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बुधवार, 28 सितंबर 2022

29 सितंबर को मनाया जाएगा 'वर्ल्ड हार्ट डे'

29 सितंबर को मनाया जाएगा 'वर्ल्ड हार्ट डे'

सरस्वती उपाध्याय 

हर साल दुनिया भर में हृदय रोग से लाखों लोगों की मौंत हो जाती है‌। हार्ट की समस्‍या के प्रति लोगों को जागरूक करने और मौत से बचाने के मद्देनजर वर्ल्‍ड हार्ट फेडरेशन ने ‘वर्ल्‍ड हार्ट डे’ मनाने पर विचार किया। दुनियाभर में इस दिन यह बताने का प्रयास किया जाता है कि हार्ट की बीमारियों से किस तरह खुद का बचाया जा सकता है और आखिर किन लक्षणों को देखकर तुरंत डॉक्‍टर से संपर्क करना चाहिए।आइए जानते हैं कि आखिर ‘वर्ल्‍ड हार्ट डे’ का क्‍या इतिहास है और इसे क्‍यों सेलिब्रेट करना ज़रूरी है ?

वर्ल्‍ड हार्ट डे का इतिहास...

‘वर्ल्‍ड हार्ट डे’ हर साल 29 सितंबर को मनाया जाता है।दुनियाभर में हार्ट की बीमारियों से मौत की संख्‍या बढ़ता देख विश्व स्वास्थ्य संगठन और वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन ने मिलकर वर्ल्‍ड हार्ट डे की परिकल्‍पना की। साल 1997 से 1999 तक वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन के अध्यक्ष एंटोनी बेयस डी लूना ने इस पर विचार किया और 24 सितंबर 2000 से 2011 तक इस दिन का अंतरराष्‍ट्रीय दिवस के रूप में मनाया गया। तब यह दिन सितंबर के आखिरी रविवार को मनाया जाता था।

वर्ल्‍ड हार्ट डे का महत्‍व...

दुनियाभर में हर साल करीब 17 मिलियल लोग हृदय रोग (सीवीडी) की वजह से मृत्यु के शिकार हो जाते हैं। इन मौतों का प्रमुख कारण कोरोनरी हार्ट डिजीज या स्ट्रोक रहा है। सीवीडी के बारे में एक आम गलत धारणा यह है कि यह विकसित देशों में अधिक लोगों को प्रभावित करता है, जो प्रौद्योगिकी पर अधिक निर्भर हैं और गतिहीन जीवनशैली जी रहे हैं, जबकि 80% से अधिक मौतें मध्यम आय और निम्न आय वाले देशों में होती हैं।

हार्ट डिजीज होने का मुख्‍य कारण है व्यायाम की कमी, धूम्रपान, खराब आहार आदि। इसके अलावा, उपचार के लिए धन की कमी और सही समय पर इलाज ना करा पाना भी मौत का कारण होती है। ऐसे में हर साल इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में 90 से अधिक देश हिस्सा लेते हैं और इस दिन सीवीडी के बारे में जानकारी के प्रसार के लिए प्रयास करते हैं। इसमें सरकार और संगठनों की भागीदारी अधिक होना ज़रूरी है।

बुधवार, 7 सितंबर 2022

8 सितंबर को मनाया जाएगा 'विश्व साक्षरता दिवस'

8 सितंबर को मनाया जाएगा 'विश्व साक्षरता दिवस' 

सरस्वती उपाध्याय 

हर साल 8 सितंबर को दुनियाभर में 'विश्व साक्षरता दिवस' मनाया जाता है। इसे मनाने की शुरुआत साल 1966 में हुई थी, जब यूनेस्को ने शिक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने और दुनियाभर के लोगों का इस तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिए हर साल आठ सितंबर को 'विश्व साक्षरता दिवस' मनाने का फैसला किया था। चूंकि इस बार दुनियाभर में कोरोना महामारी फैली है, इसलिए इस बार साक्षरता दिवस की थीम 'साक्षरता शिक्षण और कोविड -19: संकट और उसके बाद' पर रखी गई है। आइए जानते हैं, इस दिवस के बारे में खास बातें, जैसे कि इसे क्यों मनाया जाता है, इसका महत्व क्या है और इससे समाज में क्या बदलाव आया है। 

कब आया अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने का विचार ? 

