धर्म-कर्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
धर्म-कर्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 10 मई 2024

विशेष: आज मनाई जाएगी 'विनायक चतुर्थी'

विशेष: आज मनाई जाएगी 'विनायक चतुर्थी' 

सरस्वती उपाध्याय 
विनायक चतुर्थी का उत्सव हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसमें भगवान गणेश की पूजा विशेष रूप से की जाती है। यह त्योहार हर महीने की कृष्ण-पक्ष और शुक्ल-पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। चतुर्थी तिथि को गणेश जी के विशेष उपासन के लिए व्रत रखा जाता है। इस उत्सव के दौरान भक्तगण भगवान गणेश की पूजा और आराधना करते हैं और उन्हें मोदक, लड्डू और फल चढ़ाते हैं। विनायक चतुर्थी व्रत को वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भी मनाया जाता है। यह व्रत धार्मिक उत्साह और भक्ति का प्रतीक है, जिस दिन भक्तों के द्वारा भगवान गणेश के आशीर्वाद की कामना की जाती हैं।

जानें विनायक चतुर्थी का शुभ मूहूर्त

विनायक चतुर्थी के शुभ मूहूर्त के अनुसार, मई महीने में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 11 मई को दोपहर 2:50 बजे से शुरू होगी और अगले दिन, 12 मई को दोपहर 2:03 बजे तक चलेगी। धार्मिक मान्यता के मुताबिक, उदय तिथि को महत्व देते हुए, विनायक चतुर्थी का व्रत 11 मई को किया जाएगा। वहीं पूजा का मुहूर्त 12 मई को सुबह 10:57 बजे से लेकर दोपहर 1:39 बजे तक होगा।

ऐसे करें भगवान गणेश की पूजा

विनायक चतुर्थी, हिंदू धर्म में भगवान गणेश के प्रति समर्पित एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं में बहुत महत्वपूर्ण है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन निर्धारित तिथि के सूर्योदय के साथ उपवास शुरू होता है। इस दिन पूजा करने के लिए आप पूजा स्थल की सफाई करें, एक लकड़ी की चौकी की रखावट रखें, हरा कपड़ा बिछाएं, और गणेश जी की मूर्ति का स्थापना भी करें। इसके साथ ही सभी देवी-देवता को फूल चढ़ाएं, दूर्वा घास, और सिंदूर को भगवान गणेश को अर्पण करें व पूजा करें। पूजा के बाद भगवान गणेश जी को लड्डू का भोग चढ़ाए।

भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए इन मंत्रों का करें जाप

‘ॐ एकदंताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्’
‘ॐ महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्’
‘ॐ गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्’।

मंगलवार, 16 अप्रैल 2024

नवरात्रि का नौवां दिन मां 'सिद्धिदात्री' को समर्पित

नवरात्रि का नौवां दिन मां 'सिद्धिदात्री' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 
मां दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

श्लोक...
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमसुरैरपि | सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ||

सिद्धियां...
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। इनके नाम इस प्रकार हैं-
माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए।
माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है।
प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।

नवदुर्गाओं में...
नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती। माँ के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए भक्त को निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करने का नियम कहा गया है। ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है। विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है।

स्तुति...
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

अर्थ-
हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।

सोमवार, 15 अप्रैल 2024

नवरात्रि का आठवां दिन मां 'महागौरी' को समर्पित

नवरात्रि का आठवां दिन मां 'महागौरी' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 
नवरात्रि का आठवां दिन, यानी कि महा अष्टमी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस साल चैत्र नवरात्रि की अष्टमी 29 मार्च 2023 को है। इस दिन मां महागौरी की पूजा होती है‌। इसे दुर्गाष्टमी भी कहते हैं। मान्यता है कि नवरात्रि में अगर नौ दिन तक पूजा और व्रत न कर पाएं हो तो अष्टमी और नवमी के दिन व्रत रखकर देवी का उपासना करने से पूरे 9 दिन की पूजा का फल मिलता है। इस दिन लोग कुल देवी की पूजा के बाद कन्या पूजन भी करते हैं। ज्योतिष में मां महागौरी का संबंध शुक्र ग्रह से है। इनकी अराधना से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति आती है।

श्लोक...
श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः | महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ||

स्वरूप...
इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी।' इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं।
महागौरी की चार भुजाएँ हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है। यही महागौरी देवताओं की प्रार्थना पर हिमालय की श्रृंखला मे शाकंभरी के नाम से प्रकट हुई थी।

कथा...
माँ महागौरी ने देवी पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं। जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं। इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं। पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं।
एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा। महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं। देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”। महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी। इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं। एक अन्य कथा के अनुसार दुर्गम दानव के अत्याचारों से संतप्त जब देवता भगवती शाकंभरी की शरण मे आये तब माता ने त्रिलोकी को मुग्ध करने वाले महागौरी रूप का प्रादुर्भाव किया। यही माता महागौरी आसन लगाकर शिवालिक पर्वत के शिखर पर विराजमान हुई और शाकंभरी देवी के नाम से उक्त पर्वत पर उनका मंदिर बना हुआ है यह वही स्थान है, जहां देवी शाकंभरी ने महागौरी का रूप धारण किया था।

पूजन विधि...
अष्टमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं। देवी गौरी की पूजा का विधान भी पूर्ववत है अर्थात जिस प्रकार सप्तमी तिथि तक आपने मां की पूजा की है उसी प्रकार अष्टमी के दिन भी प्रत्येक दिन की तरह देवी की पंचोपचार सहित पूजा करते हैं।

महत्व...
माँ महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है। हमें सदैव इनका ध्यान करना चाहिए। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मन को अनन्य भाव से एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिए।
मां महागौरी भक्तों का कष्ट अवश्य ही दूर करती है। इसकी उपासना से अर्तजनों के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। अतः इसके चरणों की शरण पाने के लिए हमें सर्वविध प्रयत्न करना चाहिए।

महागौरी के पूजन से सभी नौ देवियां प्रसन्न होती है।

उपासना...
पुराणों में माँ महागौरी की महिमा का प्रचुर आख्यान किया गया है। ये मनुष्य की वृत्तियों को सत्‌ की ओर प्रेरित करके असत्‌ का विनाश करती हैं। हमें प्रपत्तिभाव से सदैव इनका शरणागत बनना चाहिए।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।

