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रविवार, 20 नवंबर 2022

मिथिला में मैथिली विवाह के गीतों की गूंज प्रारंभ 

मिथिला में मैथिली विवाह के गीतों की गूंज प्रारंभ   

अविनाश श्रीवास्तव   

बेगूसराय। सांस्कृतिक विरासत, लोक कला और सनातन धर्म के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की अर्धांगिनी सीता के मायके मिथिला में एक बार फिर हर घर में मैथिली विवाह गीत गूंजने लगे हैं। यह तैयारी की जा रही है अगहन शुक्ल पक्ष पंचमी के दिन होने वाले जानकी विवाह महोत्सव के लिए। इस वर्ष 28 नवम्बर को राम जानकी विवाह महोत्सव होगा। यह दिन भले ही सीता और राम के विवाह का हो, लेकिन मिथिला में लोग राम विवाह नहीं, जानकी विवाह महोत्सव मनाते हैं तथा पूरे देश में मिथिलांचल का ही दो जगह एक जनकपुर और दूसरा मिथिला का प्रवेश द्वार बेगूसराय का बीहट है, जहां की धूमधाम से विवाह महोत्सव मनाया जाता है।

दोनों जगह पर इस महोत्सव में शामिल होने के लिए ना केवल दूर-दूर से लोग आते हैं, बल्कि मिथिला के पाहुन श्रीराम और उनके भाई लक्ष्मण के स्वरूप भी अयोध्या से आते हैं।विवाह पंचमी को लेकर मिथिला के प्रवेश द्वार बीहट में स्थित विश्वनाथ मंदिर में तैयारी काफी काफी तेज हो गई है। 27 नवम्बर को देव आमंत्रण, मंडपाच्छादन, मटकोर प्रोशेसन, चुमावन एवं जागरण होगा। 28 नवम्बर की रात विवाह से पूर्व बारात झांकी निकाली जाएगी। 29 नवम्बर को पूरे विधि विधान के साथ रामकलेवा (ज्योनार) तथा 30 नवम्बर को चौठ-चौठारी के साथ चार दिवसीय महोत्सव का समापन होगा।

सबसे बड़ी बात है कि यहां ना सिर्फ विवाह का महोत्सव मनाया जाता है। बल्कि वैष्णव माधुर्य भक्ति के परिचायक विश्वनाथ मंदिर बीहट में बेटी की शादी की तरह मिथिला परंपरा के अनुसार सभी रस्म निभाए जाते हैं। अवध (अयोध्या) से आए श्री राम के स्वरूप दूल्हा से मिथिलांचल की बेटियां हास-परिहास करती है और विवाह की रस्म पूरा होने के बाद सम्मान के साथ उन्हें विदा किया जाता है। विवाह महोत्सव में राजा जनक की भूमिका निभाने वाले विश्वनाथ मंदिर के पीठासीन आचार्य राजकिशोर जी उपाध्याय ने बताया कि लोक उत्सव और लोक पर्व की जागृत परंपरा के वाहक मिथिला के हर घर में श्रीराम जानकी की पूजा होती है। विश्वनाथ मंदिर में प्रत्येक दिन रामार्चन के माध्यम रस्में निभाई जाती है।

सभी माह के शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष की पंचमी को विवाह रस्म होता है। लेकिन प्रत्येक वर्ष अगहन शुक्ल पक्ष की पंचमी को श्रीजानकी विवाह महोत्सव का आयोजन होता रहा है। श्रीसिय रनिवास में महोत्सव की तैयारी तेज हो गई है। अयोध्या से 14 वर्ष से कम उम्र के रामस्वरूप दूल्हा आएंगे तथा जिस तरह से पौराणिक काल में गुरु संग स्वयंवर में आए श्रीराम का सभी रस्म मिथिला में किया गया था, उसी प्रकार से यहां भी रामस्वरूप आए बालक का सभी रस्में पूरे विधि विधान से की जाएगी। विश्वनाथ मंदिर का श्रीजानकी विवाह महोत्सव सनातन संस्कृति तथा धार्मिक महत्ता को बढ़ाने के साथ ही वैष्णव माधुर्य भक्ति का परिचायक भी है, लोग यहां परब्रह्म की अराधना दासभक्ति से करते हैं।

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

कृष्ण-पक्ष की अष्टमी को मनाई जाएगी 'कालाष्टमी'

कृष्ण-पक्ष की अष्टमी को मनाई जाएगी 'कालाष्टमी'

सरस्वती उपाध्याय

कालाष्टमी या काल भैरव जयंती का दिन भगवान शिव के भक्तों के लिए खास माना गया है। कालभैरव भगवान शिव के रुद्र अवतार से प्रकट हुए थे। हर महीने कृष्ण-पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी या काल भैरव अष्टमी मनाई जाती है। इस बार काल भैरव अष्टमी 16 नवंबर, बुधवार को है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान भैरव की पूजा करने से भय से मुक्ति मिलती है। इस दिन व्रत रखने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भैरव बाबा की पूजा-अर्चना करने से शत्रुओं से छुटकारा मिलता है।

काल भैरव अष्टमी के दिन बन रहे ये चौघड़िया मुहूर्त
लाभ-उन्नति- 06:44 एएम से 08:05 एएम
अमृत-सर्वोत्तम- 08:05 एएम से 09:25 एएम
शुभ-उत्तम- 10:45 एएम से 12:06 पीएम
लाभ-उन्नति- 04:07 पीएम से 05:27 पीएम

शुभ मुहूर्त
अष्टमी तिथि 16 नवंबर 2022 को सुबह 05 बजकर 49 मिनट से प्रारंभ होगी, जो कि 17 नवंबर को शाम 07 बजकर 57 मिनट तक रहेगी।

काल भैरव अष्टमी पूजा-विधि
इस पावन दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
अगर संभव हो तो इस दिन व्रत रखें। घर के मंदिर में दीपक प्रज्वलित करें। इस दिन भगवान शंकर की भी विधि- विधान से पूजा- अर्चना करें। भगवान शंकर के साथ माता पार्वती और गणेश भगवान की पूजा-अर्चना भी करें। आरती करें और भगवान को भोग भी लगाएं। इस बात का ध्यान रखें भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है।

शनिवार, 12 नवंबर 2022

कृष्ण-पक्ष की एकादशी को मनेगी 'विजया' एकादशी 

कृष्ण-पक्ष की एकादशी को मनेगी 'विजया' एकादशी 

सरस्वती उपाध्याय 

हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है। हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण-पक्ष की एकादशी तिथि को विजया एकादशी मनाई जाती है। साल 2023 में विजया एकादशी व्रत 16 फरवरी दिन गुरुवार को रखा जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। माना जाता है कि इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु जी की पूजा और व्रत करने से व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है।

विजया एकादशी व्रत कब है?

पंचांग के अनुसार 16 फरवरी 2023, बृहस्पतिवार को फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। इस एकादशी को विजया एकादशी कहते हैं। विजया एकादशी व्रत 16 फरवरी 2023 को रखा जाएगा। इस दिन व्रत रखते हुए भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन ऐसा करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। हर कामना पूरी होती है। 

शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार एकादशी की तिथि का प्रारंभ 16 फरवरी 2023 दिन बृहस्पतिवार को सुबह 05 : 32 बजे से होगा, जो अगले दिन यानी 17 फरवरी 2023, शुक्रवार को 2 बजकर 49  मिनट तक रहेगी।

विजया एकादशी व्रत: 16 फरवरी 2023 बृहस्पतिवार को

एकादशी तिथि प्रारम्भ : फरवरी 16, 2023 को 05:32 AM बजे

एकादशी तिथि समाप्त : फरवरी 17, 2023 को 02:49 AM बजे

विजया एकादशी व्रत पारण (व्रत तोड़ने का) समय : 17 फरवरी को 08 : 01  AM से 09:13 AM

एकादशी व्रत पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय : 17 फरवरी को 08:01 AM

पारण समय एवं मुहूर्त

साल 2023 का विजया एकादशी व्रत 16 फरवरी को रखा जाएगा और इस व्रत का पारण अगले दिन 17 फरवरी को 08 : 01  AM से 09:13 AM के बीच किया जा सकता है। वहीं वैष्णव विजया एकादशी व्रत 17 फरवरी 2023 शुक्रवार को रखा जाएगा। वैष्णव एकादशी के लिए विजया एकादशी व्रत पारण (व्रत तोड़ने का) का समय 18 फरवरी को सुबह 06:57 AM से 09:12 AM तक है। पारण के दिन द्वादशी सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी।

