धर्म-कर्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
धर्म-कर्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 25 अप्रैल 2022

हिंदू धर्म में 'वरुथिनी एकादशी' का महत्व, जानिए

हिंदू धर्म में 'वरुथिनी एकादशी' का महत्व, जानिए   

सरस्वती उपाध्याय 

हिंदू धर्म में प्रचलित वरुथिनी एकादशी श्री हरिविष्णु को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि एकादशी का व्रत करने से कई वर्षों के तप और कन्या दान करने के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, यह व्रत रखने से मनुष्य के सभी दुख दूर हो जाते हैं और सुखों की प्राप्ति होती है। वरुथिनी एकादशी का हिन्दू धर्म में खास महत्व है। वरुथिनी एकादशी पवित्र बैसाख महीने में आती है, तो आइए भक्त को सभी दुखों से मुक्ति दिलाने वाली वरुथिनी एकादशी व्रत की पूजा-विधि और महत्व के बारे में बताते हैं।

जानें, वरुथिनी एकादशी के बारे में...

हिंदू धर्म में प्रचलित वरुथिनी एकादशी श्री हरिविष्णु को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि एकादशी का व्रत करने से कई वर्षों के तप और कन्या दान करने के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, यह व्रत रखने से मनुष्य के सभी दुख दूर हो जाते हैं और सुखों की प्राप्ति होती है। इस साल वरुथिनी एकादशी 26 अप्रैल को पड़ रही है। दरिद्रता, दुख और दुर्भाग्य दूर करने हेतु एकादशी तिथि पर आप भी इस व्रत कथा का श्रवण कर सकते हैं।

वरुथिनी एकादशी है विशेष...

वरुथिनी एकादशी व्रत से प्राप्त होने वाला फल विशेष होता है। यह फल सूर्य ग्रहण के दौरान किए गए दान के समान होता है। इस व्रत के प्रभाव से सभी दुखी प्राणियों को सुख मिलता है तथा राजा को स्वर्ग प्राप्त होता है। वरुथिनी एकादशी में वरुथिनी शब्द संस्कृत भाषा के वरूथिन से बना हुआ है, जिसका अर्थ होता है प्रतिरक्षक या कवच। पंडितों की मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी व्रत करने से विष्णु भगवान भक्तों की सभी प्रकार के संकट से रक्षा करते हैं।

वरुथिनी एकादशी से जुड़ी कथा...

प्राचीन काल में वरुथिनी एकादशी से जुड़े एक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार नर्मदा नदी के किनारे मांधाता नाम के राजा राज्य करते थे। राजा मांधाता बहुत दानी और तपस्वी स्वभाव के थे। एक बार वह राजा जंगल में तपस्या कर रहे थे। उसी समय एक भालू आया और वह राजा के पैर खाने लगा। लेकिन राजा तपस्या में लीन थे। इसलिए उन्होंने भालू को कुछ नहीं कहा और विष्णु भगवान को याद करने लगे। इस प्रकार विष्णु भगवान प्रकट हुए और उन्होंने राजा को भालू से बचा लिया। लेकिन जब तक विष्णु भगवान ने राजा को बचाया तब तक भालू ने राजा के पैरो को बहुत जख्मी कर दिया था। राजा मांधता के पैरों को बहुत नुकसान हो गया। तब विष्णु भगवान ने राजा को वृंदावन जाकर वरुथिनी एकादशी करने के कहा। वरुथिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से राजा के पैर पहले की तरह ठीक हो गए। 

'वरुथिनी एकादशी' का महत्व...

हिंदू धर्म में वरुथिनी एकादशी का खास महत्व होता है। इस एकादशी को सौभाग्य और पुण्य प्रदान करने वाला कहा गया है। इस व्रत को करने से सारे पाप और कष्ट मुक्त हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी व्रत का प्रभाव कन्या दान से मिलने वाले फल के समान होता है। हिन्दू धर्म में वरुथिनी एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है। इसलिए वरुथिनी एकादशी व्रत में सावधानी बरतें। इस दिन व्रती कई प्रकार के नियमों का पालन करना चाहिए। इसमें व्यक्ति सत्य बोलें और झूठ से बचें। एकादशी के दिन क्रोध न करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। साथ ही कांसे के बर्तन में फलाहार न करें। व्रत के दिन जुआ नहीं खेलना चाहिए। इसके अलावा एकादशी के दिन पान नहीं खाएं और दातुन का प्रयोग न करें। जो भक्त एकादशी का व्रत नहीं करते हैं, उऩ्हें एकादशी के दिन चावल नहीं खाने चाहिए।

'एकादशी व्रत' की पूजा-विधि...

वरूथिनी एकादशी की पूजा बहुत विशेष होती है। इस दिन भगवान मधुसूदन और विष्णु के वराह अवतार की पूजा होती है। एकादशी व्रत में उपवास तो एकादशी के दिन रखा जाता है। लेकिन दशमी की रात से ही सावधानीपूर्वक व्रती को भोजन त्याग देना चाहिए। साथ ही दशमी के दिन से ही व्रत के नियमों का पालन प्रारम्भ कर देना चाहिए। इसके लिए दशमी के दिन मसूर की दाल और बैंगन का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा दशमी के दिन केवल एक बार ही भोजन ग्रहण करें। दशमी के दिन भोजन हमेशा सात्विक करें। वरुथिनी एकादशी के दिन सुबह जल्‍दी उठें। प्रातः नित्य कर्म से निवृत हो कर घर की साफ-सफाई करें और स्नान कर साफ कपड़े पहनें। उसके बाद व्रत करने का संकल्प करें। घर के मंदिर की साफ-सफाई करें। उसके बाद विष्णु भगवान के वराह अवतार की पूजा करें। पूजा के दौरान वरुथिनी एकादशी व्रत की कथा पढ़े और प्रसाद चढ़ाकर भगवान से प्रार्थना करें। एकादशी की रात में सोएं नहीं बल्कि रात्रि जागरण में कीर्तन करें। पंडितों का मानना है कि द्वादशी के दिन ब्राह्मण को भोजन करा कर दान दें। उसके बाद पारण करें।

रविवार, 24 अप्रैल 2022

सलाखों में रहकर 200 बंदी इबादत में मसरूफ

सलाखों में रहकर 200 बंदी इबादत में मसरूफ
 
आदर्श श्रीवास्तव
लखीमपुर खीरी। अपने रब को याद करने के लिए कोई स्थान कोई जगह चिन्हित नहीं होती है। अल्लाह की इबादत के लिए कोई जगह नियत नहीं है हर जगह और हर समय इंसान इबादत कर सकता है। रमजान के पवित्र महीने में जेल की सलाखों में रहकर भी 200 बंदी इबादत में मसरूफ हैं। पहले दिन से ही लगातार रोजा रख रहे हैं।
जेल प्रशासन भी जेल मैन्युअल के मुताबिक रोजदार बंदियों को इफ्तार और सहरी की व्यवस्था कर रहा है। मौजूद समय में 200 बंदी पहले दिन से रोजा रख रहे हैं और अल्लाह की इबादत में मशगूल हैं। रोजा रखने वाले सभी बंदियों को शाम होते ही इफ्तार और सहरी का सामान दे दिया जाता है बंदी अपनी-अपनी बैरकों में सामूहिक रूप से रोजा इफ्तार करते हैं और नमाज भी अदा करते हैं।सुबह सहरी के समय सभी रोजदार बन्दियों को जगा दिया जाता है। बंदी उठकर सहरी करते हैं रोजा रखने वाले बंदी जेल में रहकर नमाज अदा करते हैं और कुरआन की तिलावत भी करते हैं। जेल अधीक्षक पीपी सिंह ने बताया कि रोजा रखने वाले बंदियों को इफ्तार व सहरी का सामान दिया जाता है। रोजादार बंदियों का पूरा ख्याल भी रखा जा रहा है।

बंदी रोजेदारों को ये मिलता है इफ्तार व सहरी
रोजदार बंदियों को ब्रेड, दो केला, नींबू, दो खजूर, 45 ग्राम चीनी, शर्बत, सौ ग्राम दही, दो बिस्कुट व एक समय का पूरा खाना दिया जा रहा है।

हाफिज आसिम 14 वर्षों से कैदियों को पढ़ा रहे हैं नमाज़

लखीमपुर मोहल्ला राजापुर के निवासी हाफिज आसिम 14 बरसो से जेल जेल के कैदियों की इमामत कर रहे हैं 2008 में इनके वालिद क़ासिम हाशमी का देहांत होने के बाद से उनके बड़े बेटे हाफ़िज़ आसिम हाशमी क़ैदियों की इमामत कर रहे हैं। उन्होंने ने बताया कि अलविदा की नमाज़,ईद उल फितर की नमाज़,और ईद उल अज़हा की नमाज़ की इमामत वो ज़िला कारागार में बन्द मुस्लिम क़ैदियों की इमामत करते हैं और उनको ऐसे अहम मौके पर कुछ दीनी बात भी बताते हैं। 