रविवार, 14 अप्रैल 2024

नवरात्रि का सातवां दिन मां 'कालरात्रि' को समर्पित

नवरात्रि का सातवां दिन मां 'कालरात्रि' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 
मां दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गा पूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन 'सहस्रार' चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। देवी कालरात्रि को व्यापक रूप से माता देवी - काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, मृत्यू-रुद्राणी, चामुंडा, चंडी और दुर्गा के कई विनाशकारी रूपों में से एक माना जाता है। रौद्री , धूम्रवर्णा कालरात्रि मां के अन्य कम प्रसिद्ध नामों में हैं।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि मां काली और कालरात्रि का उपयोग एक दूसरे के परिपूरक है, हालांकि इन दो देवीओं को कुछ लोगों द्वारा अलग-अलग सत्ताओं के रूप में माना गया है। डेविड किन्स्ले के मुताबिक, काली का उल्लेख हिंदू धर्म में लगभग ६०० ईसा के आसपास एक अलग देवी के रूप में किया गया है। कालानुक्रमिक रूप से, कालरात्रि महाभारत में वर्णित(लगभग 3200) ईसा पूर्व वर्तमान काली का ही वर्णन है।
माना जाता है कि देवी के इस रूप में सभी राक्षस,भूत, प्रेत, पिशाच और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है, जो उनके आगमन से पलायन करते हैं।
शिल्प प्रकाश में संदर्भित एक प्राचीन तांत्रिक पाठ, सौधिकागम, देवी कालरात्रि का वर्णन रात्रि के नियंत्रा रूप में किया गया है। सहस्रार चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है। उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य (सिद्धियों और निधियों विशेष रूप से ज्ञान, शक्ति और धन) का वह भागी हो जाता है। उसके समस्त पापों-विघ्नों का नाश हो जाता है और अक्षय पुण्य-लोकों की प्राप्ति होती है।

श्लोक...
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता | लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी || वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा | वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयन्करि ||

वर्णन...
इनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। ये तीनों नेत्र ब्रह्मांड के सदृश गोल हैं। इनसे विद्युत के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं।
माँ की नासिका के श्वास-प्रश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालाएँ निकलती रहती हैं। इनका वाहन गर्दभ (गदहा) है। ये ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वरमुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग (कटार) है।

महिमा...
माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम 'शुभंकारी' भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है।
माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।
माँ कालरात्रि के स्वरूप-विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उपासना करनी चाहिए। यम, नियम, संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए। मन, वचन, काया की पवित्रता रखनी चाहिए। वे शुभंकारी देवी हैं। उनकी उपासना से होने वाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती। हमें निरंतर उनका स्मरण, ध्यान और पूजा करना चाहिए।
जय माता दी ।।

नवरात्रि दिवस...
मां कालरात्रि मंदिर, नयागांव, सारण (बिहार), डुमरी बुजुर्ग गांव
नवरात्रि की सप्तमी के दिन माँ कालरात्रि की आराधना का विधान है। इनकी पूजा-अर्चना करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है व दुश्मनों का नाश होता है, तेज बढ़ता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में सातवें दिन इसका जाप करना चाहिए।

मंदिर...
कालरात्रि मंदिर, डुमरी बुजुर्ग गांव ,नयागांव, सारण (बिहार)[3]
कालरात्रि-वाराणसी मंदिर, डी 8/17, कालिक गाली, जो कि अन्नपूर्णा के समानांतर लेनिन - विश्वनाथ

मंत्र...
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे पाप से मुक्ति प्रदान कर।

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रै नमः |

शनिवार, 13 अप्रैल 2024

नवरात्रि का छठा दिन मां 'कात्यायनी' को समर्पित

नवरात्रि का छठा दिन मां 'कात्यायनी' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 
कात्यायनी नवदुर्गा या हिंदू देवी पार्वती (शक्ति) के नौ रूपों में छठवीं रूप हैं।

मंत्र...
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन। 
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥

'कात्यायनी' अमरकोष में पार्वती के लिए दूसरा नाम है, संस्कृत शब्दकोश में उमा, कात्यायनी, गौरी, काली, हेेमावती व ईश्वरी इन्हीं के अन्य नाम हैं। शक्तिवाद में उन्हें शक्ति या दुर्गा, जिसमे भद्रकाली और चंडिका भी शामिल है, में भी प्रचलित हैं। यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख प्रथम किया है। स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं , जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दी गई सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया। वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख पाणिनि पर पतञ्जलि के महाभाष्य में किया गया है, जो दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में रचित है। उनका वर्णन देवीभागवत पुराण, और मार्कंडेय ऋषि द्वारा रचित मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में किया गया है जिसे ४०० से ५०० ईसा में लिपिबद्ध किया गया था। बौद्ध और जैन ग्रंथों और कई तांत्रिक ग्रंथों, विशेष रूप से कालिका पुराण (१० वीं शताब्दी) में उनका उल्लेख है, जिसमें उद्यान या उड़ीसा में देवी कात्यायनी और भगवान जगन्नाथ का स्थान बताया गया है।
परम्परागत रूप से देवी दुर्गा की तरह वे लाल रंग से जुड़ी हुई हैं। नवरात्रि उत्सव के षष्ठी को उनकी पूजा की जाती है। उस दिन साधक का मन 'आज्ञा चक्र' में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से माँ के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं।

श्लोक...
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन ।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥

कथा...
माँ का नाम कात्यायनी कैसे पड़ा इसकी भी एक कथा है- कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।
कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं।
ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायन के वहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्त सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था।
माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है।
माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है।

उपासना...
नवरात्रि का छठा दिन माँ कात्यायनी की उपासना का दिन होता है। इनके पूजन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है व दुश्मनों का संहार करने में ये सक्षम बनाती हैं। इनका ध्यान गोधुली बेला में करना होता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में छठे दिन इसका जाप करना चाहिए।
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और शक्ति -रूपिणी प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।
इसके अतिरिक्त जिन कन्याओ के विवाह मे विलम्ब हो रहा हो, उन्हे इस दिन माँ कात्यायनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए, जिससे उन्हे मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है।

विवाह के लिए कात्यायनी मन्त्र...

ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि । नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:॥

महिमा...
माँ को जो सच्चे मन से याद करता है उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं। जन्म-जन्मांतर के पापों को विनष्ट करने के लिए माँ की शरणागत होकर उनकी पूजा-उपासना के लिए तत्पर होना चाहिए।

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2024

नवरात्रि का पांचवां दिन मां 'स्कंदमाता' को समर्पित

नवरात्रि का पांचवां दिन मां 'स्कंदमाता' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 
नवरात्रि का पांचवां दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं।

श्लोक...
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया |
शुभदाऽस्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ||

कथा...
भगवान स्कंद 'कुमार कार्तिकेय' नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है।

स्वरूप...
स्कंदमाता की चार भुजाएँ हैं। इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं। इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन सिंह (शेर) है।

महत्व...
नवरात्रि-पूजन के पाँचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। इस चक्र में अवस्थित मन वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है। वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर अग्रसर हो रहा होता है।
साधक का मन समस्त लौकिक, सांसारिक, मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासना माँ स्कंदमाता के स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन होता है। इस समय साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिए। उसे अपनी समस्त ध्यान-वृत्तियों को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।
माँ स्कंदमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस मृत्युलोक में ही उसे परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है। स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना भी स्वमेव हो जाती है। यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है, अतः साधक को स्कंदमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।
सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है। एक अलौकिक प्रभामंडल अदृश्य भाव से सदैव उसके चतुर्दिक्‌ परिव्याप्त रहता है। यह प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता रहता है।
हमें एकाग्रभाव से मन को पवित्र रखकर माँ की शरण में आने का प्रयत्न करना चाहिए। इस घोर भवसागर के दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ बनाने का इससे उत्तम उपाय दूसरा नहीं है।