सोमवार, 7 नवंबर 2022

चंद्र ग्रहण: आज मनाया जाएगा 'गंगा स्नान' का पर्व

चंद्र ग्रहण: आज मनाया जाएगा 'गंगा स्नान' का पर्व

सरस्वती उपाध्याय 

कार्तिक पूर्णिमा इस वर्ष आठ नवंबर को है। इसे गंगा स्नान भी कहा जाता है। लोग व्रत रखते हैं। भोर में गंगा स्नान कर पूजन, दान करते हैं। इस बार आठ नवंबर को ही साल का आखरी चंद्र ग्रहण भी पड़ रहा है। चंद्रग्रहण के चलते कई कार्यों पर प्रभाव पड़ रहा है। बालाजी ज्योतिष संस्थान के पंडित राजीव शर्मा का कहना है कि ग्रस्तोदय चंद्र ग्रहण लग रहा है। ऐसे में अरुणोदय काल में गंगा स्नान करना पुण्यकारी होगा।

धार्मिक मान्यता, परंपरा के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान भी कहा जाता है। इस वर्ष 8 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा है, पर उसी दिन साल का आखिरी चंद्र ग्रहण भी लगने जा रहा है। यह ग्रहण देश के पूर्वोत्तर एवं पूर्वी भागों में खग्रास के रूप में भी दिखाई देगा। वहीं शेष हिस्सों में खण्डग्रास होगा। जिन स्थानों पर चंन्द्रोदय सांय 5:12 बजे से पूर्व होगा, उन स्थानों पर यह खग्रास भी दिखाई देगा, शेष में यह चंद्रग्रहण खण्डग्रास के रूप में दिखाई देगा। यह ग्रहण आठ नवंबर को भारतीय मानक समय अनुसार अपराह्न 2:39 बजे से सांय 6:19 बजे तक रहेगा जिसमें खग्रास की स्थिति अपराह्न 3:46 बजे से सांय 5:12 बजे तक रहेगी। भारत के विभिन्न छेत्रो में ग्रेस्तोदय के रूप में दिखाई देगा

ग्रहण का सूतक

ग्रहण ग्रस्तोदय होने की वजह से इसका सूतक सूर्योदय से ही माना जायेगा। सामान्य रूप से चंद्र ग्रहण का सूतक नौ घंटे पहले से मानते हैं। चंद्र ग्रहण मेष राशि एवं भरणी नक्षत्र में हो रहा है इसलिए यह इस राशि एवं नक्षत्र वाले व्यक्तिओं के लिए विशेष रूप से अशुभफलदायक है। इसके अतिरिक्त वृष, सिंह, कन्या, तुला, धनु, मकर एवं मीन राशि वालों के लिए अशुभ फलप्रद रहेगा।

सोमवार, 31 अक्तूबर 2022

शुक्ल-पक्ष की अष्टमी तिथि को मनेगा 'गोपाष्टमी' पर्व

शुक्ल-पक्ष की अष्टमी तिथि को मनेगा 'गोपाष्टमी' पर्व


कार्तिक मास के शुक्ल-पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन गोपाष्टमी पर्व मनाया जाता है। इस दिन गौ माता की विशेष पूजा का विधान शास्त्रों में वर्णित है। मान्यता है कि गोपाष्टमी के दिन गाय माता में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इसलिए इस दिन उनकी पूजा करने से व्यक्ति को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके सभी दुःख-दर्द दूर हो जाते हैं। इस साल यह पर्व 1 नवम्बर के दिन मनाया जाएगा। बता दें कि यह पर्व विशेष रूप से वृन्दावन, मथुरा में धूम-धाम से मनाया जाता है। आइए जानते हैं तिथि और शुभ मुहूर्त।


गोपाष्टमी 2022 तिथि और शुभ मुहूर्त 

कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि प्रारम्भ: 31 अक्टूबर 2022, सोमवार से

अष्टमी तिथि समाप्त: 1 नवंबर 2022, मंगलवार रात 11:03 तक

गोपाष्टमी व्रत तिथि: 1 नवंबर 2022, मंगलवार


गोपाष्टमी पर बन रहा है अभिजीत मुहूर्त

हिन्दू पंचांग के अनुसार इस वर्ष गोपाष्टमी पर्व के दिन अभिजित मुहूर्त का निर्माण हो रहा है। मान्यता है कि अभिजीत मुहूर्त में पूजा-पाठ करने से भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष पर अष्टमी तिथि सुबह 11:47 से दोपहर 12:31 तक रहेगा। यह समय पूजा के लिए सर्वोत्तम है।


गोपाष्टमी पूजा विधि 

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान-ध्यान के बाद साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद गाय और उसके बछड़े को माला पहनाएं व तिलक लगाएं। इसके बाद गाय की धूप, दीप, पुष्प आदि से पूजा करें। इस दिन उन्हें अपने हाथों से भोजन कराना न भूलें। अंत में उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें और उनकी आरती करें। शास्त्रों में एक उपाय यह भी बताया है कि इस दिन गाय को गुड़ का भोग लगाने से सूर्य दोष से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही घर के नजदीक बनें गौशाला में दान जरूर करें।


गोपाष्टमी पर करें इस मंत्र का जाप 

सुरभि त्वं जगन्मातर्देवी विष्णुपदे स्थिता ।

सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस ।।

तत: सर्वमये देवि सर्वदेवैरलड्कृते ।

मातर्ममाभिलाषितं सफलं कुरु नन्दिनी ।।

श्रीराम 'निर्भयपुत्र'

शनिवार, 29 अक्तूबर 2022

देवोत्थानी एकादशी: शादियों का मुहूर्त 24 से शुरू होगा

देवोत्थानी एकादशी: शादियों का मुहूर्त 24 से शुरू होगा

सरस्वती उपाध्याय 

10 जुलाई को हरि शयनी एकादशी से बंद चल रही शादियां एक बार फिर शुरू होंगी। 4 नवंबर को देवोत्थानी एकादशी के साथ ही सहालग शुरू हो जाएगी, लेकिन शादियों का मुहूर्त 24 नवंबर से शुरू होगा। इसे लेकर बाजार में भी तैयारियां शुरू हो गई हैं। आचार्य शक्तिधर त्रिपाठी ने बताया कि देवताओं के जागने के बाद ही शादियां होंगी। 20 तक शुक्रास्त के चलते शादियां नहीं होंगी। 24 से शुरुआत होगी। ऐसा शायद ही कोई इलाका बचेगा जहां बैंड बाजे की धुन पर बराती थिरकते नजर न आएं।

शहर के होटल व रेस्टोरेंट, शादी घरों की बुकिंग फुल हो चुकी है। सहालग के लिए शहर के छोटे बैंड वालों के पास दो से पांच और बड़े बैंड वालों के पास छह से आठ बुकिंग है। अशोक मार्ग के बैंड मास्टर गौरव ने बताया कि लखनऊ में करीब 300 से 400 छोटे बड़े बैंड वाले हैं। सभी के पास बुकिंग है। दो साल के कोरोना काल के बाद बुकिंग में तेजी आएगी।

होटल रेस्टोरेंट की बुकिंग फुलः शहर के करीब 150 बड़े होटल व रेस्टोरेंट में बुकिंग हुई है। इलाकाई शादी घर भी बुक हो चुके हैं। लखनऊ होटल एवं रेस्टोरेंट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष श्याम कृष्नानी ने बताया कि सहालग में इसबार अच्छा कारोबार होने की उम्मीद है।

एक टेंट वाले के पास चार से पांच बुकिंगः ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों को मिलाकर शादियों की धूम होगी। आदर्श कैटर्स लाइल डेकाेरोरेटर एसाेसिएशन के अध्यक्ष विजय कुमार ने बताया कि सहालग में सभी टेंट हाउस के पास कई बुकिंग है। हनुमान सेतु के फूल के कारोबारी कल्लू ने बताया कि सजावट के लिए बुकिंग मिल गईं हैं। शादी के वाहन के साथ ही मंडप सजाने वालों के चेहरे भी खिल उठे हैं। इस बार पूरे शहर में शादियों की धूम है।