इसे मनाने की घोषणा भले ही 26 अक्तूबर 1966 को हुई हो, लेकिन सबसे पहले इसका विचार ईरान के तेहरान में शिक्षा से जुड़े मंत्रियों के विश्व सम्मेलन के दौरान आया था। यह सम्मेलन साल 1965 में हुआ था, जिसमें निरक्षरता को खत्म करने के लिए दुनियाभर में एक जागरूकता अभियान चलाने पर चर्चा की गई थी। 

क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस ? 

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत, सामुदायिक और सामाजिक रूप से साक्षरता के महत्व पर प्रकाश डालना है। इस दिवस के माध्यम से दुनियाभर में लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है, ताकि वो अपने आने वाले कल को बेहतर बना सकें। 

साक्षरता के मामले में भारत कहां ? 

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आंकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में साक्षरता दर 77.7 फीसदी है। अगर देश के ग्रामीण इलाकों की बात करें तो वहां साक्षरता दर 73.5 फीसदी है जबकि शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 87.7 फीसदी है। साक्षरता के मामले में देश का शीर्ष राज्य केरल है, जहां 96.2 फीसदी लोग साक्षर हैं। वहीं आंध्र प्रदेश इस मामले में सबसे निचले पायदान पर है। वहां की साक्षरता दर महज 66.4 फीसदी ही है। 

पहले के मुकाबले भारत में काफी बढ़ी है साक्षरता दर...

अगर हम आजादी से वर्तमान साक्षरता दर का आंकलन करें तो स्थिति थोड़ी बेहतर नजर आती है। आजादी के बाद से देश में साक्षरता दर में 57 फीसदी की वृद्धि हुई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटिश शासन के दौरान देश में सिर्फ 12 फीसदी लोग ही साक्षर थे।

गुरुवार, 18 अगस्त 2022

कृष्ण-पक्ष की अष्टमी को मनाई जाएगी 'जन्माष्टमी'

कृष्ण-पक्ष की अष्टमी को मनाई जाएगी 'जन्माष्टमी' 

सरस्वती उपाध्याय 

हिंदू धर्म में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है‌। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं। पंचांग के अनुसार, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण-पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कृष्ण का जन्म मध्य रात्रि में हुआ था। इस लिहाज से कुछ लोग श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 18 अगस्त को मनाएंगे, वहीं उदया तिथि की गणना के अनुसार 19 अगस्त को जन्माष्टमी मनाना भी उत्तम है।

कृष्ण भगवान को पंजीरी के साथ पंचामृत का भोग बहत प्रिय है। मान्यता है कि बिना पंचामृत के श्रीकृष्ण की पूजा अधूरी रह जाती है। इस लिए इन्हें पंचामृत का भोग जरूर लगाना चाहिए।पंचामृत दूध, दही, घी, शहद, चीनी से बनकर तैयार होता है। इसे देवताओं का पेय भी कहते हैं। श्री कृष्ण पूजा में भगवान को पंचामृत का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसलिए श्री कृष्ण जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण को पंचामृत का भोग जरूर लगाना चाहिए‌। इससे भगवान कृष्ण अत्यंत प्रसन्न होते हैं तथा भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते है। जिन पर भगवान कृष्ण का आशीर्वाद होता है। उन्हें कभी किसी चीज की कमी नहीं होती। घर-परिवार में शांति बनी रहती है। नौकरी और व्यापार में तरक्की होती है। भगवान कृष्ण की कृपा से सुख समृद्धि में वृद्धि होती है। पंचामृत को चरणामृत भी कहते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि पंचामृत से प्रतिरक्षा में सुधार होता है। मस्तिष्क तेज होता है‌। पंचामृत के उपयोग से पित्त दोष भी संतुलित होता है।

बुधवार, 10 अगस्त 2022

श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाएगा 'रक्षाबंधन'

श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाएगा 'रक्षाबंधन'

सरस्वती उपाध्याय 

हर साल रक्षाबंधन का पर्व श्रावण माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस साल की पूर्णिमा तिथि 11 अगस्त को शुरू हो जाएगी। 11 अगस्त 2022 को पूर्णिमा तिथि 10 बजकर 37 मिनट पर शुरू होकर 12 अगस्त को सुबह 07 बजकर 06 मिनट पर समाप्त होगी। लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि 11 अगस्त को भद्रा है और उदया तिथि में पूर्णिमा नहीं है, इसलिए रक्षाबंधन 12 अगस्त को ही मनेगा। लेकिन लोग कई और जरूरी बातों को नजरअंदाज कर रहे हैं। पंडितों का कहना है कि इस बार 11 अगस्त को भद्रा होने के बावजूद बहनें भाईयों को राखी बांध सकती हैं।

आइए जानते हैं इसके पीछे का कारण...