उपासना...
प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में पाँचवें दिन इसका जाप करना चाहिए।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और स्कंदमाता के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें। इस दिन साधक का मन 'विशुद्ध' चक्र में अवस्थित होता है। इनके विग्रह में भगवान स्कंदजी बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

नवरात्रि का चौथा दिन मां 'कूष्मांडा' को समर्पित

नवरात्रि का चौथा दिन मां 'कूष्मांडा' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 
नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्मांडा देवी के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन 'अनाहत' चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचंचल मन से कूष्मांडा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लगना चाहिए।
जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं।
इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। माँ की आठ भुजाएँ हैं। अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन शेर है।

श्लोक...
सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।। पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।

महिमा...
मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। माँ कूष्मांडा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है।
विधि-विधान से माँ के भक्ति-मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। यह दुःख स्वरूप संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है। माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है।
माँ कूष्मांडा की उपासना मनुष्य को आधियों-व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाने वाली है। अतः अपनी लौकिक, पारलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए।

उपासना...
चतुर्थी के दिन माँ कूष्मांडा की आराधना की जाती है। इनकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग-शोक दूर होकर आयु-यश में वृद्धि होती है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में चतुर्थ दिन इसका जाप करना चाहिए।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।'

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें। 
अपनी मंद, हल्की हँसी द्वारा अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के रूप में पूजा जाता है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ कहते हैं। बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस कारण से भी माँ कूष्माण्डा कहलाती हैं।

पूजन...
इस दिन जहाँ तक संभव हो बड़े माथे वाली तेजस्वी विवाहित महिला का पूजन करना चाहिए। उन्हें भोजन में दही, हलवा खिलाना श्रेयस्कर है। इसके बाद फल, सूखे मेवे और सौभाग्य का सामान भेंट करना चाहिए। जिससे माताजी प्रसन्न होती हैं। और मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

बुधवार, 10 अप्रैल 2024

नवरात्रि का तीसरा दिन मां 'चंद्रघंटा' को समर्पित

नवरात्रि का तीसरा दिन मां 'चंद्रघंटा' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 
मां दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रविष्ट होता है। लोकवेद के अनुसार माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

श्लोक...
पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता | प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ||

कृपा...
मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना सद्यः फलदायी है। माँ भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं। इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है। इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घंटे की ध्वनि निनादित हो उठती है।
माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं। माँ के आराधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखाई नहीं देती, किन्तु साधक और उसके संपर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भली-भाँति करते रहते हैं। विद्यार्थियों के लिए मां साक्षात विद्या प्रदान करती है। वहीं, देवी साधक की सभी प्रकार से रक्षा करती है।

साधना...
हमें चाहिए कि अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को विहित विधि-विधान के अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके माँ चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना में तत्पर हों। उनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं। हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। हालांकि इन सब क्रियाओं का प्रमाण हमारे पवित्र धर्म ग्रंथों में कहीं नहीं मिलता, देवी देवताओं के मूल व साधना की सही विधि तत्वदर्शी यानि संत पूर्ण संत ही बता सकते हैं एसा हमारे वित्र धर्म ग्रंथों प्रमाणित करते हैं। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में तृतीय दिन इसका जाप करना चाहिए। मां चन्द्रघंटा को नारंगी रंग प्रिय है। भक्त को जहां तक संभव हो, पुजन के समय सूर्य के आभा के समान रंग के वस्त्र धारण करना चाहिए।

उपासना...
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें। इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

नवरात्रि का दूसरा दिन मां 'ब्रह्मचारिणी' को समर्पित

नवरात्रि का दूसरा दिन मां 'ब्रह्मचारिणी' को समर्पित 

सरस्वती उपाध्याय 
ब्रह्मचारिणी मां की नवरात्र पर्व के दूसरे दिन पूजा-अर्चना की जाती है। साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है, तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल रहता है। यह जानकारी भविष्य पुराण से ली गई हे।

मां ब्रह्मचारिणी...

श्लोक
दधाना कर पद्माभ्यामक्ष माला कमण्डलु | देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा || 

शक्ति
इस दिन साधक कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने के लिए भी साधना करते हैं। जिससे उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकें।

फल
माँ दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।
माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।
इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते हैं।

उपासना
प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है, या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

इस साल चैत्र नवरात्रि पर बनेगा 'अमृत सिद्धि' योग

इस साल चैत्र नवरात्रि पर बनेगा 'अमृत सिद्धि' योग

सरस्वती उपाध्याय 
चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को नए विक्रम संवत के साथ 09 अप्रैल से वासंतिक नवरात्रि की शुरुआत हो जाएगी। चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को नए संवत्सर की शुरुआत के साथ वासंती नवरात्र की घट स्थापना मां दुर्गा की पूजा एवं पाठ का कार्य शुरू हो जाएगा। इस वर्ष यह पर्व नौ अप्रैल से शुरू होगा। इस साल चैत्र नवरात्रि पर 30 साल के बाद अमृत सिद्धि योग बनने जा रहा है, जो अत्यंत शुभकारी है। इस दौरान मां दुर्गा की आराधना करने से सभी कष्ट और दुखों से मुक्ति मिलती है।
नक्षत्रों में पहला नक्षत्र अश्विनी नक्षत्र माना गया है। अगर मंगलवार के दिन अश्विनी नक्षत्र हो तो यह अमृत सिद्धि योग कहलाता है। इस बार चैत्र नवरात्रि पर बन रहा यह संयोग काफी अद्भुद माना जा रहा है। लगभग 30 साल बाद बन रहे इस योग के संबंध में अथर्ववेद में बताया गया है कि अश्विनी नक्षत्र के दौरान माता की आराधना करने से मृत्यु तुल्य कष्टों से मुक्ति मिलती है। अश्विनी नक्षत्र नौ अप्रैल को सूर्योदय के 02 घंटे बाद प्रारंभ हो जाएगा।
यह जानकारी देते हुए  ज्योतिषाचार्य ने बताया कि इस दिन ब्रह्मा जी की विशेष पूजा के साथ नए पंचांग की पूजा की जाती है। उस दिन से नए पंचांग का श्रवण शुरू किया जाता है। इस दिन नए पंचांग के नव वर्ष के राजा, मंत्री व सेनाध्यक्ष कथा वर्षफल का श्रवण किया जाता है। इस दिन नए पंचांग का दान करना विशेष महत्व है। धार्मिक अनुष्ठान के क्रम में इस दिन साधक को प्रातःकाल तेल मालिश करके स्नान कर नए वस्त्र धारण कर ब्रह्मा जी की पूजा निम्न मंत्र- मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य स्वजन परिजन सहितस्य वाआयुरारोग्ययै अस्वर्यादि सकल शुभ फलोतरोत्तर अभिवृध्यर्थ ब्रह्मा दी संवत्सर देवता ना पूजनम अहं करिस्ये से शुरू करनी चाहिए।
17 अप्रैल को हवन के साथ मां देवी की आराधना का नौ दिवसीय अनुष्ठान संपन्न हो जाएगा। पंचागों के अनुसार इस बार 09 अप्रैल मंगलवार को नवरात्रि शुरू होने से देवी का आगमन घोड़ा पर हो रहा है, जो शुभ नहीं है। इससे राज्य में भय और युद्ध की स्थिति बन सकती है जबकि 18 अप्रैल गुरुवार दसवीं के दिन माता हाथी पर प्रस्थान करेंगी। माता का प्रस्थान शुभकारी है। इसके प्रभाव से राज्य में अच्छी बारिश और उन्नत खेती की संभावना है।