खास मुहूर्त पर शादी करने का चलनः आचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि शुक्रास्त की मान्यता के चलते लोगों ने शादियां नहीं कीं। शुभ कार्य भी नहीं हुए। सात जन्मों तक रिश्तों को जोड़ने की शादी की मान्यता होने और सुख वैवाहिक जीवन के लिए लोग अच्छे दिनों में ही शादियों का प्लान बनाते हैं। आचार्य आनंद दुबे ने बताया कि शादियों का शुभ मुहूर्त है। शुभ लग्न होने के कारण शादियों की धूम होगी।

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2022

शुक्ल-पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाएगा 'छठ' पर्व

शुक्ल-पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाएगा 'छठ' पर्व

सरस्वती उपाध्याय 

आस्था के महापर्व छठ पूजा कार्तिक माह के शुक्ल-पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। छठ पूजा का प्रारंभ 28 अक्टूबर से हो गया है। छठ का महापर्व चार दिन का होता है और यह व्रत काफी कठिन होता है। क्योंकि इस दौरान व्रती को लगभग 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखना होता है। इस व्रत में व्रती लगातार 36 घंटे का निर्जला उपवास करते हैं। लगातार 36 घंटे तक भूखे प्यासे रहने से सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है। ऐसे में कुछ बातों का ध्यान रखकर आप अपनी आस्था और सेहत दोनों का ध्यान रख सकते हैं। तो आइए जानते हैं इतने कठिन व्रत को करते हुए कैसे आप दिन भर एनर्जेटिक और हेल्दी बने रह सकते हैं।

छठ व्रत करते समय बरतें ये सावधानी...

कम बातचीत करें...

छठ का व्रत रखने वाले व्यक्ति को कम से कम बातचीत करनी चाहिए। ज्यादा बात करने से शरीर की एनर्जी बर्बाद होती है और धीरे-धीरे शरीर कमजोर पड़ने लगता है। ऐसे में अपना ध्यान पूजा-पाठ में लगाएं।

गर्मी में न रहें...

व्रत रखने वाले लोगों को ऐसी जगह चुननी चाहिए, जहां खड़े होने पर उन्हें ज्यादा गर्मी न लगे। गर्मी लगने से तबीयत बिगड़ सकती है। व्रत रखने वाला व्यक्ति कोशिश करें कि वो धूप में न निकलें।

चेहरे और गले पर लगाएं बर्फ...

लंबे समय तक व्रत रखने से काफी ज्यादा प्यास लगने लगती है। इस स्थिति से बचने के लिए आप आइस क्यूब की मदद ले सकते हैं। इसके लिए एक साफ कपड़े में बर्फ का टुकड़ा बांधकर उसे अपने गर्दन और चेहरे पर लगाएं। ऐसा करने से शरीर में ठंडक बनी रहेगी और आपको प्यास कम लगेगी।

डॉक्टर की सलाह...

अगर आप किसी रोग से परेशान है तो छठ का व्रत रखने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें। चिकित्सक से जांच करवाने के बाद ही आप उपवास करें। इसके अलावा उपवास के दौरान कोई परेशानी महसूस होने पर सबसे पहले डॉक्टर की सलाह लें।

छठ पूजा के दौरान न करें ये गलतियां...

छठ पूजा का व्रत करने वाले व्यक्ति को बेड, गद्दा या पलंग पर नहीं सोना चाहिए। चार दिन तक व्रत करने वाले व्यक्ति को जमीन पर आसन बिछाकर ही सोने का नियम बताया गया है।

जो भी व्यक्ति व्रत करता है, उसके साथ उसके परिजन को भी तामसिक भोजन जैसे लहसुन-प्याज तक के सेवन को करने से बचना चाहिए।

छठ पूजा के प्रसाद को कोई और नहीं बना सकता, इसको केवल व्रत रखने वाले लोग ही बनाते हैं।

छठी मैया को चढ़ाने वाली कोई भी चीज झूठी और खंडित नहीं होनी चाहिए। अगर पेड़ों पर लगे फल-फूल को भी पशु-पक्षी ने झूठा किया हुआ है तो उसको भी माता को अर्पित न करें। फल-फूल हमेशा साफ-सुथरे और शुद्ध होने चाहिए।

नहाय खाय के दिन व्रती महिलाओं को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए, जिसमें लहसुन प्याज नहीं रहता है। व्रतियों का पूरे चार दिन लहसुन, प्याज से दूर रहना चाहिए। माना जाता है कि तीज त्योहार पर ऐसा भोजन करने से व्रत की पवित्रता भंग हो जाती है।

पूजा की चीजों को छूते समय अपने हाथों को साफ करें और अन्य चीजें छूने के बाद छठ के सामानों को न छूएं।

बुधवार, 26 अक्तूबर 2022

भाई-बहन के स्नेह को सुदृढ़ करता है 'भैयादूज'

भाई-बहन के स्नेह को सुदृढ़ करता है 'भैयादूज'

सरस्वती उपाध्याय

भाई दूज या भैयादूज का पर्व भाई-बहन के स्नेह को सुदृढ़ करता है। भाईदूज का पर्व कार्तिक मास की द्वितीया को मनाया जाता है। यह पर्व भाई-बहन के स्नेह को सुदृढ़ करता है। यह पर्व दीवाली के दो दिन बाद मनाया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने भाइयों को घर पर आमंत्रित कर उन्‍हें तिलक लगाकर भोजन कराती हैं। वहीं, एक ही घर में रहने वाले भाई-बहन इस दिन साथ बैठकर खाना खाते हैं। मान्‍यता है कि भाईदूज के दिन यदि भाई-बहन यमुना किनारे बैठकर साथ में भोजन करें तो यह अत्‍यंत मंगलकारी और कल्‍याणकारी होता है।

भाई दूज अन्य सभी त्योहारों से बहुत अलग माना जाता है। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस त्योहार में किसी देवी-देवता की उपासना आदि क्रियाओं की बजाय स्वयं ही अपने भाई को तिलक करने का विधान है। प्राचीन काल से यह परंपरा चली आ रही है कि भाई दूज के दिन बहनें अपने भाई की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और धन-धान्य में वृद्धि के लिए तिलक लगाती हैं। कहते हैं कि कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन जो बहन अपने भाई के माथे पर भगवान को प्रणाम करते हुए कुमकुम का तिलक करती है उनके भाई को सभी सुखों की प्राप्ति होती है।

भाईदूज को यम द्वितीया भी कहा जाता है। इस दिन मृत्‍यु के देवता यम की पूजा का भी विधान है।भाईदूज पर बहनें भाई की लम्बी आयु की प्रार्थना करती हैं। इस दिन को भ्रातृ द्वितीया भी कहा जाता है। इस पर्व का प्रमुख लक्ष्य भाई तथा बहन के पावन संबंध एवं प्रेमभाव की स्थापना करना है।भाईदूज के दिन बहनें रोली एवं अक्षत से अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देती हैं। साथ ही भाई अपनी बहन को उपहार देता है।

भाईदूज के दिन भाई की हथेली पर बहनें चावल का घोल लगाती हैं उसके ऊपर सिन्दूर लगाकर कद्दू के फूल, पान, सुपारी मुद्रा आदि हाथों पर रखकर धीरे-धीरे पानी हाथों पर छोड़ते हुए कहती हैं जैसे गंगा पूजे यमुना को यमी पूजे यमराज को, सुभद्रा पूजा कृष्ण को, गंगा यमुना नीर बहे मेरे भाई की आयु बढ़े। इस दिन शाम के समय बहनें यमराज के नाम से चौमुख दीया जलाकर घर के बाहर रखती हैं। इस समय ऊपर आसमान में चील उड़ता दिखाई दे तो बहुत ही शुभ माना जाता है। माना जाता है कि बहनें भाई की आयु के लिए जो दुआ मांग रही हैं उसे यमराज ने कुबूल कर लिया है या चील जाकर यमराज को बहनों का संदेश सुनाएगा।

भाईदूज के दिन बहनें बेरी पूजन भी करती हैं। इस दिन बहनें भाइयों को तेल मलकर गंगा यमुना में स्नान भी कराती हैं। इस दिन गोधन कूटने की प्रथा भी है। गोबर की मानव मूर्ति बनाकर छाती पर ईंट रखकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं। स्त्रियां घर-घर जाकर चना, गूम तथा भटकैया चराव कर जिव्हा को भटकैया के कांटे से दागती भी हैं।

