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शनिवार, 29 मई 2021

कांग्रेस और राहुल 'समसामयिक'

कॉंग्रेस और राहुल   'समसामयिक'
बैक फुट की जगह अब फ्रंट फुट पर दिखाई देने लगे !
 2014 के बाद 7 साल में यदि राजनीतिक परिपेक्ष में कॉन्ग्रेस और राहुल गांधी का राजनीतिक विश्लेषण करें तो, दोनों का ज्यादातर समय बैकफुट पर खेलते हुए दिखाई दिया। ऐसा भी नहीं था कि राहुल गांधी और कांग्रेस ठीक से नहीं खेलें। उन्होंने 7 सालों में कई बार चौके और छक्के भी मारे। लेकिन वह या तो रन आउट  होते हुए दिखाई दिए या फिर केंद्र की सत्ताधारी भाजपा सरकार के नेताओं ने उन्हें कैच आउट कर दीया।
 नोटबंदी, जीएसटी, राफेल सौदा, भारत-चीन तनाव, समान नागरिकता बिल, तीन कृषि बिल जैसे मुद्दों को लेकर राहुल गांधी ने खूब चौके छक्के मारे। लेकिन वह या तो रन आउट हुए या फिर सरकार में बैठे नेताओं ने  कैच लपक कर आउट कर दिया।
लेकिन कोविड-19 एक ऐसा मैच बनकर आया, जिसमें राहुल गांधी खूब चौके छक्के मार रहे हैं। सत्ताधारी भाजपा ना तो राहुल गांधी को रन आउट कर पा रही है और ना ही उनका कैच लपक पा रही है। बल्कि, भाजपा सरकार ही राहुल गांधी को जमकर खेलने का मौका दे रही है ? कोविड-19 के आगमन से लेकर अभी तक राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार को कोरोना महामारी के  बढ़ते प्रकोप को लेकर निरंतर आगाहा करते आ रहे हैं और बीमारी से किस प्रकार से निपटा जाए इसके लिए वह सुझाव भी दे रहे हैं। मगर भाजपा सरकार में बैठे नेता ना केवल राहुल गांधी के सुझाव को दरकिनार कर रहे हैं। बल्कि राहुल गांधी का मजाक भी बनाते हुए दिखाई दिए। 
मौजूदा वक्त में राहुल गांधी अच्छी बैटिंग इसलिए भी कर रहे हैं। क्योंकि दूसरे छोर पर श्रीमती प्रियंका गांधी  राहुल गांधी का मजबूती के साथ खड़े होकर साथ दे रही हैं।
 राहुल गांधी रन आउट और कैच आउट इसलिए भी हो जाते थे क्योंकि नोटबंदी को यदि छोड़ दे तो, भाजपा सरकार ने अन्य जिन योजनाओं पर काम कर लागू किया है। वह योजनाएं कांग्रेस शासन के समय से अटकी पड़ी हुई थी। उन्हें भाजपा ने सत्ता में आकर लागू किया, जिसमें जीएसटी, एफडीआई, समान नागरिकता बिल, कृषि कानून, धारा 370 और राफेल विमान सौदा जैसे अनेक योजनाएं थी जो लंबित पड़ी हुई थी। जिन्हें भाजपा ने सत्ता में आकर लागू किया।
जब कॉन्ग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी इन योजनाओं का विरोध करते थे या हैं तो भाजपा के नेता इन योजनाओं को कांग्रेस शासन काल की लंबित योजनाएं बताकर कांग्रेस और राहुल गांधी को चुप करा दिया करते थे। और कांग्रेस बैकफुट पर आ जाया करती है। लेकिन कोरोना महामारी ने कांग्रेस और राहुल गांधी को फ्रंट फुट पर खेलने का मौका दे दिया है। भाजपा के नेताओं के पास इसका तोड़ अभी तक नजर नहीं आ रहा है। जबकि कांग्रेस के पास कहने के लिए और भाजपा सरकार का विरोध करने के लिए बहुत कुछ है। क्योंकि देश में आजादी के बाद बीमारियां और महामारी पहले भी आए हैं। तब सीमित संसाधन और सीमित धन होने के बाद भी कांग्रेस सरकार ने बीमारियों और महामारियो का जमकर मुकाबला किया और जनता को मुफ्त में दवाइयां और मुफ्त टी के भी लगवाए थे।
 28 मई शुक्रवार को राहुल गांधी ने एक बार फिर से प्रेस वार्ता की और सरकार को सुझाव देकर घेरा भी, लेकिन पूर्व की तरह शुक्रवार को भी भाजापा के बड़े नेता राहुल गांधी की काट के लिए पत्रकारों के सामने आए।
कोविड-19 में राहुल गांधी के द्वारा भाजपा सरकार के खिलाफ उठाए गए मुद्दे और सरकार को दिए गए सुझाव इस समय जनता के दिलों दिमाग में छा गए हैं। जनता को लगने लगा है कि राहुल गांधी ठीक कह रहे हैं। लेकिन सरकार मान नहीं रही है, भाजपा के रणनीतिकार ही क्या राहुल गांधी को राजनीतिक ताकत दे रहे हैं। यह बड़ा सवाल है ? राहुल गांधी इस समय पूर्ण कालीन राजनीति भी करते हुए दिखाई दे रहे हैं। जबकि उन पर पहले आरोप लगता था कि राहुल गांधी अवसर देखकर राजनीति करते हैं। क्योंकि राहुल गांधी कई मौकों पर देश से नदारद हो जाते थे।
 देवेंद्र यादव 