रक्षाबंधन पर भद्रा रहेगी या नहीं ? 

ज्योतिषी प्रवीण मिश्रा के मुताबिक, शास्त्रों के अनुसार दूसरे दिन भी अगर पूर्णिमा यानी उदयातिथि के दिन है और उस दिन अगर पूर्णिमा तीन मुहूर्त तक है, तो हमें दूसरे दिन रक्षाबंधन मनाना चाहिए। लेकिन अगर त्रिमुहूर्त व्यापनी दिन तक नहीं है तो अगले दिन राखी नहीं मनानी चाहिए। इस हिसाब से 11 अगस्त को रक्षाबंधन मनाया जाना चाहिए। इस बार 11 अगस्त को रक्षाबंधन पर भद्रा का साया है। पहले ये जानना जरूरी है कि भद्रा क्या है? भद्रा समय का नाम है, जिसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं करते हैं। ऐसी मान्यता है कि उस समय अगर आप कुछ अच्छा काम करते हैं तो उस समय वह कार्य खराब हो जाता है। इस बार जिस समय पूर्णिमा तिथि लग रही है, उसी समय भद्रा की शुरूआत भी हो जाएगी। शास्त्रों के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को दोपहर में राखी बांधनी चाहिए, लेकिन दोपहर में अगर भद्रा हो तो उस समय राखी नहीं बांधनी चाहिए। इस बार भद्रा 11 अगस्त को 10 बजकर 37 मिनट पर शुरू होगी और रात 08 बजकर 53 मिनट तक रहेगी।

11 अगस्त को चंद्रमा मकर राशि में होगा और भद्रा पाताल लोक में होगी। भद्रा का प्रभाव इसलिए पृथ्वी पर ज्यादा नहीं पड़ रहा है। अगर कोई 11 अगस्त को जल्दी राखी बांधना चाहता है तो वह लोग राखी भद्रा पूंछ काल में बांध सकते हैं। भद्रा पूंछ काल का समय 11 अगस्त शाम को 05 बजकर 18 मिनट से 06 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। भद्रा मुख के समय राखी बांधना शुभ नहीं माना जाता है। इसका समय शाम को 06 बजकर 20 मिनट से रात 08 बजकर 05 मिनट तक रहेगा।

रक्षाबंधन 2022 पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त...

रक्षाबंधन पर 11 अगस्त की दोपहर 12 बजे से 12 बजकर 53 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा। इस 53 मिनट के शुभ मुहूर्त में आप भाई की कलाई पर राखी बांध सकेंगी। दोपहर के वक्त 02 बजकर 39 मिनट से लेकर 03 बजकर 32 मिनट तक विजय मुहूर्त रहेगा। इस शुभ मुहूर्त में भी भाई को राखी बांध सकती हैं।

11 अगस्त को जब रात 08 बजकर 53 मिनट पर भद्रा समाप्त हो जाएगी, उसके बाद आप रात 9 बजकर 50 मिनट तक राखी बांध सकते हैं। क्योंकि रात 08 बजकर 53 मिनट से रात 9 बजकर 50 मिनट तक प्रदोष काल रहेगा। वह समय भी राखी बांधने के लिए शुभ रहेगा। चूंकि, कुछ इलाकों में परंपरा है कि उदयातिथि में ही रक्षाबंधन मनाते हैं‌ अगर 12 अगस्त को आप राखी मनाना चाहते हैं, तो सुबह 7 बजे तक राखी बांधनी है।

रविवार, 17 जुलाई 2022

कृष्ण-पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है 'शिवरात्रि'

कृष्ण-पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है 'शिवरात्रि'

सरस्वती उपाध्याय
सावन शिवरात्रि का दिन भगवान भोलेनाथ के लिए सर्वोत्तम होता है। भगवान शिव को समर्पित सावन का पवित्र माह 14 जुलाई से आरंभ हो गया है। हर सावन माह के कृष्ण-पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि मनाई जाती है। इस दिन व्रत रखकर भगवान शिव की विधिवत पूजा की जाती है। इससे भगवान शिव अति प्रसन्न होकर भक्तों के सारे दुःख दर्द दूर करते है। उनकी हर इच्छा पूरी होने का आशीर्वाद देते हैं।
इस बार चतुर्दशी तिथि दो दिन पड़ रही है। ऐसे में सावन शिवरात्रि का व्रत जुलाई को रखा जायेगा या फिर 27 जुलाई को। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार सावन शिवरात्रि का व्रत 26 जुलाई को रखा जायेगा और इस व्रत का पारण 27 जुलाई को किया जाएगा।