भाई दूज का त्योहार देश भर में धूम-धाम से मनाया जाता है। हालांकि इस पर्व को मनाने की विधि हर जगह एक जैसी नहीं है। उत्तर भारत में जहां यह चलन है कि इस दिन बहनें भाई को अक्षत और तिलक लगाकर नारियल देती हैं वहीं पूर्वी भारत में बहनें शंखनाद के बाद भाई को तिलक लगाती हैं और भेंट स्वरूप कुछ उपहार देती हैं। मान्यता है कि इस दिन बहन के घर भोजन करने से भाई की उम्र बढ़ती है। बिहार में भाईदूज पर एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। इस दिन बहनें भाइयों को डांटती हैं और उन्हें भला बुरा कहती हैं और फिर उनसे माफी मांगती हैं। दरअसल यह परंपरा भाइयों द्वारा पहले की गई गलतियों के चलते निभाई जाती है। इस रस्म के बाद बहनें भाइयों को तिलक लगाकर उन्हें मिठाई खिलाती हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार, भाईदूज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण नरकासुर राक्षस का वध कर द्वारिका लौटे थे। इस दिन भगवान कृष्ण की बहन सुभद्रा ने फल,फूल, मिठाई और अनेकों दीये जलाकर उनका स्वागत किया था। सुभद्रा ने भगवान श्री कृष्ण के मस्तक पर तिलक लगाकर उनकी दीर्घायु की कामना की थी। इस दिन से ही भाई दूज के मौके पर बहनें भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं और बदले में भाई उन्हें उपहार देते हैं।

भैयादूज के दिन यमराज तथा यमुना जी के पूजन का विशेष महत्व है। धर्मग्रंथों के अनुसार, कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन ही यमुना ने अपने भाई यम को अपने घर बुलाकर सत्कार करके भोजन कराया था। इसीलिए, इस त्योहार को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। यमराज ने प्रसन्न होकर यमुना को वर दिया था कि जो व्यक्ति इस दिन यमुना में स्नान करके यम का पूजन करेगा, मृत्यु के बाद उसे यमलोक में नहीं जाना पड़ेगा।

भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था। उनकी कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। वह उससे बराबर निवेदन करती कि इष्ट मित्रों सहित उसके घर आकर भोजन करो। अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालते रहे। कार्तिक शुक्ला का दिन आया। यमुना ने उस दिन फिर यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर, उसे अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया।

यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर मांगने का आदेश दिया।

यमुना ने कहा कि भद्र! आप प्रति वर्ष इसी दिन मेरे घर आया करो। मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई को आदर सत्कार करके टीका करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह की। इसी दिन से पर्व की परम्परा बनी। ऐसी मान्यता है कि जो आतिथ्य स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता। इसीलिए भैयादूज को यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है।

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2022

महत्व: आज 'गोवर्धन' पर्वत की पूजा की जाएगी

महत्व: आज 'गोवर्धन' पर्वत की पूजा की जाएगी

सरस्वती उपाध्याय 

हर साल कार्तिक माह के शुक्ल-पक्ष की तिथि प्रतिपदा के दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है। इस बार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि कल यानी 26 अक्टूबर को है। इस दिन लोग घर की आंगन में या घर के बाहर गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृत्ति बनाकर पूजा की जाती है। ज्योतिष की मानें तो इस साल गोवर्धन पूजा करने के लिए मात्र 02 घंटे 14 मिनट का ही समय है। आइए जानते हैं कब है, गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त और क्या है सही विधि?

गोवर्धन पूजा शुभ मुहूर्त

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 25 अक्टूबर की शाम 04 बजकर 18 मिनच से शुरू हो रही है। प्रतिपदा तिथि का समापन 26 अक्टूबर के दोपहर 02 बजकर 42 मिनट पर होगा। इस दिन गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त 26 अक्टूबर की सुबह 06 बजकर 29 मिनट से लेकर 08 बजकर 43 मिनट तक यानी कुल घंटे 14 मिनट है।

गोवर्धन पूजा की विधि

गोवर्धन पूजा के दिन घर के आंगन में या दरवाजे पर गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतिमा बनाई जाती है। इसके बाद इसका पूजन किया जाता है। इसके बाद इस पर रोली, चंदन, चावल, मिष्ठान्न, बताशे, केसर, फूल, जल इत्यादि पूजा की सामग्री चढ़ाई जाती है। मान्यता है कि जो लोग सच्चे मन से गोवर्धन भगवान की पूजा करते हैं, उन्हें कभी किसी चीज की कमी नहीं होती है और वे हमेशा खुशहाल रहते हैं।

गोवर्धन पूजा का महत्व

ऐसी मान्यता है कि आज कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन भगवान ने कृष्ण ने देवराज इंद्र का अंहकार नष्ट करने के लिए गोकुल के लोगों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेरित किया था। उसी समय से हर साल इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है। गोवर्धन पूजा विशेषकर भव्यता उत्तर भारत मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, गोकुल, बरसाना में देखी जाती है।

रविवार, 23 अक्तूबर 2022

महत्व: आज मनाई जाएगी बड़ी दिपावली, जानिए 

महत्व: आज मनाई जाएगी बड़ी दिपावली, जानिए 

सरस्वती उपाध्याय 

दिवाली के पंचदिवसीय त्योहार का आरंभ धनतेरस के दिन से आरंभ हो रहा है। धनतेरस, छोटी दिवाली, दिवाली गोवर्धन पूजा और अंत में भैया दूज के बाद इस त्योहार का समापन होगा। इस वर्ष बड़ी दिवाली 24 अक्तूबर को मनाई जाएगी। लेकिन इस बार छोटी दिवाली बड़ी दिवाली और यहां तक धनतेरस की तिथि को लेकर लोगों में संशय है।  कुछ का मत है कि इस बार छोटी और बड़ी दिवाली एक ही दिन मनानी चाहिए। आइए जानते हैं छोटी और बड़ी दिवाली की सही तिथि और शुभ मुहूर्त ?

किस तिथि को मनेगा पर्व 

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जो लोग 22 अक्तूबर  को धनतेरस मनाएंगे, वे 23 अक्टूबर को छोटी दिवाली और 24 अक्तूबर  को दीपावली मनाएंगे। इसके विपरीत जो लोग 23 अक्तूबर  को धनतेरस मनाएंगे वे 24 अक्तूबर  को नरक चतुर्दशी व दिवाली का त्योहार मनाएंगे। 

छोटी दिवाली की शुभ तिथि 

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 23 अक्तूबर  को सायं 06: 04 मिनट से आरंभ होगी और  24 अक्टूबर को  सायं  05: 28 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, छोटी दिवाली 24 अक्तूबर को भी मनाई जा सकती है। लेकिन कुछ लोग इसे 23 को भी मनाएंगे। 

बड़ी दिवाली की सही तिथि 

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि 24 अक्तूबर, सायं 05:28 से लग रही है, जो 25 अक्तूबर सायं 04:19 मिनट तक रहेगी।  25 अक्तूबर  को शाम प्रदोष काल लगने से पहले ही अमावस्या तिथि समाप्त हो रही है। ऐसे में बड़ी दिवाली 24 अक्तूबर को ही मनाई जाएगी। 

दिवाली पर लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त 

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त- 24 अक्तूबर सायं 06:53 से रात 08:16 तक

अभिजीत मुहूर्त- 24 अक्तूबर पर 11:19 से दोपहर 12:05 तक

विजय मुहूर्त- 24 अक्तूबर दोपहर 01:36 से 02:21 तक।

रविवार, 16 अक्तूबर 2022

आज मनाया जाएगा 'अहोई अष्टमी' का पर्व 

आज मनाया जाएगा 'अहोई अष्टमी' का पर्व 

सरस्वती उपाध्याय 

अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक मास में कृष्ण-पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत अहोई माता को समर्पित है। इस दिन माताएं अपने पुत्रों की दीर्घायु और सुख-सपन्नता के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। फिर रात को तारों को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। इस साल अहोई अष्टमी व्रत की तारीख को लेकर लोग बहुत कन्फ्यूज हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत 17 अक्टूबर को रखें।

अहोई अष्टमी की तिथि...
हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई का व्रत रखा जाएगा और यह तिथि 17 अक्‍टूबर को सुबह 9 बजकर 29 मिनट से शुरू होगी और 18 अक्‍टूबर को सुबह 11 बजकर 57 मिनट पर इसका समापन होगा। अहोई अष्टमी पर पूजा का शुभ मुहूर्त 17 अक्टूबर को शाम 06 बजकर 14 मिनट से लेकर शाम 07 बजकर 28 मिनट तक रहेगा। पूजा की अवधि 01 घंटा 14 मिनट होगी।

