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सोमवार, 20 नवंबर 2023

'तेरी ही मुहब्बत मिले' कविता

'तेरी ही मुहब्बत मिले'   कविता 

हर जनम में तेरी ही मुहब्बत मिले
तेरा किंकर रहूँ तेरी खिदमत मिले

रास्ता है कठिन है और लम्बा सफर ,
धूप को छाँव के जैसी चाहत मिले

दुनियाँ में जिस तरफ जाए प्यासी नजर,
उस तरफ बस तेरी ही नजाकत मिले।
गम के माहौल में तेरी मुस्कान से
तेरे महबूब के दिल को राहत तेरा

आँखों में तन्हाइयाँ जब भी दिखें मुझे,
तब तेरी आँखों में ही शराफत मिले।

जब हँसी वादियाँ मुझसे मुंह मोड़ लें,
तब तेरे ही गुलिस्ताँ में दावत मिले।

ठोकरें जब जमाने की खाये सुधीर,
तेरी मूरत की ही तब इनायत मिले।
कृति:- सुधीर यादव

शनिवार, 24 जून 2023

गौ माता की पुकार   'कविता'

गौ माता की पुकार   'कविता'


मेरे ग्वाले आ भी जा अब,

देख क्या हो गई मेरी दशा ?

कुछ कंस मानुषों ने मेरी,

कर रखी बड़ी दुर्दशा।


दुग्ध दूह कर छोड़ देते,

ये मुझे राह पर।

असहाय और लाचार,

मैं भटक रही बाजार पर।


बहुत अपमान कान्हा मुझे,

इस सृष्टि पर मिल रहा।

किसको सुनाऊँ अपनी व्यथा ?

है कौन मेरा तेरे सिवा ?


मेरे नाम का नारा लगा कर,

ढोंग रचते हैं सभी।

जरा देख अपनी दृष्टि से,

सड़क पर हूँ मैं पड़ी।


माँ का हृदय है मेरा,

नहीं दे सकती हूँ मैं बददुआ।

नहीं कह पा रही व्यथा,

बहुत हो गई दुर्दशा।


सुन मेरे ग्वाले,

तूही देना अब इन्हें सजा।


विनीता भट्ट

रविवार, 14 मई 2023

मां प्रकृति ‌  'कविता'

मां प्रकृति ‌  'कविता'


मां के बारे में क्या लिखूं ? जिसने मुझे खुद लिखा है


वंदना गुप्ता

मां की एक दुआ जिंदगी बना देगी, 

खुद रोएगी मगर, तुम्हें हंसा देगी। 

कभी भूल कर भी ना मां को रुलाना, 

एक छोटी-सी गलती पूरा अर्थ हिला देगी। 

मां ने होती तो वफा कौन करेगा ?

ममता का हक भी कौन अदा करेगा ? 

रब हर एक मां को सलामत रखना, 

वरना हमारे लिए दुआ कौन करेगा ? 

आंख खोलो तो चेहरा मेरी मां का हो, 

आंख बंद हो तो सपना मेरी मां का हो। 

मैं मर भी जाऊं तो भी कोई गम नहीं, 

लेकिन कफन मिले तो दुपट्टा मेरी मां का हो। 

सब कुछ मिल जाता है दुनिया में,

मगर याद रखना कि बस मां-बाप नहीं मिलते।

मुरझा कर जो गिर गया एक बार डाली से, 

यह ऐसे फूल है, जो फिर नहीं खिलते।

मैं हार भी जाऊं तो मां मुस्कुराते हुए गले लगाती है, 

ना जाने इतनी मोहब्बत मां कैसे कर पाती है ?

मां की एक दुआ जिंदगी बना देती है, 

क्योंकि मां-मां होती है।

मां के बिना जीवन की उम्मीद नहीं की जा सकती,

अगर मां न होती तो हमारा अस्तित्व ही ना होता,

मां... प्रकृति भी है इस संसार की,

जिसका बेटा कोई अच्छा, कोई खोता।

इस दुनिया में मां दुनिया का 

सबसे आसान शब्द है,

मगर इस नाम में भगवान खुद वास करते है। 

मां शब्द छोटा जरूर है,

जिसके जरिए पूरे विश्व में गाय-भैंस घास करते हैं।

मां शब्द पूरी दुनिया पर भारी है,

इस नाम के ऊपर तो हर जगह मारामारी है।

जब नवजात शिशु इस दुनिया में आता है,

ना वो पानी पी सकता,

ना खाना खा पाता है।

सबसे ज्यादा खुशी नवजात की मां को होती है, 

उसके लिए तो उसकी हजारों औलादें भी,

एक लोटी दिखती है।

जैसे मानो की दुनिया की सबसे कीमती चीज उन्हें मिल गई हो,

मां अपने बच्चो के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहती है।

मनुष्य में ही नहीं,

हर प्रकार के जीव जंतु में यही होता है... मां का प्यार। 

अगर बच्चों पर आंच आने वाली होती है,

तो मां सबसे पहले आगे खड़ी होती है।

मां की जगह कोई नहीं ले सकता,

मां तो मां होती है।

रविवार, 8 मई 2022

आई लव माई मदर 'कविता'

आई लव माई मदर    'कविता'  

न तो मां का प्यार मिला,
न वो बाप के प्यार का फूल खिला।
लुट गई मेरी मिन्नतें,
फिर भी बच गई कुछ हसरतें।