उन्होंने बताया कि पिछले 2 वर्षों में कोरोना की बीमारी की वजह से बाहरी लोगों का आना जाना बंद था जिसकी वजह से 2 वर्षों से वह नमाज पढ़ाने के लिए नहीं गए हैं लेकिन इंतजा मियां का अगर कोई निमंत्रण पत्र आता है तो वह नमाज पढ़ाने के लिए जरूर जाएंगे। मालूम हो कि इनके वालिद हाफिज कासिम को सुन्नी अंजुमन इस्लमियाँ ने रखा था जिन्होंने लगभग 17 साल इमामत करते रहे 2008 में उनका इंतक़ाल हो जाने की वजह से उनके बड़े बेटे हाफिज आसिम हाशमी लगातार 14बरसो से अलविदा ,ईद उल फितर,ईद उल अजहा की नमाज़ की इमामत कर रहे हैं।

गुरुवार, 24 मार्च 2022

2 अप्रैल से शुरू होकर 11 तक रहेंगे चैत्र 'नवरात्रि'

2 अप्रैल से शुरू होकर 11 तक रहेंगे चैत्र 'नवरात्रि'    

सरस्वती उपाध्याय                
अप्रैल की 2 तारीख, शुक्रवार से चैत्र नवरात्रि शुरू हो जाएंगे। इन चैत्र नवरात्रि के इन 9 दिनों में मां दुर्गा के 9 अलग अलग रूपों की पूजा की जाती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल में 4 नवरात्रि आते हैं, जिनमें चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि का अधिक महत्व बताया गया है। इस बार चैत्र नवरात्रि 2 अप्रैल से शुरू होकर 11 अप्रैल तक रहेंगे।
नवरात्रि में कुछ कार्य करने की मनाही होती है। बताया जाता है कि अगर इन निम्न कार्यों को किया जाता है तो बदकिस्मत रास्ता पकड़ लेती है, जिससे जीवन में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। नवरात्रि के दौरान इन कार्यों को करने से बचना चाहिए‌।
जैसे.....।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी पवित्र समारोह या त्योहार के दौरान शराब के सेवन से पूरी तरह बचना चाहिए। चैत्र नवरात्रि देवी मां की आराधना के लिए सबसे पवित्र माने जाते हैं, इसलिए नवरात्रि पूजा के 9 दिनों के दौरान शराब का सेवन नहीं करना चाहिए।
नवरात्रि के दौरान किसी से भी अशुभ या अपशब्द बोलने से बचना चाहिए। इसका कारण है कि नवरात्रि देवी की भक्ति और आराधना करने का समय होता है। अगर इस दौरान गलत शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो देवी मां क्रोधित हो सकती हैं। इसलिए ऐसा करने से बचें।
नाखून काटना।
नवरात्रि के 9 दिनों के दौरान नाखून काटने की मनाही होती है। आपने देखा भी होगा कि कई लोग नवरात्रि शुरू होने के पहले ही नाखून काट लेते हैं, ताकि 9 दिनों में नाखून काटने की जरूरत न पड़े। कहा जाता है कि ऐसा करने से देवी क्रोधित हो जाती हैं और फिर उनके क्रोध का सामना करना पड़ता है। इसलिए ऐसा करने से बचें।
नवरात्रि के दौरान कटिंग और शेविंग कराने से बचें। कहा जाता है कि नवरात्रि के दौरान बाल कटवाने से भविष्‍य में सफल होने की संभावना कम हो जाती हैं। इसलिए 9 दिनों तक बाल और बियर्ड कटवाने से बचें।
नॉनवेज खाना।
9 दिनों में देवी दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। इन 9 दिनों तक देवी भक्त उपवास रखते हैं और देवी की पूजा करते हैं। इसलिए नवरात्रि के दौरान सभी प्रकार के नॉनवेज फूड खाने से बचना चाहिए।

सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

चतुर्दशी को मनाया जाएगा 'महाशिवरात्रि' पर्व, जानिए

चतुर्दशी को मनाया जाएगा 'महाशिवरात्रि' पर्व, जानिए   

सरस्वती उपाध्याय           
'महाशिवरात्रि' भारतीयों का एक प्रमुख त्यौहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। माघ कृष्ण-पक्ष त्रयोदशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। लेकिन, इस बार कृष्ण-पक्ष की तिथि चतुर्दशी को 'महाशिवरात्रि' पर्व मनाया जाएगा। यानी कि 1 मार्च को 'महाशिवरात्रि' पर्व मनाया जाएगा।
माना जाता है कि सृष्टि का प्रारम्भ इसी दिन से हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है) के उदय से हुआ। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत सहित पूरी दुनिया में महाशिवरात्रि का पावन पर्व बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है।

कश्मीर शैव मत में इस त्यौहार को हर-रात्रि और बोलचाल में 'हेराथ' या 'हेरथ' भी कहा जाता हैं।

महाशिवरात्रि से सम्बन्धित कई पौराणिक कथाएँ है।

समुद्र मंथन: समुद्र मंथन अमर अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित था, लेकिन इसके साथ ही हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में ब्रह्माण्ड को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कण्ठ में रख लिया था। जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव बहुत दर्द से पीड़ित हो उठे थे और उनका गला बहुत नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव 'नीलकंठ' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उपचार के लिए, चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जागते रहने की सलाह दी। इस प्रकार, भगवान भगवान शिव के चिन्तन में एक सतर्कता रखी। शिव का आनन्द लेने और जागने के लिए, देवताओं ने अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाने। जैसे सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। तब से इस दिन, भक्त उपवास करते है।

शिकारी कथा: एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।'

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिन्ता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे शिकारी हँसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरन्त लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्षपर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृगविनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलम्ब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊँगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किन्तु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवम् सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवम् दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।

अनुष्ठान: गेंदे के फूलों की अनेक प्रकार की मालायें, जो शिव को चढ़ाई जाती हैं। इस अवसर पर भगवान शिव का अभिषेक अनेकों प्रकार से किया जाता है। जलाभिषेक : जल से और दुग्‍धाभिषेक : दूध से। बहुत जल्दी सुबह-सुबह भगवान शिव के मन्दिरों पर भक्तों, जवान और बूढ़ों का ताँता लग जाता है वे सभी पारम्परिक शिवलिंग पूजा करने के लिए जाते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं। भक्त सूर्योदय के समय पवित्र स्थानों पर स्नान करते हैं जैसे गंगा, या (खजुराहो के शिव सागर में) या किसी अन्य पवित्र जल स्रोत में। यह शुद्धि के अनुष्ठान हैं, जो सभी हिन्दू त्योहारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पवित्र स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहने जाते हैं, भक्त शिवलिंग स्नान करने के लिए मन्दिर में पानी का बर्तन ले जाते हैं महिलाओं और पुरुषों दोनों सूर्य, विष्णु और शिव की प्रार्थना करते हैं मन्दिरों में घण्टी और "शंकर जी की जय" ध्वनि गूँजती है। भक्त शिवलिंग की तीन या सात बार परिक्रमा करते हैं और फिर शिवलिंग पर पानी या दूध भी डालते हैं। हालाकि, इन सभी अनुष्ठान का वर्णन हमारे पवित्र शास्त्रों में कहीं पर भी नही है, जिससे यह शास्त्रानुकूल साधना नही है।शिव पुराण के अनुसार, महाशिवरात्रि पूजा में छह वस्तुओं को अवश्य शामिल करना चाहिए।

शिव लिंग का पानी, दूध और शहद के साथ अभिषेक। बेर या बेल के पत्ते जो आत्मा की शुद्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं।
सिंदूर का पेस्ट स्नान के बाद शिव लिंग को लगाया जाता है। यह पुण्य का प्रतिनिधित्व करता है।
फल, जो दीर्घायु और इच्छाओं की सन्तुष्टि को दर्शाते हैं।
जलती धूप, धन, उपज (अनाज)।
दीपक जो ज्ञान की प्राप्ति के लिए अनुकूल है;
और पान के पत्ते जो सांसारिक सुखों के साथ सन्तोष अंकन करते हैं।
अभिषेक में निम्न वस्तुओं का प्रयोग नहीं किया जाता है।
केतकी के फूल।

भगवान शिव की अन्य पारंपरिक पूजा...
ज्योतिर्लिंग: बारह ज्योतिर्लिंग (प्रकाश के लिंग) जो पूजा के लिए भगवान शिव के पवित्र धार्मिक स्थल और केन्द्र हैं। वे स्वयम्भू के रूप में जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है "स्वयं उत्पन्न"। बारह स्‍थानों पर बारह ज्‍योर्तिलिंग स्‍थापित हैं।

1. सोमनाथ यह शिवलिंग गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित है।

2. श्री शैल मल्लिकार्जुन मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित है श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग।

3. महाकाल उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, जहाँ शिवजी ने दैत्यों का नाश किया था।

4. ॐ कारेश्वर मध्यप्रदेश के धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश होकर वरदाने देने हुए यहां प्रकट हुए थे शिवजी। जहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित हो गया।

5. नागेश्वर गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग।

6. बैजनाथ बिहार के बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग।

7. भीमाशंकर महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग।

8. त्र्यंम्बकेश्वर नासिक (महाराष्ट्र) से 25 किलोमीटर दूर त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग।

9. घृष्णेश्वर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गाँव में स्थापित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग।