सावन शिवरात्रि पूजा की अवधि: 42 मिनट।

सावन शिवरात्रि व्रत पूजा के दौरान न करें ये गलती। भगवान शिव जी की पूजा में तुसली पत्र नहीं चढ़ाया जाता है और नहीं इनके भोग में ही तुलसी पत्र शामिल किया जाता है। इसके पीछे की मान्यता यह है कि भगवान विष्णु ने तुलसी को अपनी पत्नी स्वीकार कर लिया था।
सावन शिवरात्रि व्रत के दिन महिलाओं को खट्टी चीज नहीं खाना चाहिए। नहीं तो व्रत का पूरा पुण्य फल नहीं मिलता। सावन शिवरात्रि की पूजा में भगवान भोलेनाथ को केतकी का फूल, सिंदूर, हल्दी, कुमकुम नहीं अर्पित किया जाता। 
भगवान शिव के जलाभिषेक में केवल तांबे के लोटे का ही इस्तेमाल करें। अन्य किसी भी प्रकार के वर्तन का उपयोग नहीं किया जाता है।

बुधवार, 13 जुलाई 2022

भगवान शिव की पूजा में सक्षम नहीं है, यह चीजें

भगवान शिव की पूजा में सक्षम नहीं है, यह चीजें 

सरस्वती उपाध्याय
देवों के देव महादेव का प्रिय महीना सावन भी 14 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। हिंदू धर्म में देवी-देवाताओं को प्रसन्न करने के लिए पूजा सामग्री का विशेष महत्व है। धर्म ग्रंथों में विस्तार से बताया गया है कि किस देवता को पूजा में कौन-सी सामग्री अर्पित करनी चाहिए और किन वस्तुओं का पूजा में होना वर्जित माना जाता है। देवों के देव महादेव का प्रिय महीना सावन भी 14 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। शिवपुराण के अनुसार कुछ ऐसी सामग्री हैं। जिन्हें शिवजी की पूजा में शामिल नहीं करना चाहिए। मान्यता है, जितनी जल्दी शिव प्रसन्न होते हैं। उतनी ही तीव्र गति से उन्हें क्रोध भी आता है। आइए जानते हैं, सावन में शिवलिंग पर कौन-सी चीजें अर्पित नहीं करनी चाहिए ?

शिवलिंग पर केतकी के फूल अर्पित करने पर भगवान शिव नाराज हो जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार केतकी के फूल ने ब्रह्मा जी का झूठ में साथ दिया था, इसलिए क्रोधित होकर भगवान शिव ने श्राप दे दिया था कि उनकी पूजा में कभी केतकी के फूल का उपयोग नहीं होगा।

शिवजी की पूजा में न शंख बजाया जाता है, न ही शंख से उनका जलाभिषेक किया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने त्रिशुल शंखचूड़ नामक राक्षस का वध किया था। उसकी राख से शंख की उत्पन्न हुआ था।

सावन में भोलेभंडारी की पूजा में तुलसीदल का पत्ता भी नहीं चढ़ाया जाता। कथा के अनुसार भगवान शिव ने तुलसी के पति जालंधर का संहार किया था। तब से ही तुलसी ने खुद को भगवान शिव की पूजन सामग्री में शामिल न होने की बात कही थी।

भगवान भोलेनाथ तो वैरागी हैं, जो अपने पूरे शरीर पर राख लगाते हैं। कुमकुम और सिंदूर विवाहित महिलाएं लगाती है और पुराणों के अनुसार शिव विनाशक हैं। सावन में शिवजी की पूजा में कभी सिंदूर या कुमकुम को शामिल न करें।
भगवान शिव को छोड़कर लगभग सभी देवी-देवताओं की पूजा में हल्दी का इस्तेमाल किया जाता है। हल्दी को सौभग्य का प्रतीक माना जाता है और शिव तो वैरागी हैं। शास्त्रों के अनुसार, शिव को हल्दी चढ़ाने से चंद्रमा कमजोर होता है।

शनिवार, 9 जुलाई 2022

10 जुलाई को मनाया जाएगा 'ईद-उल-अजहा' का पर्व

10 जुलाई को मनाया जाएगा 'ईद-उल-अजहा' का पर्व 

सरस्वती उपाध्याय 
इस्लाम धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक बकरीद (ईद-उल-अजहा) का पर्व इस साल 10 जुलाई को मनाया जाएगा। बकरीद को ईद-उल-अजहा नाम से भी जानते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बकरीद का पर्व त्याग और कुर्बानी के तौर पर मनाया जाता है। बकरीद मनाने के पीछे का कारण हजरत इब्राहिम माने जाते हैं। जानिए, बकरीद का धार्मिक महत्व के साथ इतिहास...