बचपन में मर गई मेरी मां,
मर गया मेरा बाप।
मिटी हुईं हस्तियों में, 
आपो ही आप।

कड़ी धूप में तपता रहा हूं मैं,
बूंद-बूंद कर रिश्ता रहा हूं मैं।
ए दोस्त, कौन सा मौसम है ऐसा, 
जिससे बचता रहा हूं मैं।

अब कोई दोस्त बाकी नहीं रहा,
जो कुछ खाली था, वो भी नहीं बचा।

बस एक इस लिहाज से, 
फरिश्ता है।
मेरे जो दिल के पास है,
वो मेरी मां का रिश्ता है।

कृति- चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

बुधवार, 16 मार्च 2022

पलछिन्न 'कविता'

पलछिन्न     'कविता'   

गिरा गुलाल हैं, खिला अबीर।
रंगों से रंग मिलें हैं, बन गई हैं तकदीर।
छटक-छटक और मटक-मटक
रंग भरें बन गई एक तस्वीर।
चार रंग से काया बनाईं, बन गए उसके अधीर।
राधा गोरी,मैं क्यूं काला, तेरे रंग अनेक।
प्रेम का रंग सदा सजीला,  
रात में भी रहे उजाला।
हल्दी का रंग चढ़ा, मीत तेरे बिन,
ना पूरब, ना पश्चिम।
हाथों में जब हाथ तेरा हो,
ना पवन, ना जल, ना हिम।
पलछिन्न...पलछिन्न... पलछिन्न।
होली शा, रा, रा, रा। 
चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

वृंदावन की लट्ठमार होली 'कविता'

वृंदावन की लट्ठमार होली      'कविता'

फूल खिले हैं पलास के,
केसरिया और रंग लाल।
खूब डुबोकर भिगा दिए,
बना दिया गुलाल।

फाग खेलकर थक गए,
तीन रंग का चैत्र करें निढाल।
गोरी-गोरी बाहें, 
'गौरी' के गाल लाल-लाल।

होरी खेरे सखा संग नंदलाल,
होरे शा, रा, रा, रा, 
होरे शा, रा, रा, रा।
चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

लट्ठमार होली की हार्दिक शुभकामनाएं।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

सरस संग्रह-8 'धर्म'

सारा-सारा दिन काम करो, 
दिन में बस एक नेक काम करो,
कर्मकांड, कर्तव्य, कर्म करो,
आठों पहर में घड़ी अनुदान करो।

              जियो अपने ढंग से,
बहो सब के संग में,
              जियो और जीने दो,
सबपे ये करम करो।

किसी का भाग ना खाओ, 
               असह को ना सताओ,
लूट-मार क्यों करें, 
          अपने आप से ही शरों।
 
बल का सदुपयोग करो,
                वेदना मयी योग करो,
सृष्टि के कल्याण करो, 
                नाभंग निज कर्म करो।

अपनी भी हो आरती, 
              कृष्ण-सा हों सारथी, 
इस मानव जीवन को, 
              ना व्यर्थ नाकाम करो। 

जी-मदिरा भक्षण को, 
               बंद करों आरक्षण को,
सोचों त्रयक्षण को,
               प्रतिपल नाम करो।

तृप्ति किसी को दे दो,
                 बदले में नेकी ले लो, 
धन में ना हो उन्मुक्त, 
                धैर्य मन विश्राम करो।

मन से मानवता का, 
                नीच से भीरता का, 
अर से आचरण का, 
                बस एक सकाम करो।


चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

पुष्प कंटकों में खिलते हैं, दीप अंधेरों में जलते हैं...

पुष्प कंटकों में खिलते हैं, 
दीप अंधेरों में जलते हैं। 
आज नहीं, प्रह्लाद युगों से, 
पीड़ाओं में ही पलते हैं।
दीप अंधेरों में जलते हैं।...
किन्तु यातनाओं के बल पर, 
नहीं भावनाएँ रूकती हैं।
चिता होलिका की जलती है, 
अन्याय करने पर ही सजा झेलते है।
दीप अंधेरों में ही जलते हैं।....
सही रास्ते पर ही सच्चे आदमी चलते हैंं, 
गरीब-असहायों को पानी पिलाते हैं। 
अपने जीवन का त्याग कर देते हैं, 
बदले में ना कुछ लेते हैं।
दीप अंधेरों में ही जलते हैं।...
 चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

आओ फिर से दीप जलाएं 'कविता'

आओ फिर से दीप जलाएँ...
भरी दुपहरी में अंधियारा,
सूरज परछाई से हारा।
अंतरतम का नेह निचोड़ें...
बुझी हुई बाती सुलगाएँ,
आओ फिर से दीप जलाएँ।

हम पड़ाव को समझे मंज़िल,
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल।
वतर्मान के मोहजाल में...
आने वाला कल न भुलाएँ,
आओ फिर से दीप जलाएँ।

आहुति बाकी, यज्ञ अधूरा,
अपनों के विघ्नों ने घेरा।
अंतिम जय का वज़्र बनाने...
पुनः दधीचि हड्डियां गलाएँ,
आओ फिर से दीप जलाएँ।
शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

'बुंदेलखंड' को निवेश का नया गंतव्य बनाया

'बुंदेलखंड' को निवेश का नया गंतव्य बनाया  संदीप मिश्र  लखनऊ। कभी पिछड़े क्षेत्र के रूप में पहचान रखने वाले बुंदेलखंड को योगी सरकार न...