10. केदारनाथ हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग। हरिद्वार से 150 पर मिल दूरी पर स्थित है।

11. काशी विश्वनाथ बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग।

12. रामेश्वरम्‌ त्रिचनापल्ली (मद्रास) समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग।

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

अचला सप्तमी को मनाई जाएगी सूर्य जयंती

अचला सप्तमी को मनाई जाएगी सूर्य जयंती

सरस्वती उपाध्याय 

सनातन धर्म के अनुसार हर एक दिन किसी ना किसी भगवान को समर्पित माना जाता है। हर एक देवी-देवता को जो भी दिन समर्पित हैं, उनको भक्त भी खास रूप से पूजा-अर्चना के साथ मनाते हैं। ऐसे में माघ का मास पूजा-पाठ के लिए काफी खास माना जाता है। हिंदू कैलेंडर के आधार पर माघ शुक्ल सप्तमी तिथि को अचला सप्तमी का व्रत रखा जाता है। अचला सप्तमी रथ सप्तमी या सूर्य जयंती भी कहते हैं। इस दिन सूर्य देव की पूजा करते हैं और उनको जल अर्पित करते हैं। कहते हैं कि इस दिन अगर भक्त पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ पूजा करते हैं तो सूर्यदेव की कृपा से रोग दूर होता है, धन-धान्य में वृद्धि होती है।

इस दिन पूजा करने से जीवन के हर प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। माना जाता है कि माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को सूर्य देव अपने सात घोड़े वाले रथ पर सवार होकर प्रकट हुए थे और पूरी सृष्टि को प्रकाशित किया था। जिस कारण से ही हर साल माघ मास ही शुक्ल सप्तमी को अचला सप्तमी, रथ सप्तमी या सूर्य जयंती के रूप में मनाया जाता है। तो आइए जानते हैं कि साल 2022 में अचला सप्तमी कब है और पूजा मुहूर्त क्या है ?

हिन्दू कैलेंडर के के अनुसार, माघ मास की शुक्ल सप्तमी की तिथि 07 फरवरी को प्रात: काल 04 बजकर 37 मिनट से शुरु हो रही है, जो कि 08 फरवरी को सुबह 06 बजकर 15 मिनट तक मान्य होगी। इसके साथ ही सूर्य देव का उदय 07 फरवरी को सप्तमी तिथि में ही हो रहा है, इस कारण से अचला सप्तमी को 07 फरवरी दिन सोमवार को मनाया जाएगा।

इसके साथ ही बता दें कि अचला सप्तमी के दिन सूर्य देव की पूजा का महत्व है। सूर्य पूजा का शुभ मुहूर्त प्रात: 05:22 बजे से लेकर प्रात: 07:06 बजे तक है। इस दिन प्रात: स्नान करके सूर्य देव को जल में लाल फूल, लाल चंदन, अक्षत्, चीनी आदि मिलाकर ओम सूर्य देवाय नमः मंत्र का उच्चारण करते हुए अर्पित करें।

अचला सप्तमी को सूर्यदेव को खुश करने के लिए भक्त खास रूप से व्रत रखते हैं। आपको बता दें कि इस दिन सूर्य देव को प्रसन्न करके आप प्रभु से उत्तम स्वास्थ्य एवं धन धान्य का आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना करें। सूर्य देव की कृपा से संतान की प्राप्ति भी होती है। माना जाता है कि इस दिन सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए आप आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। कहा जाता है कि खुद प्रभु श्रीराम ने सूर्य देव की पूजा के समय इसका अनन्त फल देने का पाठ किया था।


बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

माघ माह की गुप्त नवरात्रि, जानिए पूजा मंत्र

माघ माह की गुप्त नवरात्रि, जानिए पूजा मंत्र     

सरस्वती उपाध्याय            हिंदू पंचांग के अनुसार एक वर्ष में कुल मिलाकर चार बार नवरात्रि आती हैं। जिनमें से दो प्रत्यक्ष नवरात्रि होता है। जो कि चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्र हैं, जिनके बारे में सभी लोग जानते ही हैं। जबकि दो बार गुप्त नवरात्रि आती हैं। साल में दो बार आने वाले नवरात्रि में से एक माघ माह में आने वाली गुप्त नवरात्रि हैं। इस बार माघ माह की गुप्त नवरात्रि की शुरुआत 2 फरवरी से हो रही है। जिसका समापन 11 फरवरी होगा। प्रत्यक्ष नवरात्रि में मां के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है, जबकि वहीं गुप्त नवरात्र में 10 महाविद्या की साधना की जाती है। ऐसे में आज हम आपको गुप्त नवरात्रि की दस महाविद्याओं और उन देवियों के मंत्र के बारे में बताने जा रहे हैं।

दस महाविद्याओं के लिए पूजा मंत्र

1. देवी काली: मंत्र – ‘ॐ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहाः'।

2. तारा देवी: मंत्र- ‘ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट'।

3. त्रिपुर सुंदरी देवी: मंत्र – ‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः'।

4. देवी भुवनेश्वरी: मंत्र – ‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमः'।

5. देवी छिन्नमस्ता: मंत्र- ‘श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट स्वाहा:'।

6. त्रिपुर भैरवी देवी: मंत्र- ‘ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा:'।

7. धूमावती माता: मंत्र- ‘ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:'।

8. बगलामुखी माता: मंत्र – ‘ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:'।

9. मातंगी देवी: मंत्र- ‘ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:'।

10. देवी कमला: मंत्र- ‘ॐ हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:'।

शनिवार, 29 जनवरी 2022

धन-धान्य, सुख से परिपूर्ण करने वाली तिल द्वादशी

धन-धान्य, सुख से परिपूर्ण करने वाली तिल द्वादशी
सरस्वती उपाध्याय
तिल द्वादशी व्रत माघ माह की द्वादशी को किया जाता है। इस दिन तिल से भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। पवित्र नदियों में स्नान व दान करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। इस दिन प्रात: काल नित्यकर्म से निवृत होकर भगवान विष्णु जी का पूजन किया जाता है। प्रातः काल संकल्प के साथ षोड़शोपचार या पंचोपचार विधि से ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः का जाप करते हुए पूजन किया जाना चाहिए। तिल द्वादशी के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करके सूर्य देव को नमस्कार करना चाहिए। तांबे के पात्र में सुगंध, अक्षत, तिल, जल तथा फूलों को मिलाकर सूर्य मंत्र का उच्चारण करते हुए अर्घ्य देना चाहिए। इस व्रत को भगवान श्री कृष्ण स्वयं का स्वरूप कहा है, जो व्यक्ति को जन्मांतरों के बंधन से मुक्त कर देता है और वैकुंठ प्राप्ति का साधक बनता है। यह व्रत समर्पित है श्री विष्णु जी को और उनकी कृपा प्राप्त करने हेतु इसे किया जाता है। तिल द्वादशी व्रत सभी प्रकार का सुख वैभव देने वाला और कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाला है। मन के अंधकार को दूर करते हुए यह जीवन में प्रकाश का संचार करता है। इस व्रत में ब्राह्मण को तिलों का दान, पितृ तर्पण, हवन, यज्ञ, आदि का बहुत ही महत्व है।
तिल द्वादशी का महत्व –तिल द्वादशी का व्रत के दिन स्वच्छ आसन पर बैठकर भगवान मधुसुदन की पूजा करें, पूजा के दौरान भगवान को धूप व दीप दिखाकर तत्पश्चात फल, फूल, चावल, रौली, मौली, पंचामृत से स्नान आदि कराने के पश्चात भगवान को तिल से बनी वस्तुओं या तिल तथा गुड़ से बने प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा करते समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए, भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद मंत्र जाप 108 बार करना चाहिए। संध्या समय कथा सुनने के पश्चात भगवन की आरती उतारें। इस दिन जो व्यक्ति तिल द्वादशी का व्रत रखते हैं और जो व्यक्ति व्रत नहीं रखते हैं वह सभी अपनी क्षमता के अनुसार गरीब लोगों को दान अवश्य करें, तो शुभ फलों को पाते हैं। इस प्रकार विधिवत भगवान श्री विष्णु का पूजन करने से मानसिक शान्ति मिलने के साथ आपके घर-परिवार के सुख व समृद्धि में वृद्धि होती है।

तिल द्वादशी का व्रत, जिसमें पूजा, सदाचार, शुद्ध आचार-विचार पवित्रता आदि का विशेष महत्व है। यह व्रत धन, धान्य व सुख से परिपूर्ण करने वाला है रोगों को नष्ट कर आरोग्य को बढ़ाने वाला है, जिसे तिल द्वादशी के नाम से जाना जाता है। तिल द्वादशी को श्रद्धा व उल्लास के साथ किया जाता है। इसके व्रत से मानव जीवन के समस्त रोग आदि छूट जाते हैं और अंत मे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। द्वादशी का व्रत एकादशी की भाँति पवित्रता व शांत चित से श्रद्धा पूर्ण किया जाता है। यह व्रत मनोवांछित फलों को देने वाला और भक्तों के कार्य सिद्ध करने वाला होता है।