बकरीद का इतिहास...

इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हजरत इब्राहीम अल्लाह के पैगंबर थे। एक बार अल्लाह ने उनका इम्तिहान लेना चाहिए और उनसे ख्वाब के माध्यम से कहा कि वह सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दे दें। ऐसे में हजरत इब्राहिम अपने इकलौते बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने को तैयार हो गए थे। क्योंकि वहीं एक चीज थी जिसे वह सबसे ज्यादा प्यार करते थे। ऐसे में जब हज़रत इब्राहीम अपने बेटे की कुर्बानी देने जा रहे थे तो उन्हें रास्ते में एक शैतान मिला। उसने उन्हें ऐसा करने से रोकते हुए कहा कि बेटे की कुर्बानी कौन देता है, इसकी जगह आप चाहे तो किसी जानवर को कुर्बानी दे सकते हैं। शैतान की इस बात को हज़रत इब्राहीम को सही समझा। लेकिन वह अपने अल्लाह से झूठ नहीं बोलना चाहते थे और न ही उनके हुक्म की नाफरमानी करना चाहते थे। इसलिए वे बेटे को लेकर आगे बढ़ गए। बेटे की कुर्बानी देते समय उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली ताकि बेटे का मोह अल्लाह की मांग को पूरी करने के बीच में बाधा न बने। कुर्बानी के बाद जब उन्होंने अपनी आंखों से पट्टी हटाई तो देखकर हैरान रह गए कि उनका बेटा सही सलामत खड़ा है और उसकी जगह एक बकरा कुर्बान हो गया है। उसके बाद से ही जानवरों की कुर्बानी देने का चलन शुरू हुआ।

ईद-उल-अजहा (बकरीद) पर ऐसे अदा करें नमाज़...

इस्लाम समुदाय के लोग बकरीद के दिन सूर्योदय के बाद और जुहर की नमाज से पहले ईद उल-अजहा की नमाज अदा कर सकते हैं। ईद अल-अजहा की नमाज़ में दो रकात होती हैं, जिसमें पहली रकात में सात बार तकबीर और दूसरी में पांच बार तकबीर पढ़ी जाती है। ईद की नमाज़ के लिए कोई भी अज़ान नहीं दी जाती है, बस तय वक्त में सभी लोग आकर नमाज़ अदा करते हैं।

बकरीद पर ऐसे दी जाती है कुर्बानी... 

कुर्बानी देने के लिए भी कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। इस दिन केवल स्वस्थ पशुओं की कुर्बानी दी जाती है। इसके अलावा त्याग का धन ईमानदारी से अर्जित करना चाहिए। गलत तरीके से कमाया गया धन बलिदान नहीं होता है।