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

किसान: खेत से सड़क पर आ गए

ज़ाकिर घुरसेना/कैलाश यादव

पिछले 6 से 7 सप्ताह से चल रहे किसान आंदोलन रुकने का नाम नहीं ले रहा है। उनकी सिर्फ एक ही मांग है कि तीनों कृषि कानून को वापस लो। सरकार भी इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर कानून वापसी की बात छोड़कर हर बात मानने तैयार है। लेकिन पेंच फंस गया इसी बात पर । आखिर में सुप्रीमकोर्ट को दखल देना पड़ा,चार सदस्यों की कमेटी को कानून की समीक्षा करने को कहा। इससे किसान भड़क गए एवं वे चार सदस्यों की निष्पक्षता पर ही सवाल उठाने लगे। जनता में खुसुर-फुसुर है कि दिल्ली बार्डर में सिर्फ हरियाणा, पंजाब के किसानों की संख्या को देखकर ये अंदाजा न लगाया जाए कि कानून से केवल इन्हें तकलीफ है, जबकि वास्तविकता ये है कि इससे पूरे देश के किसान चिंता जाहिर कर चुके है। अब सरकार को हठ छोड़कर इनकी मांगों पर गंभीरता से विचार कर उनके हक में फैसला देना चाहिए।

बाबा भारती की याद आ गई:- पिछले दिनों बाबा भारती और डाकू खड़कसिंह की याद ताजा हो गई। दरअसल हुआ ये कि लिफ्ट मांग कर दो युवकों ने तीसरे युवक की बाइक और मोबाइल छीन कर भाग गए। ये तो नेकी कर और जूते खा वाली बात हो गई। जनता में खुसुर-फुसुर है कि वो बात अलग थी कि बाबा भारती ने डाकू खड़कसिंह से कहा कि इस घटना की जिक्र कही भी मत करना वर्ना भरोसा उठ जाएगा। यहां बाबा भारती की जगह पुलिस है क्या एक्शन होगा जनता को मालूम है।