बुधवार, 19 मई 2021

सप्तमी को गंगा स्वर्ग से शिव की जटाओं में पहुँची

गंगा सप्तमी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को कहा जाता है। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वैशाख मास की इस तिथि को ही माँ गंगा स्वर्ग लोक से भगवान शिव की जटाओं में पहुँची थीं। इसलिए इस दिन को 'गंगा सप्तमी' के रूप में मनाया जाता है। कहीं-कहीं पर इस तिथि को 'गंगा जन्मोत्सव' के नाम से भी पुकारा जाता है। गंगा को हिन्दू मान्यताओं में बहुत ही सम्मानित स्थान दिया गया है। पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार जब कपिल मुनि के श्राप से सूर्यवंशी राजा सगर के 60 हज़ार पुत्र जल कर भस्म हो गए, तब उनके उद्धार के लिए राजा सगर के वंशज भगीरथ ने घोर तपस्या की। वे अपनी कठिन तपस्त्या से माँ गंगा को प्रसन्न करने में सफल रहे और उन्हें धरती पर लेकर आए। गंगा के स्पर्श से ही सगर के 60 हज़ार पुत्रों का उद्धार हो सका। गंगा को 'मोक्षदायिनी' भी कहा जाता है। विभिन्न अवसरों पर गंगा नदी के तट पर मेले और गंगा स्नान आदि के आयोजन होते हैं। इनमें 'कुंभ पर्व', 'गंगा दशहरा', 'पूर्णिमा', 'व्यास पूर्णिमा', 'कार्तिक पूर्णिमा', 'माघी पूर्णिमा', 'मकर संक्रांति' व 'गंगा सप्तमी' आदि प्रमुख हैं।

गुरुवार, 6 मई 2021

इस्राईल की बर्बरता के खिलाफ घरों में रहकर विरोध

माहे रमज़ान के आखरी जुमा पर यौमे क़ुद्स दिवस पर होगा बैतुल मुक़द्दस की आज़ादी और इस्राईली आतंकवाद का ऑनलाईन विरोध
बृजेश केसरवानी  
प्रयागराज। माहे रमज़ान के आखरी जुमा जुमम्तुल विदा को प्रत्येक वर्षों की भांति इस वर्ष भी विश्व क़ुद्स दिवस के मौक़े पर कोरोना संक्रमण को देखते हुए बाद नमाज़ ए जुमा अपने अपने घरों से इस्राईल की बर्बरता के खिलाफ और बैतुल मुक़द्दस की आज़ादी के लिए ओलमाओं ने घरों मे रहकर विरोध दर्ज कराने की अपील की है।मदरसा अनवारुल उलूम के प्रधानाचार्य व शिया धर्म गुरु मौलाना जवादुल हैदर रिज़वी ने 7 मई शुक्रवार को जुमत्तुल विदा के मौक़े पर अन्तराष्ट्रीय क़ुद्स दिवस पर मरजईयत की आवाज़ पर लब्बैक कहते हुए अपनी दीनी व समाजिक फरीज़े को कोरोना संक्रमण को दृष्टि मे रखते हुए अपने अपने घरों से विरोध स्वरुप बाँहों मे काली पट्टी बाँध कर विरोध दर्ज कराने की अपील की।कहा विरोध की फोटो और वीडियो को सोशल साईट पर अपलोड कर इस्राइली आतंकवाद का विरोध और बैतुल मुक़द्दस की आज़ादी को संयुक्त राष्ट्र कार्यालय तक पहोँचा कर ज़िन्दा और अमन पसन्द होने का सबूत पेश करें।उम्मुल बनीन सोसाईटी के महासचिव सै०मो०अस्करी,मस्जिद क़ाज़ी साहब के मुतावल्ली शाहरुक़ क़ाज़ी,मस्जिदे खदीजा करैली के हसन आमिर,शिया करबला कमेटी के नायब सद्र शाहिद अब्बास रिज़वी,अन्जुमन नक़विया रजिस्टर्ड के रौनक़ सफीपुरी,हसन नक़वी,मस्जिद गदा हुसैन के नायब मुतावल्ली शाहरुक़ हुसैनी आदि ने भी अहले इसलाम से मज़हबे इसलाम का पहला क़िबला बैतुल मुक़द्दस की आज़ादी व इस्राइली आतंकवाद का विरोध घरों मे रहकर विभिन्न तरीक़े से करने और  वैश्विक शक्तियों को इसका ऐहसास कराने को जुम्मतुल विदा के दिन अन्तराष्ट्रीय यौमे क़ुद्स पर शान्तिपूर्वक विरोध करने की अपील की।

यात्रा स्थगित, धामों में कपाट खोल पूजा-अर्चना होगी

कपाट खोलने की ब्यवस्थायें जुटायेगा दल

-कोरोना महामारी के कारण मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के दिशानिर्देश से फिलहाल यात्रा स्थगित धामों में कपाट खुलेंगे, पूजा अर्चना चलती रहेगी:सतपाल महाराज

-कोरोना महामारी को देखते हुए सांकेतिक रूप से खुलेंगे कपाट,यात्रियों को अनुमति नहीं : रविनाथ रमन

पंकज कपूर 

उखीमठ/ रूद्रप्रयाग/ देहरादून। श्री केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की ब्यवस्थाओं हेतु देवस्थानम् बोर्ड का 12 सदस्यीय दल आज प्रात: श्री ओंकारेश्वर मंदिर उखीमठ से प्रात: 8.30 बजे केदारनाथ हेतु रवाना हुआ। 
दल की अगवाई देवस्थानम बोर्ड के अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी बी. डी. सिंह कर रहे है।

पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने कहा है कि कोविड-19 को देखते हुए माननीय मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के दिशा निर्देश में फिलहाल चारधाम यात्रा पर रोक लगायी गयी है केवल कपाट खुलेंगे नियमित पूजाअर्चना चलती रहेगी। स्थितियां सामान्य होने पर चारधाम यात्रा को चरणबद्ध रूप से शुरू किया जायेगा।

देवस्थानम बोर्ड का अग्रिम दल केदारनाथ मन्दिर में पेयजल, विद्युत, बर्फ हटाने का कार्य को, साफ सफाई, सेनिटाईजेशन, रावल/पुजारी आवास निर्माण प्रगति के कार्यों का अवलोकन करेगा। गढ़वाल आयुक्त/उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रविनाथ रमन ने कहा है कि सरकार के निर्देश पर कोरोना महामारी को देखते हुए चारधाम यात्रा पूर्णत:स्थगित है केवल सांकेतिक रूप से धामों के कपाट खोले जाने हैं। कोरोना प्रोटोकाल का पालन करते हुए केवल रावल पुजारी एवं संबंधित हकहकूकधारियों के चुनिंदा प्रतिनिधि धामों में जायेंगे। देवस्थानम बोर्ड के कार्याधिकारी एनपी जमलोकी ने बताया कि अग्रिम दल में सहायक अभियंता गिरीश देवली, भंडार प्रभारी उमेश शुक्ला, अवर अभियंता विपिन कुमार सहित विद्युत कर्मी, पलंबर और सात स्वयंसेवक शामिल है।

इस अवसर पर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी राजकुमार नौटियाल, प्रबंधक अरविंद शुक्ला, पुष्कर रावत, प्रेमसिंह रावत, पुजारी शिवशंकर लिंग, विदेश शैव भी मौजूद रहे। देवस्थानम बोर्ड के मीडिया प्रभारी डा. हरीश गौड़ ने बताया कि ग्यारहवें ज्योर्तिलिंग भगवान केदारनाथ के कपाट इस यात्रा वर्ष 17 मई प्रात: पांच बजे खुल रहे है जबकि यमुनोत्री धाम के 14 मई, गंगोत्री के 15 मई तथा श्री बदरीनाथ धाम के कपाट 18 मई को खुल रहे है किसी भी धाम में फिलहाल यात्रियों को जाने की अनुमति नहीं है।

गुरुवार, 11 मार्च 2021

कानपुर: 'महाशिवरात्रि' के पर्व पर लगीं भक्तो की भीड़

कानपुर। महानगर में शिवरात्रि के महा पर्व पर देर रात से ही शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई देने लगी। इस दौरान लाखो की संख्या में पहुचे भक्तों ने बाबा पर बेल पत्थर, दूध, दही, शहद, फूल, रोली, चन्दन से अभिषेक किया गया। शहर के सिद्धनाथ धाम मन्दिर में रात्रि दो बजे मंगला आरती के बाद से भक्तों के लिए बाबा के पट खोल दिये गए। जहा श्रद्धालुओ ने अपने आराध्य की स्तुति करते हुए दिखाई दिए। इस दौरान बाबा का श्रृंगार भी किया गया। जो अपनी अलौकिक छटा बिखेर रही थी। 