पूजा करें विधिपूर्वक, होगा सकल कल्याण

पंडित  कहते हैं कि सर्वप्रथम नवीन वस्त्र धारण कर एक चौकी पर श्वेत वस्त्र बिछाकर उस पर हल्दी या केसर के रंगे हुए अक्षत से अष्टदल कमल बना कर उसके मध्य ब्रह्मा जी की मूर्ति या फोटो स्थापना करें। इसके बाद उनका षोडशोपचार पूजन करें। इसके पश्चात अन्य देवी-देवताओं, यक्ष, राक्षस, गंधर्व, ऋषि, मुनि, मनुष्य, नदी, पर्वत, पशु-पक्षी, कीटाणु का पूजन कर प्रार्थना करें। माता दुर्गा की आराधना शुरू कर इस दिन से सायंकालीन उपवास करना अनिवार्य हो जाता है। वासंतिक नवरात्र इसी दिन से शुरू की जाती है। इस दिन दुर्गा पूजा की घट स्थापना के साथ नवरात्र का पूजा पाठ करें।

शनिवार, 23 मार्च 2024

आज मनाया जाएगा 'होली' का पर्व, जानिए

आज मनाया जाएगा 'होली' का पर्व, जानिए 

सरस्वती उपाध्याय 
छोटी होली को होलिका दहन के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन लोग शाम के समय अपने घर से बाहर विधि-विधान के साथ होलिका दहन की पूजा करते हैं। यह दिन बुरी शक्तियों पर विजय का प्रतीक है और यह भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित है।
छोटी होली का हिंदुओं में बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। तो आइए इसकी तिथि और मुहूर्त के बारे में जानते हैं...

छोटी होली तिथि और समय
पूर्णिमा तिथि की शुरूआत - 24 मार्च, 2024 - 09:54 से पूर्णिमा तिथि का समापन - 25 मार्च, 2024 - 12:29 तक होलिका दहन का मुहूर्त- रात 11:13 बजे से 11:53 बजे तक। भद्रा पूंछ- शाम 06:33 बजे से शाम 07:53 बजे तक भद्रा मुख- शाम 07:53 बजे से रात 10:06 बजे तक।

छोटी होली से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
सनातन धर्म में छोटी होली का अपना एक खास महत्व है। होली आमतौर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, फरवरी और हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह त्योहार फाल्गुन माह में मनाया जाता है। होलिका दहन का पर्व शाम को सूर्यास्त के बाद मनाया जाता है, जब आग जलाई जाती है और लोग अपने परिवार और दोस्तों के साथ प्रार्थना करने आते हैं। होलिका दहन एक अनुष्ठानिक अलाव है, जिसमें सभी नकारात्मक शक्तियों का दहन हो जाता है। इस दिन लोगों को वहीं पूजा करनी चाहिए, जहां होलिका दहन होती है। लोगों को इस शुभ पूर्व संध्या पर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए, विभिन्न वैदिक मंत्रों का जाप करना चाहिए। साथ ही अच्छे स्वास्थ्य, धन, समृद्धि के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

गुरुवार, 7 मार्च 2024

विशेष: आज मनाया जाएगा 'महाशिवरात्रि' का पर्व

विशेष: आज मनाया जाएगा 'महाशिवरात्रि' का पर्व 

सरस्वती उपाध्याय 
हिंदू पंचांग के अनुसार, हर वर्ष फाल्गुन माह के कृष्ण-पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर महाशिवरात्रि का त्योहार बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर ही  भगवान भोलेनाथ ने मां पार्वती संग विवाह किया था। ऐसे में हर एक शिवभक्त इस दिन का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार करता है और विधि-विधान के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करता है। वैसे तो हिंदू पंचांग के अनुसार हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर शिवरात्रि आती है और शिवभक्त इस दिन व्रत रखते हुए भगवान भोलेनाथ और मां गौरी की पूजा करते हैं। लेकिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि बहुत ही खास होती है। इस दिन महाशिवरात्रि मनाई जाती है। महाशिवरात्रि पर देशभर के सभी शिव मंदिर में भोलेनाथ के दर्शन और पूजा करने के लिए बड़ी भारी भीड़ होती है। एक दूसरी धार्मिक मान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ पृथ्वी पर आते हैं और सभी शिवलिंग में विराजमान होते हैं। इस तरह से महाशिवरात्रि पर व्रत रखने और शिव उपासना करने से व्यक्ति के कष्ट दूर होते हैं और हर एक मनोकामना पूरी होती है। आइए जानते हैं महाशिवरात्रि की शुभ तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और विशेष संयोग...।

महाशिवरात्रि तिथि 2024
हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष महाशिवरात्रि की चतुर्दशी तिथि शुरुआत 08 मार्च को रात 09 बजकर 47 मिनट से होगी, जिसका समापन 09 मार्च को शाम 06 बजकर 17 मिनट पर होगा। यानी महाशिवरात्रि का त्योहार 08 मार्च, शुक्रवार को मनाया जाएगा। धर्म ग्रंथों के अनुसार महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ की पूजा निशिता काल में करने का विधान होता है। ऐसे में महाशिवरात्रि 08 मार्च को मनाई जाएगी।


महाशिवरात्रि पर पूजा का शुभ मुहूर्त

महाशिवरात्रि 2024 तिथि: 8 मार्च 2024
निशीथ काल पूजा मुहूर्त : 08 मार्च की मध्यरात्रि 12 बजकर 07 मिनट से 12 बजकर 55 मिनट तक।
अवधि : 0 घंटे 48 मिनट

महाशिवरात्रि 2024 चार प्रहर पूजा शुभ मुहूर्त

प्रथम प्रहर की पूजा- 08 मार्च शाम 06 बजकर 29 मिनट से रात 09 बजकर 33 मिनट तक
दूसरे प्रहर की पूजा- 08 मार्च सुबह 09 बजकर 33 मिनट से 09 मार्च सुबह 12 बजकर 37 मिनट तक
तीसरे प्रहर की पूजा-09 मार्च सुबह 12 बजकर 37 मिनट से 03 बजकर 40 मिनट तक
चौथे प्रहर की पूजा- 09 मार्च सुबह 03 बजकर 40 मिनट से  06 बजकर 44 मिनट तक
पारण मुहूर्त : 09 मार्च की सुबह 06 बजकर 38 मिनट से दोपहर 03 बजकर 30 मिनट तक।