बघेल जी को चापड़ा चटनी खिलाया कि नहीं:- पिछले दिनों छग के कैबिनेट मंत्री कवासी लखमा ने कहा कि बस्तर में कोरोना से एक भी मौत नहीं हुई है, और कोरोना की रामबाण दवा है चापड़ा चटनी। उन्होंने बताया कि ये कोई जनप्रतिनिधि या मैं नहीं बल्कि उड़ीसा हाई कोर्ट ने कहा है। लखमा ने कहा कि बस्तर में लाल चीटी का चापड़ा चटनी चाव से खाया जाता है। यही वजह है कि बस्तर में कोरोना नहीं फैला। जनता में खुसुर-फुसुर है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बस्तर दौरे पर थे और लोग जानना चाहते है कि लखमा ने भूपेश बघेल को चापड़ा चटनी खिलाया कि नहीं। लोगों ने यह सुझाव दिया कि छत्तीसगढ़ में चापड़ा चटनी सेंटर भी खोल दिया जाए।

कांग्रेसी जासूसी भी करते हैं :- बात यह है कि भाजपा अध्यक्ष विष्णुदेव साय 100 क्विंटल धान बेचे हैं, और उनके खाते में एक लाख 86 हजार रुपए आ गए हैं। ऐसी जानकारी कांग्रेस प्रवक्ता ने दी है। कांग्रेसी राजनीति के साथ-साथ अब भाजपाइयों की जासूसी भी करने लग गए हैं। जनता में खुसुर-फुसुर है कि कांग्रेसियों की राजनीति नहीं चलने पर कम से कम देश के खुफिया विभाग में सेवा तो ली जा सकती है।

तंज कसना भारी पड़ गया:- पिछले दिनों भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने तंज कसते हुए कहा था कि गोबर को राजकीय चिन्ह बना दिया जाये। अब केंद्र सरकार द्वारा गोबर के पेंट की लांचिंग पर भूपेश बघेल गदगद हैं और विधायक जी को बोल रहे हैं कि गोबर उन्हीं के मुँह पर पड़ा। जनता में खुसुर फुसुर है कि धान से एथेनॉल बनाने का प्रोजेक्ट हो या गोबर खरीदी योजना दोनों छत्तीसगढ़ का प्रोजेक्ट है। ख़ुशी की बात है कि चलिए केंद्र ने यहाँ की योजनाओं का अनुसरण कर छत्तीसगढिय़ो का मान तो बढ़ाया।

छजकां की सत्ता में आदिवासी मुख्यमंत्री:- पिछले दिनों जनता कांग्रेस के मीडिया प्रमुख इकबाल अहमद रिजवी का बयान आया कि छत्तीसगढ़ में जनता कांग्रेस की सत्ता आएगी तो मुख्यमंत्री आदिवासी ही होगा। जनता में खुसुर-फुसुर है कि छजकां अगर सत्ता में आई तो आदिवासी मुख्यमंत्री नकली आदिवासी बनेगा या असली आदिवासी बनेगा, ये भी बताते जाएं। बहरहाल सत्ता तो दूर है कम से कम छजकां के मुख्य पदों पर ही आदिवासियों को बैठाकर शुरूआत तो कीजिए, पूछती है जनता।

लगता है जनता नासमझ है:- कांग्रेसी किसानों के लिए धरना प्रदर्शन कर भाजपा और केंद्र सरकार पर किसानों की हालात को लकेर दोष मढ़ रही है, दूसरी तरफ भाजपाई भी किसानों के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। धरना प्रदर्शन कर रहे है। कांग्रेस वाले बोल रहे हैं केंद्र सरकार बारदाना दे ,भाजपाई बोल रहे हैं भूपेश सरकार बारदाना दे , समझ में नहीं आ रहा कि बारदाना आखिर है कहाँ। जनता में खुसुर-फुसर है कि समझ में नहीं आ रहा है कि हो क्या रहा है। लगता है जनता को नेता लोग ना समझ मान लिए है।

आईटीओ से लाल किले तक ‘तिरंगा यात्रा’ निकाली

अकांशु उपाध्याय      नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 71वें जन्मदिन पर शुक्रवार को सामाजिक संगठनों ने राष्ट्रीय राजधानी में आईटीओ से ...