44 घंटे दर्शन के लिए खुला बाबा महाकाल का दरबार

अकांशु उपाध्याय  
नई दिल्ली। 12 ज्योतिर्लिंगों में विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकाल के दरबार में आज गुरुवार को शिव पार्वती विवाह महोत्सव महाशिवरात्रि मनाया जा रहा है। 44 घंटे अनवरत दर्शन के लिए बाबा का दरबार खुला रहेगा। देश भर से श्रद्धालुओं ने बाबा के दर्शन पानी के लिए बुकिंग पहले ही करा ली थी। तड़के भस्म आरती के बाद श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश खोल दिया गया था। जो शुक्रवार रात 11 बजे तक जारी रहेगा।
धार्मिक नगरी में आज शिवमय बनी हुई है। महाशिवरात्रि पर्व पर बाबा महाकाल के दरबार में गर्भगृह रात 2.30 बजे खोला गया था। विधि विधान के साथ पूजा अर्चना कर बाबा को निराकार स्वरूप में लाया गया और भस्म रमाकर महानिर्वाणी अखाड़े के गादीपति महामंडलेश्वर विनीत गिरी महाराज द्वारा भस्मारती की गई। महापर्व होने पर भस्मा आरती के बाद श्रद्धालुओं के लिए अनवरत 44 घंटे दर्शन प्रवेश खोल दिया गया। आज दिन भर श्रद्धालु बाबा के दर्शन कर सकेंगे। कोरोना संक्रमण काल के चलते प्रशासन ऑनलाइन अनुमति प्राप्त करने वाले श्रद्धालुओं को ही बाबा के दरबार में प्रवेश दे रहा है। श्रद्धालुओं ने 8 दिन पूर्व ही अनुमति प्राप्त करना शुरू कर दी थी। करीब 31 हजार आम श्रद्धालुओं को ऑन लाइन अनुमति मिली है। जिन्हें मंदिर में प्रवेश दिया जाएगा। वीआईपी दर्शन व्यवस्था का शुल्क 250 रुपए रखा गया है। वीआईपी श्रद्धालुओं को भी बाबा के दर्शन की अनुमति जारी है। वहीं जो श्रद्धालु बिना अनुमति मंदिर तक पहुंचे हैं। उन्हें भी व्यवस्था अनुरूप दर्शन कराए जा रहे हैं। महाशिवरात्रि पर्व को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन ने बुधवार शाम के ही सुरक्षा की कमान संभाल ली थी। श्रद्धालुओं को आसानी से दर्शन हो सके इसके पूरे इंतजाम किए गए हैं। श्रद्धालुओं को चार धाम मंदिर मार्ग से कतार लगाकर मंदिर में प्रवेश कराया जा रहा है। 45 से 50 मिनट में श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन हो रहे हैं। बिना परेशानी के श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन आसानी से हो रहे हैं। और पूरा दरबार बाबा के जयकारों से गुंजायमान हो रहा है। दर्शन के लिए अग्रिम बुकिंग के आधार पर प्रवेश दिया जा रहा है। इसके अलावा 250 रुपये के शीघ्र दर्शन पास के लिए पार्किंग स्थलों पर काउंटर स्थापित किए गए हैं। दर्शनार्थियों को मास्क, पानी की बोतल नि:शुल्क दिया जा रहा है। कलेक्टर आशीष सिंह ने कहा है। कि कोरोना नियमों का पालन कराते हुए अधिक से अधिक श्रद्धालुओं को दर्शन कराए जाएंगे।

कोई भी पर्व क्यों मनाया जाता है, जानिए महत्व

महाशिवरात्रि। कोई भी पर्व क्यों मनाया जाता है और उसका महत्व क्या है आपको ये ज़रूर जानना चाहिए

महाशिवरात्रि हो या कोई अन्य धार्मिक पर्व हो। आप मनाते हों या न मनाते हों। लेकिन कोई भी पर्व क्यों मनाया जाता है और उसका महत्व क्या है ? आपको ये ज़रूर जानना चाहिए। महाशिवरात्रि भगवान् शिव का दिन है और इसकी अपनी एक अलग महत्वता है। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में क्या फर्क है। और ये क्यों इतना शुभ है। आइये इसको समझते हैं।
पंचांग के अनुसार हर माह के चौदहवें दिन या फिर अमावस्या से एक दिन पहले वाली रात शिवरात्रि कहलाती है। पंचांग का आखिरी महीना फाल्गुन का होता है। और इस माह कि शिवरात्रि महाशिवरात्रि कहलाई जाती है। जोकि फरवरी या मार्च के महीने में पड़ा करती है। महाशिवरात्रि का अपना अलग महत्व है। और सनातन धर्म के तमाम बड़े पर्वों में से महाशिवरात्रि का पर्व एक है। यह पर्व अपने नाम के ज़रिए ही पहचाना जा सकता है। महाशिवरात्रि यानी कि शिव की महान रात। इसीलिए महाशिवरात्रि की रात में जागरण व अन्य तरह के धार्मिक कर्म किए जाते हैं। इस रात को बेहद खास रात माना जाता है। इस दिन के जितने धार्मिक महत्व बताए जाते हैं उतने ही महत्व इसके विज्ञान से जोड़े जाते हैं। इस रात को इंसान को भगवान से करीब करने की रात कहा जाता है। महाशिवरात्रि की रात से ही ग्रीष्म ऋतु की नींव पड़ जाती है। कहा जाता है। कि इंसान गर्मी के प्रभाव या फिर सूर्य के जलते प्रकाश से बचने के लिए अपने आपको इस रात भगवान शिव को समर्पित कर देतै है।
महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव का पर्व होता है। इस पर्व में भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाती है। इस रात मनुष्य अपने तमाम तरह की परेशानियों से निजात भी पा सकता है। क्योंकि भगवान शिव के पास हर समस्या का समाधान होता है। इसीलिए इस पर्व के दिन व्रत रखने की परंपरा है। व्रत शुद्धीकरण के लिए ही जाना जाता है. व्रत रखने से जहां हमारे पेट और आंत की सफाई हो जाती है। और रक्त शुद्ध हो जाता है वहीं कई तरह के रोगों से भी व्रत के सहारे मुक्ति मिल जाया करती है। और व्रत रख कर भगवान शिव की पूजा करने से भगवान से एक अलग तरह का जुड़ाव हो जाया करता है। 
महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है। और इस पर्व को किस तरह से खास पर्व कहा जाता है। यह भी हर किसी को ज़रूर जानना चाहिए। महाशिवरात्रि से पहले शिवरात्रि क्यों मनाई जाती है। इसको समझ लीजिए। ज्योतिषों का मानना है। कि हर माह की अमावस्या की रात को चंद्रमा सिकुड़ जाता है। या खिसक जाता है। ऐसे में इसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए हर माह भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाती है। क्योंकि भगवान शिव ही हैं। जो चंद्रमा के किसी भी नुकसान से मनुष्य प्रजाति को बचाने का कार्य कर सकते हैं। अब महाशिवरात्रि की बात करते हैं। हिंदू नव वर्ष शुरू होने से पहले ही साल के आखिरी महीने में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इसको इसलिए मनाया जाता है ताकि आने वाले पूरे नये साल को ही किसी भी तरह के दुष्प्रभाव से बचाया जा सके। हालांकि महाशिवरात्रि मनाए जाने और भी कई वजहें है। कुछ प्रसिद्ध मान्यताओं की बात की जाए तो उसमें ये मान्यताएं प्रसिद्ध हैं।
1. महाशिवरात्रि की रात ही भगवान् शिव ने देवी पार्वती से विवाह किया था। इसलिए हिंदू धर्म में रात को ही विवाह के लिए शुभ माना जाता है।
2. कहते हैं। कि जब देवता और राक्षस अमृत की खोज में समुद्र मंथन कर रहे थे। तब मंथन से विष निकला था। जिसे भगवान शिव ने पी लिया था। इस विष को पी लेने के कारण उनका पूरा शरीर नीला पड़ गया था। जिसकी वजह से ही भगवान शिव को नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है। इस विष को पीकर भगवान शिव ने देवताओं के साथ-साथ संसार को भी नुकसान होने से बचाया था। इसीलिए इस दिन को भगवान शिव का दिन कहा जाता है। और उनकी अराधना की जाती है। 
3. मान्यता ये भी है। कि पवित्र नदी देवी गंगा इस दिन पृथ्वी पर उतर रही थी। और पूरे पृथ्वी पर फैल रही थी। जिसे भगवान शिव ने अपनी जटाओं में धर लिया था। और पृथ्वी का विनाश होने से बचा लिया था। इसलिए भगवान् शिव को पूजा जाता है।
4. ऐसी भी मान्यता है। कि भगवान शिव ने इसी रात को सदाशिव से लिंग स्वरूप लिया था। इसलिए इसी रात भगवान् शिव को की अराधना की जाती है।
ये कुछ मान्यताएं महाशिवरात्रि के बारे में प्रसिद्ध हैं। जिनका वर्णन अलग अलग जगहों पर मिल जाता है। कहा जाता है। कि महाशिवरात्रि की रात बेहद पवित्र होती है। इस रात को कभी सोकर नहीं गवांना चाहिए। इस दिन मनोकामनाएं जल्दी पूरी होती है।
महाशिवरात्रि के दिन पवित्र नदी में स्नान करने की भी अपनी एक अलग विशेषता है। महाशिवरात्रि के दिन ही प्रयाग कुंभ का समापन होता है। जबकि हरिद्धार कुंभ का आरंभ महाशिवरात्रि के दिन से होता है। इस वर्ष यानी की साल 2021 में हरिद्धार में कुंभ मेले का आज से आगाज़ हो रहा है। जोकि प्रत्येक 12 वर्षों के अंतराल पर आयोजित किया जाता है। इस बार ग्रहों के योग से 11 वर्ष बाद ही हरिद्धार में कुंभ मेला आज से शुरू हो चुका है।
महाशिवरात्रि के इस पर्व पर आप सभी की मनोकामनाएं पूरी हो इसके लिए आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