अहोई अष्टमी पर शुभ योग मुहूर्त...
अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11 बजकर 43 मिनट से लेकर सुबह 12 बजकर 29 मिनट तक
विजय मुहूर्त- शाम 5 बजकर 50 मिनट से लेकर 07 बजकर 05 मिनट तक।

अहोई अष्टमी की पूजन विधि...
अहोई अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पुत्र की लंबी आयु की कामना करते हुए व्रत का संकल्प लें। अहोई पूजा के लिए गेरू से दीवार पर उनके चित्र के साथ ही साही और उसके सात पुत्रों की तस्वीर बनाएं। देवी को चावल, मूली, सिंघाड़ा अर्पित करें और अष्टोई अष्टमी व्रत की कथा सुनें। पूजा के समय एक लोटे में पानी भरें और उसके ऊपर करवे में पानी भरकर रखें। इसमें इस्तेमाल होने वाला करवा वही होना चाहिए, जिसे करवा चौथ में इस्तेमाल किया गया है। शाम को तारे निकलने के बाद लोटे के जल से अर्घ्य दें।

अहोई अष्टमी व्रत की कथा...
पौराणिक कथा के अनुसार, एक गांव में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे. दीपावली से पहले साहूकार की पत्नी घर की पुताई करने के लिए मिट्टी लेने खदान गई। वहां वह कुदाल से मिट्टी खोदने लगी। खुदाई वाले स्थान पर सेई की एक मांद थी, जहां वो अपने बच्चों के साथ रहती थी। अचानक साहूकार की पत्नी के हाथों से कुदाल सेई के बच्चे को लग गई और उसकी मृत्यु हो गई। साहूकारनी को इसका बड़ा पछतावा हुआ। आखिर में साहूकारनी घर लौट आई।

कुछ समय बाद साहूकारनी के एक बेटे की मृत्यु हो गई। फिर एक के बाद एक उसके सात बेटों की मौत हो गई। वो बहुत दुखी रहने लगी। एक दिन उसने अपने पड़ोसी को सेई के बच्चे की मौत की घटना सुनाई और कहा कि उससे अनजाने में यह पापा हुआ था। परिणाम स्वरूप उसके सातों बेटों की मौत हो गई। यह बात जब सबको पता चली तो गांव की वृद्ध औरतों ने साहूकार की पत्नी को दिलासा दिया।

वृद्ध औरतों ने साहूकार की पत्नी को चुप करवाया और कहने लगी आज जो बात तुमने सबको बताई है। इससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है। उन्होंने साहूकारनी को अष्टमी के दिन अहोई माता, सेई और उसके बच्चों का चित्र बनाकर उनकी पूजा करने को कहा। ताकि उसकी सारे पाप धुल जाएं।

साहूकार की पत्नी ने सबकी बात मानते हुए कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को व्रत रखा और विधिवत पूजा कर क्षमा मांगी‌। उसने प्रतिवर्ष नियमित रूप से इस व्रत का पालन किया। आखिरकार उसे सात पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई। कहते हैं कि तभी से अहोई अष्टमी का व्रत रखने की परंपरा चली आ रही है।

सूर्य ग्रहण: 26 को मनाया जाएगा 'गोवर्धन' पर्व

सूर्य ग्रहण: 26 को मनाया जाएगा 'गोवर्धन' पर्व

सरस्वती उपाध्याय 

हर साल दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा त्यौहार धूम-धाम से मनाया जाता है। लेकिन इस वर्ष ऐसा नहीं होगा। बता दें कि गोवर्धन पूजा इस वर्ष 26 अक्टूबर 2022 को मनाया जाएगा। इस साल दीपावली पर्व 24 अक्टूबर को है लेकिन अगले दिन यानी 25 अक्टूबर 2022 को सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है। जिसके कारण गोवर्धन पर्व पर्व 26 अक्टूबर को मनाया जाएगा। किवदंतियों के अनुसार गोवर्धन पूजा के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र देव के अहंकार को परास्त किया था और ब्रज वासियों को भगवान श्री कृष्ण ने देवराज इंद्र के प्रकोप से बचाया था। इसी उपलक्ष में आज भी गोवर्धन पूजा का आयोजन किया जाता है। आइए जानते हैं, इस साल गोवर्धन पूजा शुभ मुहूर्त और पूजा के नियम।

गोवर्धन पूजा शुभ मुहूर्त

गोवर्धन पूजा तिथि- 26 अक्टूबर 2022, बुधवार

गोवर्धन पूजा प्रातः काल मुहूर्त – 26 अक्टूबर सुबह 06:29 से सुबह 08:43 तक

पूजा अवधि- 02 घण्टे 14 मिनट

प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ- 25 अक्टूबर शाम 04:18 बजे से

प्रतिपदा तिथि समाप्त- 26 अक्टूबर 2022 को दोपहर 02:42 बजे तक

गोवर्धन पूजा के दिन गोबर का इस्तेमाल कर गोवर्धन देवता को बनाया जाता है और उन्हें फूलों से सजाया जाता है। पूजा के दौरान गोवर्धन देवता को नैवेद्य, दीप, फूल, फल और दीप अर्पित किए जाते हैं। बता दें कि गोवर्धन देवता को शयन मुद्रा में बनाया जाता है और उनकी नाभि की जगह मिट्टी का दिया रखा जाता है। इस दीपक में दूध, दही, गंगाजल, शहद और बताशे अर्पित किया जाते हैं और प्रसाद के रूप में इन्हें बांटा जाता है। पूजा के बाद इनकी सात बार परिक्रमा की जाती है। परिक्रमा के वक्त लोटे से जल गिराते हुए और जौ बोते हुए परिक्रमा करने का विधान है। इस दिन भगवान विश्वकर्मा की भी पूजा की जाती है।

शास्त्रों में बताया गया है कि गोवर्धन पूजा के दिन अन्नकूट का आयोजन अनिवार्य है। अन्नकूट का अर्थ होता है, अन्न का मिश्रण। इस मिश्रण को भगवान श्री कृष्ण को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है और पूजा के बाद इन सभी चीजों को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

बुधवार, 12 अक्तूबर 2022

गणेश पूजा: आज मनाया जाएगा 'करवाचौथ' का पर्व 

गणेश पूजा: आज मनाया जाएगा 'करवाचौथ' का पर्व 

सरस्वती उपाध्याय 

करवाचौथ का व्रत सौभाग्यवती महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य का प्रतीक है। पति-पत्नी के पारस्परिक प्रेम का त्योहार करवाचौथ गुरुवार, 13 अक्टूबर को हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। इसको करने वाली महिलाएं अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। सौभाग्यवती महिलाएं प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर के पति की आयु की कामना से करवाचौथ के व्रत का संकल्प लेती हैं।

करवाचौथ पर्व का महत्व...

बता दें कि करवाचौथ का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार कर अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर शिव परिवार के साथ-साथ करवा माता की उपासना करती हैं और उनसे अपनी पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।

अनेक महिलाएं करवा चौथ का उद्यापन करती हैं और चीनी के 16 करवे वितरित करती हैं। पंडित दिनेश मिश्रा ने बताया कि करवा चौथ पर चंद्रोदय रात करीब 8.21 मिनट पर होगा।

ऐसे करें व्रत...

दिन में निराहार रहें। आवश्यक हो तो चाय, दूध और फलाहार कर सकते हैं। दुपहर बाद अपने घर की सभी महिलाएं अथवा पड़ोस की महिलाएं इकट्ठा होकर किसी मंदिर में अथवा किसी महिला के घर एकत्र होकर करवाचौथ की कहानी सुनें। बुजुर्ग महिलाएं अथवा सासु आदि से कहानी सुनी तो अच्छा होता है। सास और बुजुर्ग महिलाओं के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लें। उनको बायना दें।

इतने बजे होगा चंद्र उदय...

