली रिपोर्ट दिखानी होगी।

पुरी के निवासियों से कोविड-19 की जांच रिपोर्ट ना मांगे जाने के सवाल पर अधिकारी ने कहा, ” प्रशासन स्थानीय लोगों में कोरोना वायरस की स्थिति से अवगत है। इसलिए उन्हें संक्रमित ना होने की पुष्टि के लिए कोविड-19 की जांच रिपोर्ट दिखाने की जरूरत नहीं है।”

रविवार, 20 दिसंबर 2020

गुरु तेग बहादुर को लोक ने अपना गुरु चुनाव

श्री गुरु तेगबहादुर का जीवन संघर्ष

गुरु तेग बहादुर इकलौते गुरु हैं।  जिन्हें लोक ने अपना गुरु चुना था। पूर्व गुरु हरिकृष्ण के बाबा बकाला अंतिम शब्द –सूत्र के सहारे। साढ़े पांच महीने से पदासीन गुरु न होने पीड़ित –भ्रमित जन मानस ने स्वंय ढूंढ कर तेग बहादुर में अपना प्रकाश–पाथेय देखा और गुरु पद पर प्रतिष्ठित किया था। उसके पहले सभी गुरु अपना उत्तराधिकारी अभिषिक्त या निर्दिष्ट कर जाते थे। किशोरावस्था से मुगल सेना से युद्ध में तलवार का धनी होने का प्रमाण दे चुके गुरु तेग बहादुर बचपन से त्यागी–वैरागी, सांसारिकता से निर्लिप्त साधक–संत थे। गुरु पद की बडी जिम्मेदारी सौंप दिये जाने पर उन्होंने शौर्य का बाना पहना और गुरु नानक के निर्भयता– निडरता के जीवन –दर्शन को पुर्नस्थापित किया। यह उद्घोष कर – भै काहू को देत नहिं भै मानहिं आन। जन सामान्य की पीडा, दु.ख दूर करना ही उनके जीवन का उद्देश्य रह गया।
गुरु गद्दी खाली थी। औरंगजेब की धर्मांध नीति पूरे उफान पर थी। प्रेरित- प्रोत्साहित कर ही नहीं तलवार की नोंक पर भी धर्मांतरण कराया जा रहा था। भारत को दारुल उल इस्लाम’ बनाने के शाही सपने को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए उसके अफसरों में होड़ मची थी। निशाने पर मुख्यत: काशी, प्रयाग कुरूक्षेत्र, हरिद्वार और कश्मीर वगैरह के पंडित-पंडे थे। उन्हें कहा जाता था। इस्लाम अपना लो या मौत को गले लगाओ। बादशाह ने सैकडों पंडितों को जेल में डलवा दिया था। इस आशा से कि यदि इन्होंने पैगंबर के धर्म को अपना लिया तो बाकी लोग आसानी से उनके रास्ते पर चल पडेंगे। बडे बडे वीर राजपूत राजा – महराजा शाही सल्तनत की सेवा में थे। उसकी पालकी के कहार बने थे। डरे, सहमें इस सोच में कि आगे उनका क्या होगा। किसी में औरंगजेब के खिलाफ आवाज उठाने का साहस नहीं बचा था।
बालगुरू हरि किशन अंतिम समय केवल ‘बाबा बकाला’ कह गए थे। ऐसे में नवें गुरु की खोज शुरू हुई। निष्कर्ष निकाला गया कि आठवें गुरु का संकेत था कि उनका उत्तराधिकारी बकाला गांव में है। अब बकाला में गुरु हर गोबिंद के कई रिश्तेदार थे। बाबा गुरु दित्ता के बेटे धीर मल समेत कम से कम 22 सोढी स्वयंभू गुरु बने बैठे थे। आदि ग्रंथ की मूल प्रति धीर मल के पास थी। और औरंगजेब का अनुग्रह भी। स्वाभाविक रूप से वह बडे़ दावेदार थे।
खोज और रस्साकशी जारी थी। माखन शाह लुबाना नाम का एक सम्पन्न सेठ आया। उसने मनौती मानी थी। कि उसका माल भरा जहाज डूबने से बच गया तो वह गुरु को सोने की 525 अशर्फियां भेंट करेगा। संयोग से जहाज बच गया था। बकाला में वास्तविक गुरू का पता कर पाना कठिन था। उसने एक एक अशर्फी कथित गुरुओं को बांटना शुरू किया। कहीं कहीं अशर्फियां 500 और देना दो दो कहा है। रात रुका तो किसी ने बताया गुरु हर गोबिंद के सबसे छोटे बेटे तेग बहादुर भी यहां हैं। अगले दिन सेठ ने एक मुद्रा उन्हें भी दी। पर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब लेने वाले ने कहा कि अपने संकल्प से क्यों फिर रहे हो बाकी कहां हैं। सेठ उछल पडा। उसने मकान की छत पर जा चिल्लाकर कहा कि गुरु मिल गए। लोग जुटे और इस तरह नये गुरु की खोज पूरी हुई।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