बुधवार, 10 मार्च 2021

"महामृत्युंजय" मंत्र 'संपादकीय'

ओम त्रयंबकम यजामहे, सुगंधिम पुष्टिवर्धनम।उर्वारुकमिव बंधनात, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। नम्ः शिवाय्

'महाशिवरात्रि
' भगवान शिव के विवाह की कथा के अनुसार, (शिव महापुराण आदि ग्रंथ) यह पारंपरिक त्योहार मनाने की परंपरा है। भारत के साथ नेपाल, आदि दुनिया के कई अन्य देशों में भी 'महाशिवरात्रि' का पर्व बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। सनातन उत्पत्ति का आधार और अंत भगवान शिवशंकर को ही माना जाता है। इस दिन आस्था पूर्वक व्रत और वृतांत का तुरंत प्रभाव देखने को मिलता है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को 'महाशिवरात्रि' का व्रत किया जाता है। हिन्दू पुराणों के अनुसार, इसी दिन सृष्टि के आरंभ में मध्यरात्रि मे भगवान शिव ब्रह्मा से रुद्र के रूप में प्रकट हुए थे। इसीलिए इस दिन को महाशिवरात्रि कहा जाता है। 'महाशिवरात्रि के प्रसंग को हमारे वेद, पुराणों में बताया गया है, कि जब समुद्र मन्थन हो रहा था उस समय समुद्र में चैदह रत्न प्राप्त हुए। उन रत्नों में हलाहल भी था। जिसकी गर्मी से सभी देव दानव त्रस्त होने लगे तब भगवान शिव ने उसका पान किया। उन्होंने लोक कल्याण की भावना से अपने को उत्सर्ग कर दिया। इसलिए उनको महादेव कहा जाता है। जब हलाहल को उन्होंने अपने कंठ के पास रख लिया तो उसकी गर्मी से कंठ नीला हो गया। तभी से भगवान शिव को नीलकंठ भी कहते हैं। शिव का अर्थ कल्याण होता है। जब संसार में पापियों की संख्या बढ़ जाती है, तो शिव उनका संहार कर लोगों की रक्षा करते हैं। इसीलिए उन्हें शिव कहा जाता है। योगिक परम्परा में इस दिन और रात को इतना महत्व इसलिए दिया जाता है। क्योंकि यह आध्यात्मिक साधक के लिए जबर्दस्त संभावनाएं प्रस्तुत करते हैं। आधुनिक विज्ञान कई चरणों से गुजरने के बाद आज उस बिंदु पर पहुंच गया है। जहां वह प्रमाणित करता है, कि हर वह चीज जिसे आप जीवन के रूप में जानते हैं। पदार्थ और अस्तित्व के रूप में जानते हैं। जिसे आप ब्रह्मांड और आकाशगंगाओं के रूप में जानते हैं। वह सिर्फ एक ही ऊर्जा है। जो लाखों रूपों में खुद को अभिव्यक्त करती है। माना जाता है, कि इस दिन शंकर और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इस दिन लोग व्रत रखते हैं और भगवान शिव की पूजा करते है। 'महाशिवरात्रि' का व्रत रखना सबसे आसान माना जाता है। इसलिये बच्चों से लेकर बूढ़ो तक सभी इस दिन व्रत रखते हैं। 'महाशिवरात्रि' के व्रत रखने वालों के लिये अन्न खाना मना होता है। इसलिये उस दिन फलाहार किया जाता है। राजस्थान में व्रत के समय गाजर, बेर का सीजन होने से गांवों में लोगों द्धारा गाजर, बेर का फलाहार किया जाता है। लोग मन्दिरों में भगवान शिव की पूजा करते हैं व उन्हे आक, धतूरा चढ़ाते हैं। भगवान शिव को विशेष रूप से भांग का प्रसाद लगता है। इस कारण इस दिन काफी जगह शिवभक्त भांग घोट कर पीते हैं। पुराणों में कहा जाता है कि एक समय शिव पार्वती जी कैलाश पर्वत पर बैठे थी। उसी समय पार्वती ने प्रश्न किया, कि इस तरह का कोई व्रत है। जिसके करने से मनुष्य आपके धाम को प्राप्त कर सके ? तब उन्होंने यह कथा सुनाई थी, कि प्रत्यना नामक देश में एक व्यक्ति रहता था। जो जीवों को बेचकर अपना भरण पोषण करता था। उसने सेठ से धन उधार ले रखा था। समय पर कर्ज न चुकाने के कारण सेठ ने उसको शिवमठ में बन्द कर दिया। सयोग से उस दिन फाल्गुन बदी त्रयोदशी थी। वहां रातभर कथा, पूजा होती रही, जिसे उसने भी सुना। अगले दिन शिघ्र कर्ज चुकाने की शर्त पर उसे छोड़ा गया। उसने सोचा रात को नदी के किनारे बैठना चाहिये। वहां जरूर कोई न कोई जानवर पानी पीने आयेगा। अतः उसने पास के बील वृक्ष पर बैठने का स्थान बना लिया। उस बील के नीचे शिवलिंग था। जब वह अपने छिपने का स्थान बना रहा था। उस समय बील के पत्तों को तोडकर फेंकता जाता था, जो शिवलिंग पर ही गिरते थे। वह दो दिन का भूखा था। इस तरह से वह अनजाने में ही शिवरात्रि का व्रत कर ही चुका था। साथ ही शिवलिंग पर बेल-पत्र भी अपने आप चढ़ते गये। एक पहर रात्रि बीतने पर एक गर्भवती हिरणी पानी पीने आई। उस व्याध ने तीर को धनुष पर चढ़ाया, किन्तु हिरणी की कातर वाणी सुनकर उसे इस शर्त पर जाने दिया कि सुबह होने पर वह स्वयं आयेगी। दूसरे पहर में दूसरी हिरणी आई। उसे भी छोड़ दिया। तीसरे पहर भी एक हिरणी आई उसे भी उसने छोड़ दिया और सभी ने यही कहा कि सुबह होने पर मैं आपके पास आऊंगी। चैथे पहर एक हिरण आया। उसने अपनी सारी कथा कह सुनाई, कि वे तीनों हिरणियां मेरी स्त्री थी। वे सभी मुझसे मिलने को छटपटा रही थी। इस पर उसको भी छोड़ दिया और कुछ और भी बेल-पत्र नीचे गिराये। इससे उसका हृदय बिल्कुल पवित्र, निर्मल तथा कोमल हो गया। प्रातः होने पर वह बेल-पत्र से नीचे उतरा। नीचे उतरने से और भी बेल पत्र शिवलिंग पर चढ़ गये। अतः शिवजी ने प्रसन्न होकर उसके हृदय को इतना कोमल बना दिया, कि अपने पुराने पापों को याद करके वह पछताने लगा और जानवरों का वध करने से उसे घृणा हो गई। सुबह वे सभी हिरणियां और हिरण आये। उनके सत्य वचन पालन करने को देखकर उसका हृदय दुग्ध सा धवल हो गया और वह फूट-फूट कर रोने लगा। 'महाशिवरात्रि' आध्यात्मिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण है। इस रात धरती के उत्तरी गोलार्ध की स्थिति ऐसी होती है, कि इंसान के शरीर में ऊर्जा कुदरती रूप से ऊपर की ओर बढ़ती है। इस दिन प्रकृति इंसान को अपने आध्यात्मिक चरम पर पहुंचने के लिए प्रेरित करती है। गृहस्थ जीवन में रहने वाले लोग महाशिवरात्रि को शिव की विवाह वर्षगांठ के रूप में मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाएं रखने वाले लोग इस दिन को शिव की दुश्मनों पर विजय के रूप में देखते हैं। योगियों और संन्यासियों के लिए यह वह दिन है। जब शिव कैलाश पर्वत के साथ एकाकार हो गए थे। योगिक परम्परा में शिव को ईश्वर के रूप में नहीं पूजा जाता है। बल्कि उन्हें प्रथम गुरु, आदि गुरु माना जाता है। जो योग विज्ञान के जन्मदाता थे। कई सदियों तक ध्यान करने के बाद शिव एक दिन वह पूरी तरह स्थिर हो गए। उनके भीतर की सारी हलचल रुक गई और वह पूरी तरह स्थिर हो गए। वह दिन 'महाशिवरात्रि' था। इसलिए संन्यासी 'महाशिवरात्रि' को स्थिरता की रात के रूप में देखते हैं।

चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

सोमवार, 1 मार्च 2021

इस महीने कौन-कौन से त्योहार आएंगे, जानिए

फाल्गुन का महीना शुरू हो गया है। जी हाँ, रविवार से यानी 1 मार्च से फाल्गुन का महीना शुरू हो गया। इसे हिन्दू पंचांग का अंतिम महीना कहा जाता है। आप सभी जानते ही होंगे कि इस महीने की पूर्णिमा को फाल्गुनी नक्षत्र होने के कारण इसे फाल्गुन कहा जाता हैं। इस महीने को ही आनंद और उल्लास का महीना भी कहते है। दरअसल इस महीने बसंत का प्रभाव बढ़ जाता है और इसी के वजह से प्रेम और रिश्तों में मिठास आने लगती है। आप सभी को बता दें कि इस बार फाल्गुन मास 28 फरवरी से 28 मार्च तक रहेगा। इस बीच महाशिवरात्रि, होली, जानकी जयंती , प्रदोष व्रत , फाल्गुन अमावस्या, शनि अमावस्या, खरमास प्रारंभ, होली भाई दोज, होलिका दहन, फाल्गुन पूर्णिमा व्रत जैसे पर्व आने वाले हैं। अब आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस महीने कौन-कौन से त्योहार पड़ने वाले हैं।

1 मार्च- महाशिवरात्रि और दूसरा होली।
2 मार्च : संकष्टी चतुर्थी।।
6 मार्च- जानकी जयंती (सीताष्टमी)।
9 मार्च-  विजया एकादशी।
10 मार्च- प्रदोष व्रत (कृष्ण)।

11 मार्च- महाशिवरात्रि, मासिक शिवरात्रि, हरिद्वार कुंभ प्रथम शाही स्नान।
13 मार्च- फाल्गुन अमावस्या, शनि अमावस्या।
14 मार्च- मीन संक्रांति, पंचक, चंद्रदर्शन।
15 मार्च- खरमास प्रारंभ,।।
17 मार्च- विनायकी चतुर्थी।

20 मार्च- रोहिणी व्रत।
21 मार्च- होलाष्टक प्रारंभ।
25 मार्च- आमलकी एकादशी।
26 मार्च- प्रदोष व्रत (शुक्ल)।
28 मार्च- होलाष्टक स। होलिका दहन, फाल्गुन पूर्णिमा व्रत।

29 मार्च- होली, धुलेंडी, वसंतोत्सव, आम्रकुसुम प्राशन पोडषकारण व्रत प्रारंभ।
30 मार्च- चित्रगुप्त पूजा, होली भाई दोज।
31 मार्च- संकष्टी चतुर्थी।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

श्रीराम मंदिर निर्माण, रिद्धि-सिद्धि ने 5 लाख दिए

विधायक संजय गुप्ता की बेटियां रिद्धि-सिद्धि ने 5 लाख रुपए मंदिर निर्माण हेतु किया दान

कौशाम्बी। अयोध्या में बन रहें प्रभु श्रीराम के मंदिर के लिए धन संग्रह का कार्य से प्रारंभ हुआ। इस संबंध में एक महत्वपूर्ण बैठक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक आदरणीय रमेश एवं भाजपा के प्रदेश सह संगठन मंत्री भवानी सिंह ने विधायक चायल संजय कुमार गुप्ता के आवास से शुरुआत किया। प्रभु श्रीराम की भव्य मंदिर के निर्माण में सर्वप्रथम चायल विधायक संजय कुमार गुप्ता की बेटियां रिद्धि और सिद्धि ने 5 लाख रुपए की धनराशि मंदिर निर्माण हेतु दान किया। विधायक चायल संजय गुप्ता ने कहा 500 वर्ष के संघर्ष के बाद प्रभु श्री राम के मंदिर का निर्माण हो रहा है। यह हम सब का सौभाग्य है, हमें भी मंदिर निर्माण रूपी अनुष्ठान में आहुति करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। मेरी देवी स्वरूपा बेटी रिद्धि और सिद्धि के पवित्र हाथों से उनके नाम का यह दान प्रदान किया जा रहा है। अभी इसके अलावा भी मैं अपने नाम से और अपने विधानसभा रूपी परिवार से भी दान संग्रह करके इस मंदिर के निर्माण में अपने विधानसभा का योगदान प्रस्तुत करूंगा। इस अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री एवं कौशांबी सांसद विनोद सोनकर फूलपुर की सांसद केसरी देवी पटेल, विधायक विक्रमाजीत मौर्य, हर्षवर्धन बाजपेई, प्रवीण पटेल, डॉ. अजय भारती, लाल बहादुर शीतला प्रसाद, श्रीमती नीलम करवरिया वा पूर्व विधायक दीपक पटेल मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन जिलाध्यक्ष श्रीमती अनीता त्रिपाठी और जिला अध्यक्ष गणेश केसरवानी ने किया।
गणेश साहू 

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

मकर सक्रांति के साथ माघ मेले का आगाज

मकर संक्रांति के साथ माघ मेले का आगाज, श्रद्धालु लगा रहे पुण्य की डुबकी
बृजेश केसरवानी  
प्रयागराज। मकर संक्रांति से शुरू होकर महाशिवरात्रि तक चलने वाला आस्था का मेला ‘माघ मेला’ कोरोना महामारी के बीच गुरुवार से संगम की रेती पर शुरू हो गया। संक्रमण और ठंड व कोहरे पर आस्था भारी पड़ रही है। इस दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ पुण्य डुबकी लगाती नजर आ रही है। माघ मेला के पहले स्नान पर्व यानी मकर संक्रांति पर संगम सहित गंगा तथा यमुना के सभी स्नान घाटों पर ब्रह्म मुहूर्त से ही श्रद्धालुओं के स्नान का सिलसिला शुरू हो गया।
सुबह के समय संगम व आसपास के घाटों पर श्रद्धालु कम नजर आए। लेकिन सुबह सात बजे के बाद से श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।
संगम के अलावा गंगा के अक्षयवट, काली घाट, दारागंज, फाफामऊ घाट पर भी स्नान चल रहा है।
माघ मेले के दौरान छह प्रमुख स्नान होंगे। इसकी शुरूआत मकर संक्रांति से होती है।
श्रद्धालु कोरोना संक्रमण से बेफिक्र नजर आ रहे हैं। आधी-अधूरी तैयारी के बीच पहले स्नान पर्व पर श्रद्धालुओं का उत्साह देखने लायक है। मेला क्षेत्र में साधु संतों के पंडाल में भजन पूजन का दौर भी शुरू हो गया है। वैसे माघ मेला 27 जनवरी के आसपास रंग में आएगा। 28 जनवरी को पौष पूर्णिमा है। और इस दिन से एक महीने का कल्पवास शुरू हो जाता है।
प्रशासन का अनुमान है कि इस बार साढ़े तीन करोड़ श्रद्धालु प्रयागराज आएंगे। मेला क्षेत्र में कोरोना की गाइडलाइन को पूरा कराने के लिए सभी तैयारियां की हुई हैं। सभी तीर्थ पुरोहितों से आने वाले कल्पवासियों का ब्योरा लेकर इसे वेबसाइट पर अपलोड किया गया है। माघ मेला में कोविड-19 गाइडलाइन के चलते इनकी संख्या पिछले स्नान पर्व से कम है। पर, आस्था में कहीं कोई कमी नहीं दिखी। उधर, इसी तरह कानपुर, वाराणसी, फरुर्खाबाद और गढ़मुक्तेश्वर में भी श्रद्धालु सुबह से ही पुण्य की डुबकी लगाने स्नान घाटों पर पहुंचने लगे।
हर-हर गंगे, जय मां गंगे के जय घोष के साथ मकर संक्रांति पर्व का पुण्य प्राप्त करने को गंगा में डुबकी लगा रहे हैं। इस दौरान कई स्नान घाटों पर स्नान के मद्देनजर कोविड-19 प्रोटोकाल का पालन होता नजर नहीं आ रहा है। मेले में हर साल की तरह इस बार 5 पांटून ब्रिज, 70 किमी चेकर्ड प्लेटें बिछाई गई है। कोरोना को देखते हुए 16 पॉइंट्स बनाये गए है। हर जगह पर्याप्त मात्रा में पुलिस बल तैनात है। मेले में बिजली, पानी और स्वच्छता के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। मेलाधिकारी विवेक चतुवेर्दी के अनुसार, मेले में हर तरह से तैयारी पूरी है। सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक इंतजाम हैं। कोविड संक्रमण को देखते हुए तैयारी और बेहतर की गई है। सभी को गाइडलाइन जारी की गई है।
उधर 14 जनवरी के बाद मलमास के कारण रूके हुए मांगलिक कार्य शुरू होते हैं। इस बार गुरु शुक्र अस्त के चलते विवाह आदि मांगलिक कार्य अप्रैल से होंगे। सूर्य सुबह 8.30 बजे उत्तरायण हुआ और मकर राशि में प्रवेश कर गया।

बुधवार, 13 जनवरी 2021

संपूर्ण देश में सूर्य पूजा का पर्व 'मकर सक्रांति'

मकर संक्रांति का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व !!
‘रसो वै सः’- भारतीय तत्ववेत्ताओं ने जीवन को इसी रूप में परिभाषित किया है। रस यानि आनन्द-उल्लास, उमंग-उछाह। ये अवसर जीवन में बार-बार आएं, अनवरत आएं और सदा-सदा के लिए बने रहें, इसीलिए देवसंस्कृति में पर्वों का सृजन किया गया। निर्मल आनन्द के पर्याय ये सभी पर्व लोक-जीवन को देव-जीवन की ओर उन्मुख करते हैं। परन्तु इनमें भी मकर-संक्रान्ति के साथ ये अनुभूतियां कुछ अधिक ही गहराई के साथ जुड़ी हैं। यह जन-आस्था तथा लोकरुचि का पर्व है। इसे समूची सृष्टि में जीवन अनुप्राणित करने वाले भगवान सूर्य की उपासना का पर्व भी कहते हैं। इस अवसर पर उमड़ने वाले सात्विक भव देश की सांस्कृतिक चेतना को पुष्ट करते हैं। तभी तो लोकसंस्कृति पर्व-मकर संक्रान्ति सम्पूर्ण भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