महाशिवरात्रि 2024 पर बना दुर्लभ योग
हिंदू पंचांग की गणना के मुताबिक इस बार महाशिवरात्रि पर बहुत ही दुर्लभ संयोग बना हुआ है। इस बार शुक्रवार को महाशिवरात्रि का त्योहार है और इसी दिन शुक्र प्रदोष व्रत भी रखा जाएगा। महाशिवरात्रि चतुर्दशी तिथि जबकि प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। लेकिन इस बार तिथियों के संयोग के कारण फाल्गुन की त्रयोदशी तिथि और महाशिवरात्रि की पूजा का निशिता मुहूर्त एक ही दिन है। ऐसे में इस बार एक व्रत से दोगुना लाभ प्राप्त किया जा सकता है। 
इसके अलावा इस वर्ष महाशिवरात्रि पर तीन योग भी बन रहे हैं। महाशिवरात्रि के दिन शिव, सिद्ध और सर्वार्थसिद्ध योग का निर्माण होगा। शिवयोग में पूजा और उपासना करने को बहुत ही शुभ माना जाता है। इस योग में भगवान शिव का नाम जपने वाले मंत्र बहुत ही शुभ फलदायक और सफलता कारक होते हैं। वहीं सिद्ध योग में नया कार्य करने पर उसमें पूर्ण सफलता हासिल होती है। इसके अलावा सर्वार्थ सिद्धि योग में हर कार्य में सफलता मिलती है। 

महाशिवरात्रि पर ऐसे करें भोलेनाथ की पूजा
सबसे पहले महाशिवरात्रि पर सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें,फिर भोलेनाथ का नाम लेते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लें।
व्रत के दौरान भगवान शिव और माता पार्वती के मंत्रों को जपते हुए दोनों का आशीर्वाद लें।
शुभ मुहूर्त में पूजा आरंभ करें।
घर के पास स्थित शिव मंदिर जाकर शिवलिंग को प्रणाम करते हुए और शिवमंत्रों के उच्चारण के साथ गंगाजल, गन्ने के रस, कच्चे दूध, घी और दही से अभिषेक करें। फिर इसके बाद भगवान भोलेनाथ को बेलपत्र, भांग, धतूरा और बेर आदि अर्पित करें। 
अंत में शिव चालीसा और शिव आरती का पाठ करें।

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

आज मनाया जाएगा 'बसंत पंचमी' का पर्व

आज मनाया जाएगा 'बसंत पंचमी' का पर्व 

सरस्वती उपाध्याय 
इस साल 14 फरवरी 2024 को बसंत पंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन को मां सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। साधक विद्या और ज्ञान की प्राप्ति के लिए मां शारदा की विधिवत पूजा-आराधना की जाती है। इस त्योहार को सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा करने से करियर में आ रही बाधाओं से छुटकारा मिलता है और जीवन के हर क्षेत्र में अपार सफलता मिलती है। आइए जानते हैं बसंत पंचमी तिथि का शुभ मुहूर्त, पूजाविधि, मंत्र, आरती और उपाय….

बसंत पंचमी का शुभ मुहूर्त 
पंचांग के अनुसार, इस बार माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का आरंभ 13 फरवरी को दोपहर 2 बजकर 41 मिनट पर शुरू हो रहा है और अगले दिन यानी 14 फरवरी को दोपहर 12 बजकर 9 मिनट पर समाप्त होगी।

पूजा का शुभ मुहूर्त 
बसंत पंचमी के दिन 14 फरवरी 2024 को सुबह 7 बजकर 1 मिनट से दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक पुजा का शुभ मुहूर्त बन रहा है।

सामग्री लिस्ट 
हल्दी, अक्षत, केसर, पीले वस्त्र, इत्र, सुपारी, दूर्वा, कुमकुम, पीला चंदन,धूप-दीप, गंगाजल, पूजा की चौकी,लौंग, सुपारी, तुलसी दल और भोग के लिए मालपुआ, लड्डू, सूजी का हलवा या राजभोग में से किसी भी चीज का भोग लगा सकते हैं।

पूजा-विधि 
सरस्वती पूजा के लिए सुबह जल्दी उठें।
स्नानादि के बाद पीले वस्त्र धारण करें।
मंदिर की साफ-सफाई करें।
इसके बाद मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित करें।
उन्हें पीले रंग का वस्त्र अर्पित करें।
अब रोली, मोली, चंदन, केसर,हल्दी पीले या सफेद रंग का वस्त्र अर्पित करें।
मां सरस्वती को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं।
इसके बाद सरस्वती वंदन का पाठ करें।
मां सरस्वती के बीज मंत्रों का जाप करें।
अंत में मां सरस्वती समेत सभी देवी-देवताओं की आरती उतारें।
पूजन के बाद सभी लोगों को प्रसाद बांटे और खुद भी सेवन करें।

बीज मंत्र 
बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए ‘ओम् ऐं सरस्वत्यै  नम:’  मंत्र का 108 बार जाप कर सकते हैं।

सरस्वती वंदना 
या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।

शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

आज मनाया जाएगा 'धनतेरस' का पर्व

आज मनाया जाएगा 'धनतेरस' का पर्व 

सरस्वती उपाध्याय 
हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। धनतेरस के दिन मां लक्ष्मी, कुबेर देवता और भगवान धनवंतरी की उपासना की जाती है।
मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस के दिन सोना चांदी, स्टील के बर्तन, गोमती चक्र खरीदना सबसे ज्यादा शुभ माना जाता है।
साथ ही धनतेरस पर एक सस्ती चीज भी खरीदी जाती है वो है झाड़ू।
कहते हैं कि धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने से मां लक्ष्मी धन की बरसात करती हैं ! तो आइए जानते हैं कि झाड़ू खरीदते समय किन गलतियों से सावधान रहना चाहिए ?

कैसी झाड़ू खरीदें ?
धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने से आर्थिक संपन्नता बढ़ती है। इस दिन कोई भी झाड़ू न खरीद लाएं। इस दिन केवल सीक या फूल वाली झाड़ू ही खरीदें। नई झाड़ू को किचन या बेडरूम के अंदर न रखें। इसे पलंग के नीचे या पैसों की अलमारी के आस-पास न रखें।

घनी झाड़ू खरीदें
झाड़ू खरीदते वक्त ध्यान रहे कि वो पतली या मुरझाई न हो। झाड़ू जितनी ज्यादा घनी होगी, उतना अच्छा होगा। इसकी तीलियां टूटी नहीं होनी चाहिए। इसकी तीलियां साफ-सुथरी और मजबूत होनी चाहिए।

प्लास्टिक वाली झाड़ू
धनतेरस के दिन प्लास्टिक की झाड़ू खरीदने से बचें। इस शुभ अवसर पर प्लास्टिक का सामान खरीदने से भी बचना चाहिए।प्लास्टिक एक अशुद्ध धातु है, जिसकी धनतेरस पर खरीदारी नहीं करनी चाहिए। धनतेरस पर अशुद्ध धातु की खारीदारी फलदायी नहीं मानी जाती है‌।