मंगलवार, 5 जुलाई 2022

शुक्ल-पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है, वैवस्वत सप्तमी

शुक्ल-पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है, वैवस्वत सप्तमी

सरस्वती उपाध्याय 
वर्ष 2022 में वैवस्वत सप्तमी 6 जुलाई 2022, बुधवार को पड़ रही है। हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल-पक्ष की सप्तमी तिथि को वैवस्वत सप्तमी मनाई जाती है। सूर्यपुत्र वैवस्वत मनु ही मनु स्‍मृति के रचयिता हैं। यह दिन सूर्य देव की उपासना करने हेतु विशेष महत्व का बताया जाता है। सूर्य पुत्र वैवस्वत मनु की पौराणिक इस प्रकार है- मत्स्य पुराण के अनुसार, सत्यव्रत नाम के राजा एक दिन कृतमाला नदी में जल से तर्पण कर रहे थे। उस समय उनकी अंजुलि में एक छोटी-सी मछली आ गई। सत्यव्रत ने मछली को नदी में डाल दिया तो मछली ने कहा कि इस जल में बड़े जीव-जंतु मुझे खा जाएंगे। 
यह सुनकर राजा ने मछली को फिर जल से निकाल लिया और अपने कमंडल में रख लिया और आश्रम ले आए। रात भर में वह मछली बढ़ गई। तब राजा ने उसे बड़े मटके में डाल दिया। मटके में भी वह बढ़ गई तो उसे तालाब में डाल दिया अंत में सत्यव्रत ने जान लिया कि यह कोई मामूली मछली नहीं, जरूर इसमें कुछ बात है। तब उन्होंने ले जाकर समुद्र में डाल दिया। 
समुद्र में डालते समय मछली ने कहा कि समुद्र में मगर रहते हैं, वहां मत छोड़िए। लेकिन राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि आप मुझे कोई मामूली मछली नहीं जान पड़ती है। आपका आकार तो अप्रत्याशित तेजी से बढ़ रहा है, बताएं कि आप कौन हैं ? तब मछली रूप में भगवान विष्णु ने प्रकट होकर कहा कि आज से सातवें दिन प्रलय (अधिक वर्षा से) के कारण पृथ्वी समुद्र में डूब जाएगी।
तब मेरी प्रेरणा से तुम एक बहुत बड़ी नौका बनाओ। जब प्रलय शुरू हो तो तुम सप्त ऋषियों सहित सभी प्राणियों को लेकर उस नौका में बैठ जाना तथा सभी अनाज उसी में रख लेना। अन्य छोटे बड़े बीज भी रख लेना। नाव पर बैठ कर लहराते महासागर में विचरण करना। प्रचंड आंधी के कारण नौका डगमगा जाएगी। तब मैं इसी रूप में आ जाऊंगा। तब वासुकि नाग द्वारा उस नाव को मेरे सींग में बांध लेना। 
जब तक ब्रह्मा की रात रहेगी, मैं नाव समुद्र में खींचता रहूंगा। उस समय जो तुम प्रश्न करोगे मैं उत्तर दूंगा। इतना कह मछली गायब हो गई। राजा तपस्या करने लगे। मछली का बताया हुआ समय आ गया। वर्षा होने लगी। समुद्र उमड़ने लगा। तभी राजा ऋषियों, अन्न, बीजों को लेकर नौका में बैठ गए। और फिर भगवान रूपी वही मछली दिखाई दी। उसके सींग में नाव बांध दी गई और मछली से पृथ्वी और जीवों को बचाने की स्तुति करने लगे। 
मछली रूपी श्री विष्णु ने उसे आत्मतत्व का उपदेश दिया। मछली रूपी विष्णु ने अंत में नौका को हिमालय की चोटी से बांध दिया। नाव में ही बैठे-बैठे प्रलय का अंत हो गया। यही सत्यव्रत वर्तमान में महाकल्प में विवस्वान या वैवस्वत (सूर्य) के पुत्र श्राद्धदेव के नाम से विख्यात हुए तथा वैवस्वत मनु के नाम से भी जाने गए।

सोमवार, 4 जुलाई 2022

रक्‍त संचार को बेहतर करने में मदद, कपालभाति

रक्‍त संचार को बेहतर करने में मदद, कपालभाति

सरस्वती उपाध्याय
कपालभाति फोर्सफुली एग्जेलेशन या सांस छोड़ने की क्रिया है, जो पूरे शरीर में रक्‍त संचार को बेहतर करने में मदद करता है। शरीर में अगर कहीं नर्व दब रही है या कहीं रक्‍त के संचार में गड़बड़ है, तो आप कपालभाति की मदद से इसे ठीक कर सकते हैं। लेकिन, इसे करते वक्‍त काफी सावधानियां भी बरतने की ज़रूरत होती है। अगर आपको पेट से जुड़ी कोई समस्‍या है तो इसे ना करें। यही नहीं, प्रेग्नेंसी में भी कपालभाति नहीं करनी चाहिए। अगर आप हार्टके मरीज हैं, तो डॉक्‍टर की सलाह पर धीमी गति से ही इसे करें। अगर आप कोविड से रिकवर कर रहे हैं और आपके फेफड़े कमजोर हैं, तो भी इसे करते वक्‍त बहुत अधिक सावधानियां बरतने की ज़रूरत है।
इन बातों को रखें ख्‍याल
-पहला नियम है कि कपालभाति का अगर आप अच्‍छा प्रभाव चाहते हैं, तो आप इसे पद्मासन की मुद्रा में करें, लेकिन अगर आप पद्मासन नहीं लगा पाते हैं, तो अर्ध पद्मासन में बैठकर इसे कर सकते हैं।
-दूसरा नियम है कि आपकी कमर, गर्दन सीधी होनी चाहिए।अगर आप कुर्सी पर बैठकर इसे कर रहे हैं, तो कमर को सीधा करके ही इसे करें।
-कपालभाति फोर्सफुली एग्जेल करना है, जिसमें तेजी से नाक से हवा को बाहर निकालने का अभ्‍यास किया जाता है।
-बहुत लोग पेट पर प्रेशर लगाकर इसे करते हैं, तो ये गलत तरीका है। आपको केवल नाक से तेजी से वायू को लय में निकालना है। इस वीडियो को आप यहां दिए गए लिंक पर देख सकते हैं।
कपालभाति कैसे करें
-पहला चक्र 2 मिनट का करना है। इसे करने के लिए आप पद्मासन में बैठें और नाक से वायू को तेजी से बाहर निकालें। 2 मिनट पूरा होने पर गहरी सांस लें और रिलैक्‍स करें।
-दूसरा चक्र करने के लिए गहरी सांस लें और छोड़ें फिर गहरी सांस लें और फोर्सफुली कपालभाति करें। पूरा अभ्‍यास आप वीडियो लिंक पर देख सकते हैं।