राम नगरी में 4 दिवसीय 'रामायण' मेला आयोजित

अयोध्या। राम नगरी में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला रामायण मेला इस साल आज (शुक्रवार) शाम से शुरू होगा। रामायण मेला के तहत तीन दिन रामलीला, राम कथा और संगोष्ठी के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। आयोजन को महामारी के बीच सकुशल संपन्न कराने के लिए जिला प्रशासन की ओर से मजिस्ट्रेटों की तैनाती की गई है।सरयू के तट पर स्थित राम कथा पार्क में शुक्रवार को चार दिवसीय रामायण मेले का आगाज होगा। रामायण मेला समिति के संरक्षक विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र, समिति के अध्यक्ष, रामदास छावनी के महंत कमल नयन दास शास्त्री और महामंत्री वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह के संयोजन में आयोजित होने वाले इस रामायण मेले में प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे के बीच रामलीला, राम कथा और संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। जबकि 7 से 9 बजे के बीच संस्कृत विभाग की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। राम नगरी अयोध्या में इस समय राम विवाह का उत्सव चल रहा है। उत्सव के तहत धर्म नगरी में शनिवार को राम बारात निकाली जानी है।

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के संक्रमण के बीच चार दिवसीय रामायण मेले को सकुशल संपन्न कराने के लिए जिला मजिस्ट्रेट की ओर से मजिस्ट्रेटों की तैनाती की गई है। गुरुवार को जिला प्रशासन की ओर से बताया गया कि जिला मजिस्ट्रेट अनुज कुमार झा ने कार्यक्रम स्थल राम कथा पार्क और इसके आसपास क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी राजेंद्र प्रसाद यादव, रजिस्ट्रीकरण अधिकारी लव कुश द्विवेदी व अवर अभियंता सरयू खंड पवन कुमार को मजिस्ट्रेट नामित किया है। पूरे शहर क्षेत्र के लिए एडीएम नगर और देहात क्षेत्र के लिए एडीएम प्रशासन, अयोध्या क्षेत्र के लिए रेजिडेंट मजिस्ट्रेट अयोध्या और सभी उप जिला अधिकारी को अपने अपने क्षेत्र का मजिस्ट्रेट बनाया गया है। इनके साथ समन्वय कर कानून व्यवस्था के लिए एसपी सिटी, एसपी देहात व सर्किल प्रभारियों को जिम्मेदारी दी गई है।

रविवार, 13 दिसंबर 2020

खरमास: शुभ कार्यों के मुहूर्त, हो जाते हैं निषेध

हरिओम उपाध्याय   

सनातन परंपरा में मुहूर्त का विशेष महत्त्व रहता है। हमारे सनातन धर्म में हरेक कार्य के लिए एक अभीष्ट मुहूर्त निर्धारित है। वहीं कुछ अवधि ऐसी भी होती है जब शुभकार्य के मुहूर्त का निषेध होता है। इस अवधि में सभी शुभ कार्य वर्जित होते हैं। ऐसी ही एक अवधि है-मलमास जिसे खरमास भी कहा जाता है।

जानिए कैसे होता है मलमास- जब सूर्य गोचरवश धनु और मीन में प्रवेश करते हैं तो इसे क्रमश: धनु संक्रांति व मीन संक्रांति कहा जाता है। सूर्य किसी भी राशि में लगभग 1 माह तक रहते हैं। सूर्य के धनु राशि व मीन राशि में स्थित होने की अवधि को ही मलमास या खरमास कहा जाता है। मलमास में सभी प्रकार के शुभ कार्य जैसे विवाह,मुंडन,सगाई,गृहारंभ व गृहप्रवेश के साथ व्रतारंभ एवं व्रत उद्यापन आदि वर्जित रहते हैं।

जानिए कब तक रहेगा मलमास- इस माह दिनांक 15 दिसंबर 2020, मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से मलमास प्रारंभ होगा जो दिनांक 14 जनवरी 2021 पौष शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि तक रहेगा। मलमास प्रभावी होने के कारण इस अवधि में समस्त शुभकार्यों का निषेध रहेगा।

प्रत्येक माह मनाईं जाती है 'महाशिवरात्रि'

यामिनी दुबे

हिन्दू पंचांग के अनुसार हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है। इस दिन शिव पूजा की जाती है। मासिक शिवरात्रि रविवार को मनाई जा रही है। मासिक शिवरात्रि के व्रत का बहुत अधिक महत्व होता है। मान्यता है कि मासिक शिवरात्रि का व्रत करने से भगवान भोलेनाथ की विशेष कृपा से कोई भी मुश्किल और असम्भव कार्य पूरा किया जा सकता है।

मासिक शिवरात्रि का महत्व :
मासिक शिवरात्रि का व्रत रखने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। क्योंकि इस व्रत में व्यक्ति को अपने अवगुणों का त्याग करना होता है। इस व्रत को करके देवी-देवताओं ने मनचाहा वरदान पाया है। भगवान शिव के पूजन के लिए उचित समय प्रदोष काल माना जाता है। शिव पुराण के अनुसार, इस दिन व्रत करके भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। जीवन की मुश्किलें दूर होती है।

पाकिस्तान दौरा सुरक्षा कारणों को लेकर रद्द किया

वेलिंग्टन/ इस्लामाबाद। क्रिकेट पर संकट के बादल एक बार फिर से घिर आए हैं। न्यूजीलैंड का पूरा पाकिस्तान दौरा सुरक्षा कारणों को लेकर रद्द कर दि...