झाड़ू लाने के बाद क्या करें ?
धनतेरस पर नई झाड़ू लाने के बाद उसका सीधे प्रयोग न करने लगें। पहले पुरानी झाड़ू की पूजा करें। फिर नई झाड़ू को कुमकुम और अक्षत अर्पित करें। इसके बाद ही इसका इस्तेमाल शुरू करें।

सोमवार, 18 सितंबर 2023

आज मनाई जाएगी गणेश चतुर्थी, तुलसी वर्जित

आज मनाई जाएगी गणेश चतुर्थी, तुलसी वर्जित 

सरस्वती उपाध्याय 
हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक साल गणेश चतुर्थी का पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल-पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कहा जाता है कि इस माह की चतुर्थी तिथि को गणपति बप्पा का जन्म हुआ था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणेश भगवान को कई नामों से जाना जाता है। कोई इन्हें बप्पा कहता है, तो गणपति! उन्हें और भी नामों से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणेश चतुर्थी का पर्व पूरे 10 दिनों तक मनाया जाता है। गणपति बप्पा का महापर्व गणेश चतुर्थी कल यानी 19 सितंबर 2023 को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाएगा। गणपति बप्पा का महापर्व गणेश चतुर्थी कल यानी 19 सितंबर 2023 को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाएगा। इस साल गणपति बप्पा का महापर्व गणेश चतुर्थी कल यानी 19 सितंबर 2023 को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाएगा।
गणेश चतुर्थी भाद्र पद माह के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से शुरू होता है और अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। इन 10 दिनों में बप्पा को घर में विधि-विधान से पूजन किया जाता है। इसके साथ ही उनको कई तरह के भोग लगाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के आधार पर तुलसी पत्ता भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को बहुत ही अधिक प्रिय हैं। लेकिन, क्या आपको पता है गणेश भगवान को कभी भी तुलसी का पत्ता नहीं चढ़ाया जाता है। ऐसा क्यों! अगर आप नहीं जानते हैं तो आज इस खबर में आपको बताएंगे कि आखिर क्यों गणपति को तुलसी दल अर्पित नहीं किया जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कहा जाता है कि माता तुलसी भगवान गणेश से विवाह करना चाहती थी। मन में विवाह की इच्छा लेकर वह भगवान गणेश के सामने प्रस्ताव रखा। लेकिन, मान्यता है कि भगवान गणेश इस विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिए थे। गणपति बप्पा द्वारा विवाह का प्रस्ताव ठुकराने के बाद माता तुलसी नाराज हो गई और गणेश भगवान को दो-दो शादियां होने का शाप दे दी। तुलसी के शाप से भगवान गणेश भी क्रोधित हो गए और उन्होंने भी तुलसी को किसी राक्षस से विवाह होने का शाप दे दिया।
बाद में तुलसी को शाप देकर गणेश भगवान को आभास हुआ। भगवान गणेश ने तुलसी से कहा कि विष्णु भगवान के प्रिय होने के कारण आप कलयुग में पूरे सृष्टि के लिए मोक्ष प्रदायिनी मानी जाओगी। उन्होंने तुलसी से कहा कि आप मेरी पूजा में शामिल नहीं हो सकती हैं। इसलिए गणेश भगवान पर तुलसी दल नहीं अर्पित किया जाता है।

बुधवार, 6 सितंबर 2023

जन्माष्टमी पर दान-पुण्य करना बेहद लाभदायक

जन्माष्टमी पर दान-पुण्य करना बेहद लाभदायक 

संदीप मिश्र 
अयोध्या। हिंदू धर्म में कृष्ण जन्माष्टमी का तो महत्व है ही, लेकिन अगर इस दिन दान-पुण्य किया जाए, तो उसका फल भी कई गुना मिलता है। श्रीमद्भागवत कथा के मुताबिक, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के उपासक धूमधाम से लड्डू गोपाल का जन्मोत्सव मानते हैं।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक, इस दिन कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत भी रखा जाता है और श्रीकृष्ण की विधि विधान पूर्वक पूजा आराधना की जाती है। मान्यता है कि इस दिन विधि पूर्वक की गई पूजा आराधना से तमाम तरह के कष्ट दूर होते हैं और सुख समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, कृष्ण जन्माष्टमी के दिन दान करने का भी विधान ह। अगर आप भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन बांके बिहारी लाल का आशीर्वाद पाना चाहते हैं तो फिर अपनी राशि के अनुसार इन चीजों का दान अवश्य करें।
अयोध्या के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित कल्कि राम बताते हैं कि जन्माष्टमी के दिन सनातन धर्म को मानने वाले लोग भगवान कृष्ण की विधि विधान पूर्वक पूजा आराधना करते हैं और अपनी समस्त मनोकामना की सिद्धि के लिए उपाय भी करते हैं। अगर जातक राशि के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी के दिन दान करते हैं तो उन्हें लड्डू गोपाल का भरपुर आशीर्वाद प्राप्त होता है।
मेष राशि: इस राशि के जातक को जन्माष्टमी के दिन गेहूं और गुड़ का दान करना चाहिए।
वृषभ राशि: इस राशि के जातक को जन्माष्टमी के दिन माखन, मिश्री और चीनी का दान करना चाहिए।
मिथुन राशि: इस राशि के जातक को जन्माष्टमी पर अन्न का दान करना चाहिए।
कर्क राशि : जन्माष्टमी पर इस राशि के जातक दूध, दही, चावल और मिठाई का दान करें।
सिंह राशि: इस राशि के जातक को कान्हा का आशीर्वाद पाने के लिए गुड़, शहद और मसूर की दाल का दान करना चाहिए।
कन्या राशि: इस राशि के जातक को लड्डू गोपाल के जन्मदिन पर गौ माता की सेवा करनी चाहिए।
तुला राशि: इस राशि के जातक को श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए श्वेत और नीले रंग के वस्त्र का दान करना चाहिए।
वृश्चिक राशि: इस राशि के जातक को कन्हैया के जन्मदिन पर गेहूं, गुड़ और शहद का दान करना चाहिए।
धनु राशि: इस राशि के जातक को श्रीकृष्ण के जन्मदिन पर अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार गीता का दान करना चाहिए।
मकर राशि: इस राशि के जातक को गरीबों के मध्य नीले रंग का वस्त्र दान करना चाहिए।
कुंभ राशि: इस राशि के जातक को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर धन का दान करना चाहिए‌। कृपा मिलेगी।
मीन राशि: इस राशि के जातक को कान्हा के अवतरण दिवस पर केले, बेसन के लड्डू, मिश्री, माखन आदि का दान करना चाहिए।