रविवार, 3 जुलाई 2022

सावन महीने में 'भोलेनाथ' की पूजा का बहुत महत्‍व

सावन महीने में 'भोलेनाथ' की पूजा का बहुत महत्‍व  

सरस्वती उपाध्याय 
सावन मास को सभी हिंदू महीनों में सबसे ज्‍यादा पवित्र माना गया है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित है। इसी महीने से संसार को चलाने वाले भगवान विष्‍णु 4 महीने के लिए निद्रालीन हो जाते हैं। तब भगवान शिव सृष्टि का संचालन संभालते हैं। सावन महीने में भोलेनाथ की पूजा का बहुत महत्‍व है। यह शिव जी को प्रसन्‍न करन के लिए उत्‍तम समय होता है। उस पर सावन महीने के सोमवार को और भी ज्‍यादा महत्‍व दिया गया है।
इस साल सावन महीना 14 जुलाई 2022 से शुरू होगा और 12 अगस्‍त 2022 तक चलेगा। इस दौरान पहला सावन सोमवार 18 जुलाई 2022 को, दूसरा सावन सोमवार 25 जुलाई 2022 को, तीसरा सावन सोमवार 1 अगस्त 2022 को, चौथा सावन सोमवार 8 अगस्त 2022 को और पांचवा सावन सोमवार व्रत 12 अगस्त 2022 को रखा जाएगा। सावन महीने के पांचों सोमवार को व्रत रखा जाएगा।
सावन सोमवार के दिन सुबह जल्‍दी स्‍नान करके साफ कपड़े पहनें। इसके बाद दाएं हाथ में जल लेकर सावन सोमवार व्रत का संकल्‍प लें। फिर भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक करें।शिव जी को पंचामृत (दूध, दही, घी, अमृत, शहद) अर्पित करें।शिव जी को सफेद चंदन, अक्षत, सफेद फूल, धतूरा, बेल, बेल पत्र सुपारी आदि अर्पित करें। इस दौरान ॐ नमः शिवाय, मंत्र का जाप करें। धूप-दीप दिखाएं।भगवान को फल और मिठाई का भोग लगाएं। संभव हो तो जनेऊ और वस्‍त्र भी अर्पित करें। सावन सोमवार व्रत की कथा पढ़ें।आखिर में आरती करें और प्रसाद बांटें। यह व्रत पूरे दिन फलाहार लेकर रखना अच्‍छा माना जाता है। वहीं कुछ लोग एक समय भोजन करके भी यह व्रत करते हैं।

गुरुवार, 23 जून 2022

महत्व: 24 जून को मनाईं जाएंगी 'योगिनी एकादशी'

महत्व: 24 जून को मनाईं जाएंगी 'योगिनी एकादशी' 

सरस्वती उपाध्याय     
हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत अधिक महत्व होता है। हर माह में दो बार एकादशी तिथि पड़ती है। एक कृष्ण-पक्ष में और एक शुक्ल-पक्ष में। साल में कुल 24 एकादशी पड़ती हैं। आषाढ़ माह के कृष्ण-पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को योगिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को अतिप्रिय होती है। इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। इस बार 24 जून को योगिनी एकादशी मनाईं जाएंगी। हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के कृष्ण-पक्ष की एकादशी का प्रारंभ 23 जून, गुरुवार को रात 09 बजकर 41 मिनट से हो रहा है। एकादशी तिथि 24 जून, शुक्रवार को रात 11 बजकर 12 मिनट पर समाप्त होगी। उदयातिथि की मान्यता अनुसार, एकादशी व्रत 24 जून, शुक्रवार को रखा जाएगा। भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। आइए जानते हैं, योगिनी एकादशी पूजा-विधि, शुभ मुहूर्त और सामग्री की पूरी लिस्ट...