चंद्रमा उदय होने पर करवे से चंद्रमा को अर्घ्य दें और अपने पति के आरती करें। पति के हाथ से अपने व्रत का समापन करें और भोजन करें। इस बार करवाचौथ के दिन बहुत अच्छे योग बन रहे हैं। सिद्धि योग में करवाचौथ का व्रत आरंभ होगा। कृतिका के चंद्रमा अर्थात वृष राशि में चंद्रमा अपनी उच्च राशि में रहेंगे। उच्च राशि में चंद्रमा बहुत शुभ होते हैं। वे सभी मनोकामना पूरा करने वाले होते हैं। पति की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह योग शुभ है। करवाचौथ पूजन करने के लिए यह मुहूर्त श्रेष्ठ है। 13 अक्टूबर को चंद्रमा रात्रि 8:12 बजे उदय होंगे। तभी महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने व्रत का समापन करेंगी।

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2022

'महाकालेश्वर' के दर्शन करने गर्भगृह पहुंचे पीएम

'महाकालेश्वर' के दर्शन करने गर्भगृह पहुंचे पीएम 


मनोज सिंह ठाकुर 

उज्जैन। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने गर्भगृह पहुंचे। उन्होंने नंदी को प्रणाम कर गर्भगृह में प्रवेश किया। मोदी ने महाकाल के सामने जप किया। पीएम मोदी ने भगवान महाकाल को चंदन, अबीर, बिलपत्र, कुमकुम, मोगरे और गुलाब की माला अर्पित की। जनेऊ चढ़ाकर ड्राइफूट और फल का भोग लगाया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाकाल को नवीन वस्त्र चढ़ाए। वे संध्या आरती में शामिल हुए। विधि-विधान से महाकाल की पूजा की। श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के नए दर्शन परिसर महाकाल लोक को कुछ ही देर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भक्तों को समर्पित करेंगे।  

सोमवार, 3 अक्तूबर 2022

नवरात्रि का नौवां दिन मां 'सिद्धिदात्री' को समर्पित 

नवरात्रि का नौवां दिन मां 'सिद्धिदात्री' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 

सिद्धिदात्री शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, सिद्धि का अर्थ है ध्यान करने की क्षमता और धात्री का अर्थ है दाता। मां सिद्धिदात्री का स्वरूप इस प्रकार है– मां सिद्धिदात्री के चार हाथ हैं और इनके प्रत्येक हाथ में एक चक्र, शंख, गदा और कमल सुशाेभित है। उनकी आठ सिद्धियां हैं, जो अनिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकम्ब्य, इशित्वा और वशित्व हैं।

भगवान शिव को अर्धनारीश्वर के नाम से जाना जाता है। क्योंकि, भगवान शिव का एक पक्ष देवी सिद्धिदात्री का है। शास्त्रों के अनुसार शिव ने देवी सिद्धिदात्री की पूजा की और सभी सिद्धियों को प्राप्त किया। इस देवी की साधना करने से अलौकिक एवं पारलौकिक कामनाओं की पूर्ति होती है।

भोग– नवमी के दिन मां को तिल का भोग लगाया जाता है।

प्रिय फूल– देवी को चंपा, कमल या गुड़हल का फूल अर्पित करें, इससे परिवार में खुशहाली आएगी। 

शुभ रंग– नवरात्रि की महानवमी पर मां सिद्धिदात्री की पूजा में गुलाबी रंग बहुत शुभ माना गया है। गुलाबी रंग प्रेम और नारीत्व का प्रतीक है।

सिद्धदात्री मां का महत्व...

यह मां आठों देवियों को अपने में समेटे हुए है। आठों देवियों का गुण इनमें समाहित है। अकेले इन्हीं की पूजा से संपूर्ण देवियों की पूजा का भी फल साथ ही साथ मिल जाता है। यह मां कई तरह की सिद्धियों को देने वाली मां है। भक्तगण पर अपनी कृपा निरन्तर बनाएं रखती है। सिद्धि प्रदान करने वाली मां है। इनकी पूजा से भक्त अधिक ऊंचाई पर पहुंचने में सफल हो सकता है। उसकी आर्थिक स्थितियां मजबूत होती है। दरिद्रता दूर होती है। आय के साधन बढ़ते है। मां के आशीर्वाद से भक्तगण निरन्तर उन्नति के शिखर पर आगे बढ़ते रहते है। रिद्धि-सिद्धि प्राप्त करने में भक्त सफल होते है। संपूर्ण मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

नवमी मुहूर्त...

नवरात्रि महा नवमी तिथि शुरू - 3 अक्टूबर 2022, शाम 04.37।

नवमी तिथि समाप्त -  4 अक्टूबर 2022, दोपहर 02.20।

हवन मुहूर्त - सुबह 06.21 - दोपहर 02.20 (4 अक्टूबर 2022)।

अवधि - 8 घंटे

नवरात्रि नवमी व्रत का पारण - 02.20 मिनट के बाद  (4 अक्टूबर 2022)।


ब्रह्म मुहूर्त -   सुबह 04:43 - सुबह 05:32।

अभिजित मुहूर्त  - सुबह 11:52 - दोपहर 12:39।

रवि योग - पूरे दिन।


महानवमी की पूजा-विधि...

यह नौ दुर्गा का आखिरी दिन भी होता है, तो इस दिन माता सिद्धिदात्री के बाद अन्य देवताओं की भी पूजा की जाती है। सबसे पहले मां की चौकी पर मां सिद्धिदात्री की तस्वीर या मूर्ति रखें। इस दिन मां सिद्धिदात्री की विधि विधान से पूजा करें, जिसमें उनको पुष्प, अक्षत्, सिंदूर, धूप, गंध, फल आदि समर्पित करें।  मां सिद्धदात्री सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं, इनकी पूजा ब्रह्म मुहूर्त में करना उत्तम होता है।

सिद्धिदात्री मां का मंत्र...

सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।

सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।


सिद्धिदात्री मां की आरती...

जय सिद्धिदात्री तू सिद्धि की दाता ।

तू भक्तों की रक्षक तू दासों की माता ।।

तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि ।

तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि ।।

कठिन काम सिद्ध कराती हो तुम ।

हाथ सेवक के सर धरती हो तुम ।।

तेरी पूजा में न कोई विधि है ।

तू जगदंबे दाती तू सर्वसिद्धि है ।।

रविवार को तेरा सुमरिन करे जो ।

तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो ।।

तू सब काज उसके कराती हो पूरे ।

कभी काम उस के रहे न अधूरे ।।

तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया ।

रखे जिसके सर पैर मैया अपनी छाया ।।

सर्व सिद्धि दाती वो है भाग्यशाली ।

जो है तेरे दर का ही अम्बे सवाली ‌।।

हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा ।

महानंदा मंदिर में है वास तेरा ।।

मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता ।

वंदना है सवाली तू जिसकी दाता ।।

रविवार, 2 अक्तूबर 2022

नवरात्रि का आठवां दिन माता 'महागौरी' को समर्पित

नवरात्रि का आठवां दिन माता 'महागौरी' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 
हिन्दू धर्म में शारदीय नवरात्र के आठवें दिन को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन मां दुर्गा की सिद्ध स्वरूप माता महागौरी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। बता दें कि नवरात्र के अष्टमी तिथि को दुर्गाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। देशभर में 3 सितंबर को माता आदिशक्ति की विशेष पूजा की जाएगी और व्रत का पालन किया जाएगा। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूजा-पाठ करने से और उपवास रखने से सभी प्रकार की समस्याएं दूर हो जाती हैं और माता महागौरी का आशीर्वाद अपने भक्तों पर सदैव बना रहता है। आइए जानते हैं, कैसे की जानी चाहिए माता की पूजा और क्या है इस दिन का महत्व ?

माता महागौरी का स्वरूप...

मां दुर्गा के आठवें सिद्ध स्वरूप में माता महागौरी का रंग दूध के समान श्वेत है। साथ ही वह इसी रंग के वस्त्र भी धारण करती हैं। माता महागौरी भैंस ओर सवार होकर अपने भक्तों की प्रार्थना सुनने आती हैं। माता की चार भुजाएं हैं और प्रत्येक भुजा में माता ने अभय मुद्रा, त्रिशूल, डमरू और वर मुद्रा धारण किया है।

माता महागौरी की पूजा-विधि...

नवरात्र पर्व के अष्टमी तिथि को ब्रह्ममुहूर्त में स्नान-ध्यान करें और पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। इसके बाद पूजा स्थल को गंगाजल से सिक्त करें। ऐसा करने के बाद व्रत का संकल्प लें और माता को सिंदूर, कुमकुम, लौंग का जोड़ा, इलाइची, लाल चुनरी श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। ऐसा करने के बाद माता महागौरी और मां दुर्गा की विधिवत आरती करें। आरती से पहले दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ अवश्य करें।

शास्त्रों के अनुसार इस दिन नौ कन्याओं के पूजन का भी विधान है। इस दिन 10 या उससे कम उम्र की नौ कन्या और एक बटुक को घर पर आमंत्रित करें और फिर श्रद्धापूर्वक पूड़ी-सब्जी या खीर-पूड़ी का भोग लागएं। ऐसा करने से मां प्रसन्न होती हैं।

माता महागौरी मंत्र...