मंगलवार, 5 सितंबर 2023

6 सितंबर को जन्माष्टमी व्रत रखना शुभ होगा

6 सितंबर को जन्माष्टमी व्रत रखना शुभ होगा 

सरस्वती उपाध्याय 
हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। माना जाता है कि श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। लेकिन इस साल रक्षाबंधन की तरह जन्माष्टमी की तिथि को लेकर भी लोगों में बड़ा असमंजस का पेंच फस गया है। तो आइए जानते हैं जन्माष्टमी का सही डेट।
हिन्दू कैलेंडर के अनुसार अधिकमास या मल मास का है। यहीं वजह है कि इस साल आने वाले अधिकतर त्योहार दो दिन मनाए जाएंगे। सावन दो महीने तक चला, रक्षाबंधन का त्योहार दो दिन मनाया गया और आने वाले भगवान श्री कृष्ण का जन्म उत्सव जनमाष्टमी का त्योहार भी 6 और 7 सितंबर, दो दिन मनाया जाएगा। मान्यता है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखने से भक्तों की हर मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 6 सितंबर को दोपहर 03.37 बजे आरंभ होगी और 7 सितंबर शाम 04.14 बजे इसका समापन होगा। गृहस्थ जीवन वालों के लिए 6 सितंबर 2023 को जन्माष्टमी व्रत रखना शुभ माना जाएगा। वैष्णव संप्रदाय को मानने वाले लोग कान्हा का जन्मोत्सव 7 सितंबर 2023 को मनाएंगे। ज्योतिषियों के अनुसार इस साल जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का संयोग भी बन रहा है। रोहिणी नक्षत्र 6 सितंबर को सुबह 09.20 बजे से 7 सितंबर को सुबह 10.25 बजे तक रहेगा।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर 4 शुभ योग
सर्वार्थ सिद्धि योग- जन्माष्टमी पर पूरे दिन रहेगा।
रवि योग- 6 सितंबर को सुबह 06 बजकर 01 मिनट से सुबह 09 बजकर 20 मिनट तक।
बुधादित्य योग- जन्माष्टमी पर पूरे दिन रहेगा।
रोहिणी नक्षत्र- 6 सितंबर को सुबह 09 बजकर 20 मिनट से 7 सितंबर को सुबह 10 बजकर 25 मिनट तक।

मंगलवार, 29 अगस्त 2023

30-31 अगस्त, 2 दिन मनाईं जाएगी रक्षाबंधन

30-31 अगस्त, 2 दिन मनाईं जाएगी रक्षाबंधन  

सरस्वती उपाध्याय   
रक्षाबंधन का त्योहार आते ही भाई-बहनों के चेहरे पर खुशी खील उठती है। यह त्योहार आते ही बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधने के लिए सुंदर-सुंदर राखियां बाजार से खरीद लाती हैं और भाई के कलाई पर राक्षासूत्र बांधती हैं। हर वर्ष यह पर्व सावन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।इस दिन भाई भी उन्हें उनके लिए उपहार की खरीदारी में जुट जाते हैं।
इस बार रक्षाबंधन की तारीख को लेकर  असमंजस की स्थिति बनी हुई है। 30 और 31 दो तारीखों को लेकर उलझन की स्थिति बनी हुई है। पवित्र त्योहार रक्षाबंधन कुछ जगहों पर 30 अगस्त को मनाया जाएगा तो कुछ जगहों पर 31 अगस्त को। 30 अगस्त को भद्रा काल रात 9 बजे समाप्त हो रही है इसलिए 31 अगस्त को यह पर्व शुभ मुहूर्त में मनाया जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र में गरीबी दूर करने के लिए रक्षाबंधन पर किए जाने वाले कुछ विशेष उपाय बताए गए हैं। तो आइए जानते हैं रक्षाबंधन के दिन किए जाने वाले इन ज्योतिषीय उपायों के बारे में...
ग्रह देंगे शुभ प्रभाव
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रक्षाबंधन पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है और इस दिन का संबंध माता लक्ष्मी और चंद्रदेव से है। इस दिन भाई-बहन भगवान भोलेनाथ और माता लक्ष्मी की पूजा करें और शाम के समय चंद्रमा को जल में दूध और अक्षत मिलाकर अर्घ्य दें। ऐसा करने से ग्रहों का शुभ प्रभाव प्राप्त होगा और जीवन में तरक्की के मार्ग बनेंगे।
गरीबी होगी दूर
गरीबी दूर करने के लिए रक्षाबंधन के दिन बहन के हाथ से गुलाबी कपड़े में चावल, एक रुपया और एक सुपारी लेकर बांध लें। इसके बाद बहन भाई को राखी बांधें और फिर भाई बहन को वस्त्र, सफेद मिठाई और रुपए देकर चरण स्पर्श करें। फिर गुलाबी कपड़े में रखे सामान को उत्तर दिशा में रख दें। ऐसा करने से आर्थिक परेशानियों से छुटकारा मिलता है और धन धान्य की कमी नहीं होती।
विघ्न होंगे दूर
बहनें जब भाई को राखी बांधें, तब पूजा की थाली में फिटकरी भी रख लें। राखी बांधने के बाद फिटकरी को भाई के सिर से लेकर पैर तक सात बार उल्टी दिशा में वारकर चौराहे या चूल्हे की आग में फेंक दें, ऐसा करने से बुरी शक्तियां दूर रहती हैं और आसपास सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है। 
धन धान्य में होती है वृद्धि
रक्षाबंधन के दिन लाल रंग के मिट्टी के घड़े को लाल कपड़े से ढककर एक नारियल रख दें और फिर भाई राखी बंधवाकर इस घड़े को झोली बनाकर बहते जल में प्रवाहित करें। फिर साथ में भाई-बहन गणेशजी की पूजा अर्चना करें। ऐसा करने से सभी विघ्न दूर होते हैं और भाई-बहन के बीच प्रेम बना रहता है। साथ ही घर में धन धान्य की कमी नहीं होती और गणेशजी के आशीर्वाद से नौकरी व व्यवसाय उन्नति होती है।

बुधवार, 23 अगस्त 2023

27 अगस्त को मनाई जाएगी 'पुत्रदा एकादशी'

27 अगस्त को मनाई जाएगी 'पुत्रदा एकादशी' 

सरस्वती उपाध्याय    

सनातन धर्म में एकादशी का बड़ा महत्व है। पुत्रदा एकादशी व्रत सावन महीने की शुक्ल-पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। शास्त्रों में इस एकादशी का बड़ा ही महत्व बताया गया है। इसे पवित्रा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पुत्रदा एकादशी साल में दो बार आती है। एक सावन महीने के शुक्ल पक्ष में और दूसरा पौष मास के शुक्ल पक्ष में। इस बार सावन की पुत्रदा एकादशी 27 अगस्त यानि रविवार के दिन मनाई जाएगी।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से निसंतान दंपतियों को सुख मिलता है। इस व्रत को भी संतान की लंबी आयु और सुखद जीवन के लिए किया जाता है। बता दें कि सालभर में कुल 24 एकादशियां होती है, लेकिन जब अधिकमास या मलमास आता है, तो इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। 