मकर संक्रांति लगभग प्रतिवर्ष 14 जनवरी को ही पड़ती है। सूर्य के उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ते जाने की अवधि को दक्षिणायन तथा दक्षिण से उत्तर की ओर के यात्राकाल को उत्तरायण कहते हैं।
 वृत के 360 अंशों के समान ही पृथ्वी की परिक्रमापथ 360 अंशों में विभाजित है। इसके अण्डाकार परिक्रमापथ को 30-30 अंशों के समूहों में 12 राशियों में विभक्त किया गया है। पृथ्वी की परिक्रमा करते समय सूर्य जिस राशि में दिखाई देता है, वही सूर्य की राशि कही जाती है। संक्रांति बारह राशियों में सूर्य का संक्रमण है-रवेः संक्रमण राषौ संक्रान्तिरिति कथ्यते। मकर संक्रान्ति नवम् धनु राशि से दशम मकर राशि में संक्रमण है।

चन्द्रमास साढ़े उन्तीस दिन का एवं चन्द्रवर्ष 354 दिन का होता है, परन्तु सौर-दिन 30 दिन का एवं सौर वर्ष 365 दिन 6 घण्टे का होता है, चन्द्रवर्ष निश्चित नहीं होता है, उसमें परिवर्तन आता रहता है। इसी परिवर्तन के कारण चार वर्षों में फरवरी उन्तीस दिन की होती है। सूर्य का संक्रमण एक निश्चित अवधि एवं समय में सम्पन्न होता है। इसी कारण मकर-संक्रान्ति प्रायः हर वर्ष 14 जनवरी को ही आती है।

संक्रमण पर्व मकर संक्रान्ति का मकर शब्द का भी विशेष महत्व माना जाता है। इस महत्व को अलग-अलग भाषियों ने अपने-अपने ढंग से प्रतिपादित किया है। हरीति ऋषि के अनुसार, मकर मत्स्य वर्ग के जल-जन्तुओं में सर्वश्रेष्ठ है- मत्स्यानां मकरः श्रेष्ठो। इसीलिए यह गंगा का वाहन है। प्रायः सभी शास्त्रकारों ने गंगा को मकरवाहिनी माना है।

कामदेव की पताका का प्रतीक मकर है। अतएव कामदेव को मकरध्वज भी कहा जाता है। बिहारी सतसई में महाकवि बिहारी ने भगवान श्रीकृष्ण के कुण्डलों का आकार मकरकृत बताया है। मकराकृत गोपाल के कुण्डल सोहत कान। ध्स्यो मनो हिय धर समर ड्येढी लसत निसान॥

ज्योतिष गणना की बारह राशियों में से दसवीं राशि का नाम मकर है। पृथ्वी की एक अक्षांश रेखा को मकर रेखा कहते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार, सुमेरु पर्वत में उत्तर में दो पर्वत में से एक का नाम मकर पर्वत है। तमिल वर्ष में ‘तई’ नामक महिला का उल्लेख है, जो सूर्य के मकर रेखा में आने के कारण उसका नामकरण हुआ !!

पुराणों में मकर संक्रान्ति का काफी विस्तार से वर्णन मिलता है। पुराणकारों ने सूर्य के दक्षिण से ऊर्ध्वमुखी होकर उत्तरस्थ होने की वेला को संक्रान्ति पर्व एवं संस्कृति पर्व के रूप में स्वीकार किया है। पौराणिक विवरण के अनुसार, उत्तरायण देवताओं का एक दिन एवं दक्षिणायन एक रात्रि मानी जाती है।

यह वैज्ञानिक सत्य है कि उत्तरायण में सूर्य का ताप शीत के प्रकोप को कम करता है। शास्त्रकारों ने भी मकर संक्रान्ति को सूर्य उपासना का विशिष्ट पर्व माना है। इस अवसर पर भगवान सूर्य की गायत्री महामंत्र के साथ पूजा-उपासना, यज्ञ-हवन का अलौकिक महत्व है। मकर संक्रान्ति पर्व के देवता सूर्य को देवों में विश्व की आत्मा कहकर अलंकृत किया गया है। आयुर्वेद के मर्मज्ञों का मानना है, शीतकालीन ठण्डी हवा शरीर में अनेक व्याधियों को उत्पन्न करती है।

इसीलिए तिल-गुड़ आदि वस्तुओं का इस अवसर पर प्रयोग करने का विशेष विधान है। चरक संहिता स्पष्ट करती है:- ’शीते शीतानिलर्स्पषसंरुद्धो बलिनां बली। रसं हिन्स्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रयुप्यति।’ इस प्रकोप के निवारण के लिए आयुर्विज्ञान विशेष घी-तेल, तिल-गुड़, गन्ना, धूप और गर्म पानी सेवन की सलाह देते हैं।

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

श्रीराम के जयघोष के साथ निकली कीर्तन मंडली

अश्वनी उपाध्याय  
गाजियाबाद। वैशाली सेक्टर पांच में भगवान श्री राम के अयोध्या मंदिर के निर्माण के उपलक्ष में वैशाली सेक्टर 5 में संकीर्तन पदयात्रा निकली गई। सिद्धि प्रधान अग्रवाल ने बताया कि वैशाली सेक्टर पांच में बड़ी संख्या राम भक्त सड़कों पर भगवान श्री राम के जयगोष के साथ पदयात्रा कर भगवान श्री राम नाम का कीर्तन करते हुए पूरे सेक्टर से गुजरी। स्थानीय लोगों ने उत्साह के साथ संकीर्तन पदयात्रा का स्वागत किए। श्री राम संकीर्तन पदयात्रा में बड़ी संख्या में सेक्टर के राम भक्तों ने भगवान का गुणगान किया।संकीर्तन पदयात्रा के दौरान धर्मेंद्र गुप्ता ,आशा सक्सेना, एमसी मोदी, एसडी आर्य, कर्मवीर अत्री, योगेंद्र शर्मा, नंदिनी शर्मा जी, अरुण सक्सेना, आशीष गुप्ता, महेश, सरोज वर्मा, केके खरे, राजपाल, कुलदीप सिंह रघुवंश शर्मा बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित रहे।

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

श्री जगन्नाथ मंदिर के कपाट खोलें, करें दर्शन

पुरी। कोविड-19 वैश्विक महामारी के मद्देनजर करीब नौ महीने बंद रहने के बाद आखिरकार श्री जगन्नाथ मंदिर बुधवार को दोबारा खुल गया, लेकिन लोग तीन जनवरी से ही यहां भगवान के दर्शन कर पाएंगे। अधिकारियों ने बताया कि सेवकों और उनके परिवार के सदस्यों के लिए सुबह सात बजे मंदिर के द्वार खोले गए।इस दौरान कोविड-19 से जुड़े नियमों का सख्ती से पालन किया गया। उन्होंने बताया कि वैश्विक महामारी के कारण मंदिर मध्य मार्च से बंद था। 12वीं शताब्दी के भगवान विष्णु के मंदिर के द्वार इतिहास में पहली बार भक्तों के लिए बंद किए गए थे। पुरी के कलेक्टर बलवंत सिंह ने पत्रकारों को बताया कि पहले तीन दिन 23,24 और 25 दिसम्बर को केवल सेवकों और उनके परिवार के सदस्यों को दर्शन करने की अनुमति होगी।

अधिकारियों ने बताया कि 26 से 31 दिसम्बर के बीच केवल पुरी के निवासी भगवान के दर्शन कर पाएंगे। इसके बाद नव वर्ष पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होने के मद्देनजर एक और दो जनवरी को मंदिर को फिर बंद कर दिया जाएगा। तीन जनवरी से मंदिर के द्वार सभी श्रद्धालुओं के लिए खुल जाएंगे। उन्होंने बताया कि तीन जनवरी से आने वाले श्रद्धालुओं को कोरोना वायरस से संक्रमित ना होने की पुष्टि करने वाली रिपोर्ट दिखानी होगी।

पुरी के निवासियों से कोविड-19 की जांच रिपोर्ट ना मांगे जाने के सवाल पर अधिकारी ने कहा, ” प्रशासन स्थानीय लोगों में कोरोना वायरस की स्थिति से अवगत है। इसलिए उन्हें संक्रमित ना होने की पुष्टि के लिए कोविड-19 की जांच रिपोर्ट दिखाने की जरूरत नहीं है।”

बीएसएनएल ने अपने कुछ प्रीपेड प्लान्स को महंगा किया

बीएसएनएल ने अपने कुछ प्रीपेड प्लान्स को महंगा किया अकांशु उपाध्याय  नई दिल्ली। बीएसएनएल ने यूजर्स को तगड़ा झटका दिया है। कंपनी ने चुपचाप अपन...