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।

सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्।।

पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।

वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्।।

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।

मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्।।

प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।

कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्।।


स्तोत्र पाठ...


सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।

ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्।।

सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।

डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्।।

त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।

वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्।।


माता महागौरी की आरती...


जय महागौरी जगत की माया ।

जय उमा भवानी जय महामाया ।।

हरिद्वार कनखल के पासा ।

महागौरी तेरा वहा निवास ।।

चंदेर्काली और ममता अम्बे ।

जय शक्ति जय जय मां जगदम्बे ।।

भीमा देवी विमला माता ।

कोशकी देवी जग विखियाता ।।

हिमाचल के घर गोरी रूप तेरा ।

महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा ।।

सती 'सत' हवं कुंड मै था जलाया ।

उसी धुएं ने रूप काली बनाया ।।

बना धर्म सिंह जो सवारी मै आया ।

तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया ।।

तभी मां ने महागौरी नाम पाया ।

शरण आने वाले का संकट मिटाया ।।

शनिवार को तेरी पूजा जो करता ।

माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता ।।

'चमन' बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो ।

महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो ।।

शनिवार, 1 अक्तूबर 2022

नवरात्रि का सातवां दिन मां 'कालरात्रि' को समर्पित 

नवरात्रि का सातवां दिन मां 'कालरात्रि' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 

शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है। 02 अक्टूबर को शारदीय नवरात्रि की सप्तमी तिथि है। नवरात्रि में सातवें दिन महासप्तमी पड़ती है। इस दिन मां दुर्गा की सातवीं स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की जाती है। सदैव शुभ फल देने के कारण इनको शुभंकरी भी कहा जाता है। मां कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने के लिए जानी जाती हैं, इसलिए इनका नाम कालरात्रि है। मां दुर्गा की सातवीं स्वरूप मां कालरात्रि तीन नेत्रों वाली देवी हैं। कहा जाता है, जो भी भक्त नवरात्रि के सांतवें दिन विधि-विधान से मां कालरात्रि की पूजा करता है, उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। मां कालरात्रि की पूजा से भय और रोगों का नाश होता है। साथ ही भूत प्रेत, अकाल मृत्यु ,रोग, शोक आदि सभी प्रकार की परेशानियों से छुटकारा मिलता है। ऐसे में आइए जानते हैं मां कालरात्रि की पूजा पूजा की तिथि, शुभ मुहूर्त और मंत्र... 

मां कालरात्रि का स्वरूप...

कह जाता है कि मां दुर्गा को कालरात्रि का रूप शुम्भ, निशुम्भ और रक्तबीज को मारने के लिए लेना पड़ा था। देवी कालरात्रि का शरीर अंधकार की तरह काला है। इनके श्वास से आग निकलती है। मां के बाल बड़े और बिखरे हुए हैं। गले में पड़ी माला बिजली की तरह चमकती रहती है। मां के तीन नेत्र ब्रह्मांड की तरह विशाल व गोल हैं। मां के चार हाथ हैं, जिनमें एक हाथ में खडग अर्थात तलवार, दूसरे में लौह अस्त्र, तीसरे हाथ अभय मुद्रा में है और चौथा वरमुद्रा में है।

पूजा-विधि...

सप्तमी तिथि के दिन ब्रह्म मुहूर्त में प्रातः स्नान करने के बाद पूजा आरंभ करनी चाहिए। स्नान के बाद माता के सामने घी का दीपक जलाएं। उन्हें लाल रंग के फूल अर्पित करें। मां कालरात्रि की पूजा में मिष्ठान, पंच मेवा, पांच प्रकार के फल, अक्षत, धूप, गंध, पुष्प और गुड़ नैवेद्य आदि का अर्पण किया जाता है। 


मंत्र...

ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ऊं कालरात्रि दैव्ये नम: .

ॐ कालरात्र्यै नम:

ॐ फट् शत्रून साघय घातय ॐ

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गति नाशिन्यै महामायायै स्वाहा।


ध्यान मंत्र...

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।

वामपादोल्ल सल्लोहलता कण्टक भूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

नवरात्रि का छठां दिन मां 'कात्यायनी' को समर्पित 

नवरात्रि का छठां दिन मां 'कात्यायनी' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 
नवरात्रि का छठां दिन मां कात्यायनी की पूजा के लिए समर्पित है। माँ कात्यायनी नवदुर्गा का छठा रूप है। विवाह तय करने में समस्याओं का सामना करने वाली लड़की मां कात्यायनी से एक सुखी और सुगम वैवाहिक जीवन प्राप्त करने के लिए प्रार्थना कर सकती है। वह वैवाहिक जीवन में सद्भाव और शांति सुनिश्चित करती है। यह भी माना जाता है कि नवरात्रि में उनकी पूजा करने से कुंडली में ग्रहों के सभी नकारात्मक प्रभावों को दूर करने में मदद मिल सकती है।

नव दुर्गा स्वरूपों में माँ कात्यायनी देवी का छठां स्वरुप का महत्व...

नवदुर्गा के छठवें स्वरूप में माँ भगवती कात्यायनी की पूजा की जाती है। माँ कात्यायनी का जन्म कात्यायन ऋषि के घर हुआ था अतः इनको कात्यायनी कहा जाता है। इनकी चार भुजाओं मैं अस्त्र शस्त्र और कमल का पुष्प है, इनका वाहन सिंह है. ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं, गोपियों ने कृष्ण की प्राप्ति के लिए इनकी पूजा की थी। विवाह में आरही बाधाओं के लिए माँ कात्यायनी की पूजा की जाती है, योग्य और मनचाहा पति इनकी कृपा से प्राप्त होता है। ज्योतिष में बृहस्पति का सम्बन्ध इनसे माना जाता है।

माँ कात्यायनी देवी का स्वरूप सोने के समाना चमकीला है। चार भुजा धारी माँ कात्यायनी सिंह पर सवार हो कर  एक हाथ में तलवार और दूसरे में अपना प्रिय पुष्प कमल लिये हुए बैठी है। तथा अन्य दो हाथ वरमुद्रा और अभयमुद्रा में हैं। इनका वाहन सिंह हैं। देवी कात्यायनी के नाम और जन्म से जुड़ी एक कथा प्रसिद्ध है।

हमारे ऋषि मुनियों में एक  श्रेष्ठ कात्य गोत्र के  ऋषि महर्षि कात्यायन जी थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। मां भगवती को पुत्री के रूप में पाने की इच्छा रखते हुए उन्होंने पराम्बा माँ भगवती  की कठोर तपस्या की। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें पुत्री का वरदान दिया। कुछ समय बीतने के बाद राक्षस महिषासुर का अत्याचार अत्यधिक बढ़ गया। तब त्रिदेवों के तेज से एक सोने के सामान चमकीली और चतुर्भजाओं वाली एक कन्या ने जन्म लिया और उसका वध कर दिया। कात्य गोत्र में जन्म लेने के कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ गया।

मां कात्यायनी अविवाहित कन्याओं के लिए विशेष फलदायिनी मानी गई हैं। जिन कन्याओं के विवाह में विलम्ब या परेशानियां आती है तो वह माँ कात्यायनी के चतुर्भुज रूप की आराधना कर माँ का आशीर्वाद प्राप्त कर अपने मांगलिक कार्य को पूर्ण करती है  शिक्षा प्राप्ति के क्षेत्र में प्रयासरत भक्तों को माता की अवश्य उपासना करनी चाहिए। माँ कात्यायनी देवी के पूजन में मधु का विशेष महत्व है। इस दिन प्रसाद में मधु यानि शहद का प्रयोग करना चाहिए। इसके प्रभाव से साधक सुंदर रूप प्राप्त करता है।

आरती...