शुभ मुहूर्त और पारण का समय

  • शुक्ल एकादशी तिथि आरंभ- 27 अगस्त 2023 को प्रात 12 बजकर 08 मिनट पर
  • शुक्ल एकादशी तिथि समापन - 27 अगस्त 2023 को रात 9 बजकर 32 मिनट पर
  • पुत्रदा एकादशी व्रत तिथि- 27 अगस्त 2023
  • एकादशी व्रत पारण समय - 28 अगस्त 2023 को सुबह 5 बजकर 57 मिनट से सुबह 8 बजकर 31तक

महत्व
पुत्रदा एकादशी का व्रत केवल पुत्र से नहीं है, बल्कि संतान से है। संतान पुत्र भी हो सकता है और पुत्री भी। मान्यताओं के अनुसार एकादशी का व्रत जरूर करना चाहिए। इसके आलावा जो व्यक्ति ऐश्वर्य, संतति, स्वर्ग, मोक्ष, सब कुछ पाना चाहता है, उसे यह व्रत करना चाहिए। वहीं जो लोग संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं या जिनकी पहले से संतान है और वे अपने बच्चे का सुनहरा भविष्य चाहते हैं, जीवन में उनकी खूब तरक्की चाहते हैं, उन लोगों के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत किसी वरदान से कम नहीं है। पुत्रदा एकादशी का व्रत करने से संतान सुख बढ़ता है।

शनिवार, 8 जुलाई 2023

रुद्राभिषेक: 15 को मनाईं जाएगी 'महाशिवरात्रि' 

15 जुलाई को सावन शिवरात्रि, जानिए महत्व 


सरस्वती उपाध्याय 

10 जुलाई को सावन का पहला सोमवार पड़ रहा है। 59 दिनों के इस सावन महिने में शश योग, गजकेसरी योग, बुध व शुक्र के संयोग से लक्ष्मी नारायण योग और सूर्य व बुध की युति से बुधादित्य राजयोग का निर्माण होगा। वही, 15 जुलाई शनिवार को सावन शिवरात्रि है। इस दिन 2 बड़े ही दुर्लभ संयोग बन रहे है, जिसका कई जातकों को बहुत ही शुभ फल मिलेगा।

कहते है, सावन शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने पर विशेष फल प्राप्त होता है।


मासिक शिवरात्रि पर बनेंगे 2 योग

पंचांग के अनुसार,  सावन की शिवरात्रि कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन पड़ती है, इस साल 15 जुलाई 2023, शनिवार के दिन चतुर्दशी तिथि पड़ेगी,चतुर्दशी तिथि को त 8:32 बजे चतुर्दशी तिथि का आरंभ हो जाएगा और 16 जुलाई रात 10:08 बजे इसका इस बार सावन शिवरात्रि पर दो शुभ योग बन रहे हैं, जिसमें वृद्धि और ध्रुव योग शामिल हैं। वही इस दिन मृगशिरा नक्षत्र भी बन रहा है। इस दौरान भोलेनाथ की पूजा करना बेहद फलदायी होगा।इसका लाभ कुंभ, मीन, कर्क वृश्चिक राशि के जातकों के लिए बहुत ही फलदायी होगा।

पंचांग के अनुसार, सावन शिवरात्रि के दिन शनि प्रदोष का होना बहुत अद्भुत संयोग है। संतान प्राप्ति की कामना और शनि दोष से मुक्ति के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण तिथि है। इस दिन व्रत करने और भगवान शिव और शनिदेव की पूजा र्चना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और शनि का प्रभाव यानी साढ़ेसाती, ढैय्या और शनि महादशा के दुष्प्रभावों में कमी आती है। इस पूरे सावन में 8 सोमवार व्रत और 4 एकादशी पड़ेगी।वही 18 जुलाई से लेकर 16 अगस्त तक सावन अधिकमास या मलमास रहेगा। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।


राशि के अनुसार करें ऐसे पूजा


मेष राशि के जातक जल में चंदन, गुड़हल फूल और गुड़ मिलाकर शिव का अभिषेक करें। वृषभ राशि के जातक गाय के दूध से महादेव का अभिषेक करें। मिथुन राशि के जातक जल में दही मिलाकर भगवान शिव का अभिषेक करें।

कर्क राशि के जातक आशीर्वाद पाने के लिए गाय के दूध में भांग मिलाकर महादेव का अभिषेक करें। चंदन और पुष्प अर्पित करें।सिंह राशि के जातक जल में लाल पुष्प अर्पित कर भगवान शिव का अभिषेक करें। कन्या राशि के जातक गन्ने के रस में काले तिल मिलाकर महादेव का अभिषेक करें। भगवान शिव को भांग, धतूरा, मदार के फूल अर्पित करें।

तुला राशि के जातक भगवान शिव का आशीर्वाद पाने हेतु सावन शिवरात्रि पर गाय के दूध में मिश्री डालकर भगवान शिव का अभिषेक करें। महादेव को चंदन, अखंडित चावल और दूध अर्पित करें। वृश्चिक राशि के जातक सावन शिवरात्रि पर जल में बेलपत्र, शहद और सुगंध मिलाकर महादेव का अभिषेक करें।

धनु राशि के जातक भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए जल में केसर मिलाकर महादेव का अभिषेक करें। साथ ही केसर मिश्रित खीर भोग में अर्पित करें। मकर राशि के जातक भगवान शिव की विधिवत पूजा करें। पूजा के दौरान भगवान शिव को भांग, धतूरा, बेलपत्र आदि चीजें अर्पित करें।

कुंभ राशि के जातक गन्ने के रस में शहद और सुगंध मिलाकर अभिषेक करें। साथ ही शिव चालीसा का पाठ शिव मंत्र का जाप करें।मीन राशि के जातक सावन शिवरात्रि पर गन्ने के रस में केसर मिलाकर भगवान शिव का अभिषेक करें। पूजा के समय सभी जातक ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें।

शिवरात्रि पर करें ये खास उपाय, मिलेगा लाभ

धन की प्राप्ति के लिए दूध, दही, शहद, शक्कर और घी से भगवान शिव का अभिषेक करें और फिर जल धारा अर्पित कर प्रार्थना करें। संतान के लिए शिव लिंग पर घी अर्पित कर जल की धारा अर्पित करें और प्रार्थना करें ।विवाह के लिए शिवलिंग पर 108 बेल पत्र अर्पित करें और हर बेल पत्र के साथ “नमः शिवाय” का जाप करें।


सावन शिवरात्रि 15 जुलाई 2023 दिन शनिवार

त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ – 14 जुलाई, शाम 7 बजकर 18 मिनट से

त्रयोदशी तिथि का समापन – 15 जुलाई, रात 8 बजकर 33 मिनट तक

चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ – 15 जुलाई, रात 8 बजकर 33 मिनट से

चतुर्दशी तिथि का समापन – 16 जुलाई, रात 10 बजकर 9 मिनट तक।

स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है 'गन्ने का रस'

स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है 'गन्ने का रस'  सरस्वती उपाध्याय  चिलचिलाती गर्मी के मौसम में सभी को ठंडा रहने के लिए शरीर को ठंडक ...