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रविवार, 8 मई 2022

आई लव माई मदर 'कविता'

आई लव माई मदर    'कविता'  

न तो मां का प्यार मिला,
न वो बाप के प्यार का फूल खिला।
लुट गई मेरी मिन्नतें,
फिर भी बच गई कुछ हसरतें।

बचपन में मर गई मेरी मां,
मर गया मेरा बाप।
मिटी हुईं हस्तियों में, 
आपो ही आप।

कड़ी धूप में तपता रहा हूं मैं,
बूंद-बूंद कर रिश्ता रहा हूं मैं।
ए दोस्त, कौन सा मौसम है ऐसा, 
जिससे बचता रहा हूं मैं।

अब कोई दोस्त बाकी नहीं रहा,
जो कुछ खाली था, वो भी नहीं बचा।

बस एक इस लिहाज से, 
फरिश्ता है।
मेरे जो दिल के पास है,
वो मेरी मां का रिश्ता है।

कृति- चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

बुधवार, 16 मार्च 2022

पलछिन्न 'कविता'

पलछिन्न     'कविता'   

गिरा गुलाल हैं, खिला अबीर।
रंगों से रंग मिलें हैं, बन गई हैं तकदीर।
छटक-छटक और मटक-मटक
रंग भरें बन गई एक तस्वीर।
चार रंग से काया बनाईं, बन गए उसके अधीर।
राधा गोरी,मैं क्यूं काला, तेरे रंग अनेक।
प्रेम का रंग सदा सजीला,  
रात में भी रहे उजाला।
हल्दी का रंग चढ़ा, मीत तेरे बिन,
ना पूरब, ना पश्चिम।
हाथों में जब हाथ तेरा हो,
ना पवन, ना जल, ना हिम।
पलछिन्न...पलछिन्न... पलछिन्न।
होली शा, रा, रा, रा। 
चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

वृंदावन की लट्ठमार होली 'कविता'

वृंदावन की लट्ठमार होली      'कविता'

फूल खिले हैं पलास के,
केसरिया और रंग लाल।
खूब डुबोकर भिगा दिए,
बना दिया गुलाल।

फाग खेलकर थक गए,
तीन रंग का चैत्र करें निढाल।
गोरी-गोरी बाहें, 
'गौरी' के गाल लाल-लाल।

होरी खेरे सखा संग नंदलाल,
होरे शा, रा, रा, रा, 
होरे शा, रा, रा, रा।
चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

लट्ठमार होली की हार्दिक शुभकामनाएं।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

सरस संग्रह-8 'धर्म'

सारा-सारा दिन काम करो, 
दिन में बस एक नेक काम करो,
कर्मकांड, कर्तव्य, कर्म करो,
आठों पहर में घड़ी अनुदान करो।

              जियो अपने ढंग से,
बहो सब के संग में,
              जियो और जीने दो,
सबपे ये करम करो।

किसी का भाग ना खाओ, 
               असह को ना सताओ,
लूट-मार क्यों करें, 
          अपने आप से ही शरों।
 
बल का सदुपयोग करो,
                वेदना मयी योग करो,
सृष्टि के कल्याण करो, 
                नाभंग निज कर्म करो।

अपनी भी हो आरती, 
              कृष्ण-सा हों सारथी, 
इस मानव जीवन को, 
              ना व्यर्थ नाकाम करो। 

जी-मदिरा भक्षण को, 
               बंद करों आरक्षण को,
सोचों त्रयक्षण को,
               प्रतिपल नाम करो।

तृप्ति किसी को दे दो,
                 बदले में नेकी ले लो, 
धन में ना हो उन्मुक्त, 
                धैर्य मन विश्राम करो।

मन से मानवता का, 
                नीच से भीरता का, 
अर से आचरण का, 
                बस एक सकाम करो।


चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

पुष्प कंटकों में खिलते हैं, दीप अंधेरों में जलते हैं...

पुष्प कंटकों में खिलते हैं, 
दीप अंधेरों में जलते हैं। 
आज नहीं, प्रह्लाद युगों से, 
पीड़ाओं में ही पलते हैं।
दीप अंधेरों में जलते हैं।...
किन्तु यातनाओं के बल पर, 
नहीं भावनाएँ रूकती हैं।
चिता होलिका की जलती है, 
अन्याय करने पर ही सजा झेलते है।
दीप अंधेरों में ही जलते हैं।....
सही रास्ते पर ही सच्चे आदमी चलते हैंं, 
गरीब-असहायों को पानी पिलाते हैं। 
अपने जीवन का त्याग कर देते हैं, 
बदले में ना कुछ लेते हैं।
दीप अंधेरों में ही जलते हैं।...
 चंद्रमौलेश्वर शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

आओ फिर से दीप जलाएं 'कविता'

आओ फिर से दीप जलाएँ...
भरी दुपहरी में अंधियारा,
सूरज परछाई से हारा।
अंतरतम का नेह निचोड़ें...
बुझी हुई बाती सुलगाएँ,
आओ फिर से दीप जलाएँ।

हम पड़ाव को समझे मंज़िल,
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल।
वतर्मान के मोहजाल में...
आने वाला कल न भुलाएँ,
आओ फिर से दीप जलाएँ।

आहुति बाकी, यज्ञ अधूरा,
अपनों के विघ्नों ने घेरा।
अंतिम जय का वज़्र बनाने...
पुनः दधीचि हड्डियां गलाएँ,
आओ फिर से दीप जलाएँ।
शिवांशु 'निर्भयपुत्र'

नगर निगम चुनाव में हर तरह के हथकंडे अपनाए

नगर निगम चुनाव में हर तरह के हथकंडे अपनाए अकांशु उपाध्याय  नई दिल्ली। नगर निगम चुनाव की मतगणना के नतीजों पर अपनी खुशी जताते हुए...