जय जय अम्बे जय कात्यायनी। जय जग माता जग की महारानी॥
बैजनाथ स्थान तुम्हारा। वहावर दाती नाम पुकारा॥
कई नाम है कई धाम है। यह स्थान भी तो सुखधाम है॥
हर मन्दिर में ज्योत तुम्हारी। कही योगेश्वरी महिमा न्यारी॥
हर जगह उत्सव होते रहते। हर मन्दिर में भगत है कहते॥
कत्यानी रक्षक काया की। ग्रंथि काटे मोह माया की॥
झूठे मोह से छुडाने वाली। अपना नाम जपाने वाली॥
बृहस्पतिवार को पूजा करिए। ध्यान कात्यानी का धरिये॥
हर संकट को दूर करेगी। भंडारे भरपूर करेगी॥
जो भी माँ को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे॥

मां कात्यायनी की पूजा-विधि...

नवरात्रि के छठे दिन सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके गंगाजल से शुद्धि करें। अब सबसे पहले मां कात्यायनी की प्रतिमा अथवा तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम करें। फिर पूजन के दौरान देवी को पीले अथवा लाल रंग के वस्त्र अर्पित करें। इसके बाद देवी मां को पीले रंग के पुष्प, कच्ची हल्दी की गांठ चढ़ाएं। फिर माता को शहद का भोग लगाएं। मां कात्यायनी के समक्ष आसन पर बैठकर मंत्र, दुर्गा चालीसा और सप्तशती का पाठ अवश्य करें। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर मां की आरती उतारें। पूजा के बाद सभी को प्रसाद बांटें।

मां कात्यायनी मंत्र...

चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दू लवर वाहना
कात्यायनी शुभं दद्या देवी दानव घातिनि

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

गुरुवार, 29 सितंबर 2022

नवरात्रि का पांचवां दिन मां 'स्कंदमाता' को समर्पित

नवरात्रि का पांचवां दिन मां 'स्कंदमाता' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 
आश्विन मास के शुक्ल-पक्ष की पंचमी तिथि के दिन के साथ शारदीय नवरात्र का पांचवा दिन है। नवरात्र के पांचवें दिन मां दुर्गा के स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है। माना जाता है कि स्कंदमाता की विधिवत पूजा करने से सुख-समृद्धि के साथ-साथ संतान प्राप्ति होती है। जानिए नवरात्र के पांचवें दिन कैसे करें स्कंदमाता की पूजा, साथ ही जानिए शुभ मुहूर्त, भोग और मंत्र।

नवरात्र की पंचमी तिथि का शुभ मुहूर्त...

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि आरंभ- सुबह 12 बजकर 10 मिनट से शुरू

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि समाप्त- रात 10 बजकर 34 मिनट तक

अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11 बजकर 47 मिनट से 12 बजकर 35 मिनट तक

राहुकाल- सुबह 10 बजकर 42 मिनट तक दोपहर 12 बजकर 11 मिनट तक

कैसा है मां स्कंदमाता का स्वरूप...

स्कंदमाता की स्वरूप काफी प्यारा है। मां दुर्गा की स्वरूप स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं, जिसमें दो हाथों में कमल लिए हैं, एक हाथ में कार्तिकेय बाल रूप में बैठे हुए हैं और एक अन्य हाथ में मां आशीर्वाद देते हुए नजर आ रही हैं। बता दें कि मां का वाहन सिंह है, लेकिन वह इस रूप में कमल में विराजमान है।

स्कंदमाता का पूजा विधि...

नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा की पूजा करने से पहले कलश की पूजा करें। इसके बाद मां दुर्गा और उनके स्वरूप की पूजा आरंभ करें। सबसे पहले जल से आचमन करें। इसके बाद मां को फूल, माला चढ़ाएं। इसके बाद सिंदूर, कुमकुम, अक्षत आदि लगाएं। फिर एक पान में सुपारी, इलायची, बताशा और लौंग रखकर चढ़ा दें। इसके बाद मां स्कंदमाता को भोग में फल में केला और इसके अलावा मिठाई चढ़ा दें। इसके बाद जल अर्पित कर दें। इसके बाद घी का दीपक, धूप जलाकर मां के मंत्र का जाप करें। इसके बाद दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और अंत में दुर्गा मां के साथ स्कंदमाता की आरती करें।

स्कंदमाता के मंत्र...
 
मां स्कंदमाता का वाहन सिंह है। इस मंत्र के उच्चारण के साथ मां की आराधना की जाती है। 
 
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
 
ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥
 
संतान प्राप्ति हेतु जपें स्कंद माता का मंत्र...
 
पंचमी तिथि की अधिष्ठात्री देवी स्कन्द माता हैं। जिन व्यक्तियों को संतानाभाव हो, वे माता की पूजन-अर्चन तथा मंत्र जप कर लाभ उठा सकते हैं। मंत्र अत्यंत सरल है...
 
'ॐ स्कन्दमात्रै नम:।।'
 
निश्चित लाभ होगा। इसके अतिरिक्त इस मंत्र से भी मां की आराधना की जाती है।
 
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
 
भोग एवं प्रसाद...

पंचमी तिथि के दिन पूजा करके भगवती दुर्गा को केले का भोग लगाना चाहिए और यह प्रसाद ब्राह्मण को दे देना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है।

बुधवार, 28 सितंबर 2022

नवरात्रि का चौथा दिन मां 'कूष्माण्डा' को समर्पित 

नवरात्रि का चौथा दिन मां 'कूष्माण्डा' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 

शारदीय नवरात्र की चतुर्थी तिथि पर देवी के कूष्मांडा स्वरूप का दर्शन-पूजन करने का विधान है। शास्त्रों के अनुसार, अपनी मंद मुस्कान से पिंड से ब्रह्मांड तक का सृजन देवी ने इसी स्वरूप में किया था। कूष्मांडा स्वरूप के दर्शन पूजन से न सिर्फ रोग-शोक दूर होता है अपितु यश, बल और धन में भी वृद्धि होती है। काशी में देवी के प्रकट होने की कथा राजा सुबाहु से जुड़ी है। देवी कुष्मांडा का मंदिर दुर्गाकुंड क्षेत्र में स्थित है। इन्हें दुर्गाकुंड वाली दुर्गा के नाम से भी जाना जाता है।

किस रंग के कपड़े पहनें...

जातक पूजा के समय लाल, गुलाबी व पीत रंग के वस्त्र धारण करें।

किन राशियों के लिए शुभ...

नवरात्रि का चौथा दिन सभी 12 राशियों के लिए शुभ। विशेषकर मकर और कुंभ राशि के लिए उत्तम।

कौन-सी मनोकामनाएं होती हैं पूरी...

मां कूष्मांडा अपने भक्तों के कष्ट और रोग का नाश करती है। मां कूष्मांडा की पूजा उपासना करने से भक्तों को सभी सिद्धियां मिलती हैं। मान्यता है कि मां की पूजा करने से व्यक्ति के आयु और यश में बढ़ोतरी होती है।


मां कुष्मांडा की पूजा का शुभ मुहूर्त...

नवमी तिथि आरंभ- 29 सितंबर को तड़के 1 बजकर 27 मिनट से शुरू

नवमी तिथि समाप्त- 30 सितंबर सुबह 12 बजकर 9 मिनट तक

विशाखा नक्षत्र- 29 सितंबर सुबह 5 बजकर 52 मिनट से 30 सितंबर सुबह 5 बजकर 13 मिनट तक

अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11 बजकर 35 मिनट से दोपहर 12 बजकर 22 मिनट तक।


कैसा है मां कुष्मांडा का स्वरूप ?

मां कुष्मांडा नौ देवियों में से चौथा अवतार माना जाता है। मां कुष्मांडा की आठ भुजाएं होती है। इसी कारण उन्हें अष्ठभुजा के नाम से जाना जाता है। बता दें कि मां के एक हाथ में जपमाला होता है। इसके साथ ही अन्य सात हाथों में धनुष, बाण, कमंडल, कमल, अमृत पूर्ण कलश, चक्र और गदा शामिल है।

ऐसे करें मां कुष्मांडा की पूजा...

इस दिन सुबह उठकर सभी कामों ने निवृत्त होकर स्नान आदि कर लें। इसके बाद विधिवत तरीके से मां दुर्गा और नौ स्वरूपों के साथ कलश की पूजा करें। मां दुर्गा को सिंदूर, पुष्प, माला, अक्षत आदि चढ़ाएं। इसके बाद मालपुआ का भोग लगाएं और फिर जल अर्पित करें। इसके बाद घी का दीपक और धूप जलाकर मां दुर्गा चालीसा , दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। इसके साथ ही इस मंत्र का करीब 108 बार जाप जरूर करें।

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