योगिनी एकादशी 2022 का शुभ मुहूर्त...

योगिनी एकादशी के दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 56 मिनट से दोपहर 12 बजकर 51 मिनट तक रहेगा। इस दिन ज्येष्ठा नक्षत्र सुबह 06 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 05 बजकर 24 मिनट से सुबह 08 बजकर 04 मिनट तक रहेगा। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04 बजकर 04 मिनट से सुबह 04 बजकर 44 मिनट तक रहेगा।

योगिनी एकादशी 2022 व्रत पारण का समय...

योगिनी एकादशी व्रत का पारण 25 जून, शनिवार को किया जाएगा। व्रत पारण का शुभ समय सुबह 05 बजकर 41 मिनट से सुबह 08 बजकर 12 मिनट के बीच रहेगा।

योगिनी एकादशी की पूजा-विधि...

सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।

घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।

भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें।

भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।

अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।

भगवान की आरती करें। 

भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं। 

इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।

इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।

एकादशी पूजा की सामग्री लिस्ट...

श्री विष्णु जी का चित्र अथवा मूर्ति
पुष्प 
नारियल 
सुपारी
फल
लौंग
धूप
दीप
घी 
पंचामृत 
अक्षत
तुलसी दल
चंदन 
मिष्ठान।

मंगलवार, 14 जून 2022

महत्व: 15 जून को मनाई जाएंगी 'मिथुन संक्रांति'

महत्व: 15 जून को मनाई जाएंगी 'मिथुन संक्रांति'

सरस्वती उपाध्याय
सूर्य का मिथुन राशि में प्रवेश करने की स्थिति सूर्य की मिथुन संक्रांति कहलाती है। मिथुन संक्रांति के दिन सूर्यदेव की पूजा का विधान है। वहीं, इस बार मिथुन संक्रांति 15 जून 2022 (बुधवार) को मनाई जाएंगी। एक साल में 12 संक्रांति होती हैं। जिसमें सूर्य अलग-अलग राशि और नक्षत्र में विराजमान होते है। सूर्य का मिथुन राशि में प्रवेश करने की स्थिति सूर्य की मिथुन संक्रांति कहलाती है। मिथुन संक्रांति के दिन सूर्यदेव की पूजा का विधान है। माना जाता है कि इसी दिन से वर्षा ऋतु की शुरूआत हो जाती है। साथ ही लोग इस दिन अच्छी फसल के लिए भगवान से अच्छी बारिश की मनोकामना करते हैं। इसे रज संक्रांति भी कहा जाता है।

त्योहार की तरह मनाई जाती है‌ मिथुन संक्रांति...

उड़ीसा में इस दिन को त्योहार की तरह मनाया जाता है। जिसे राजा परबा कहा जाता है। यहां ये चार दिन पहले से ही शुरु हो जाता है। जिसमें भू देवी यानी धरती माता की विशेष पूजा की जाती है। इस त्योहार में महिलाओं के साथ कुंवारी लड़कियां भी अच्छे वर की कामना के लिए हिस्सा लेती हैं। चार दिन तक चलने वाले इस पर्व में पहले दिन को पहिली राजा, दूसरे दिन को मिथुन संक्रांति या राजा, तीसरे दिन को भू दाहा या बासी राजा और चौथे दिन को वसुमती स्नान कहा जाता है।

क्यों की जाती है सिलबट्‌टे की पूजा ?
मान्यताओं के अनुसार जैसे महिलाओं को हर महीने मासिक धर्म होता है, जो उनके शरीर के विकास का प्रतिक है वैसे ही ये तीन दिन भू देवि यानी धरती मां के मासिक धर्म वाले होते हैं जो कि पृथ्वी के विकास का प्रतीक है। वहीं चौथा दिन धरती के स्नान का होता है। जिसे वसुमती गढ़ुआ कहते हैं।
सिलबट्‌टे को धरती माता का रूप माना गया है। इसलिए इन तीन दिनों में इसका उपयोग नहीं करना चाहिए। चौथे दिन सिलबट्‌टे को जल और दूध से स्नान कराया जाता है। फिर चंदन, सिंदूर और फूल से भू देवी यानी सिलबट्‌टे की पूजा की जाती है। इस दिन दान का बहुत महत्व है। गेहूं, गुड़, घी, अनाज आदि का दान करना चाहिए।

शुक्रवार, 10 जून 2022

साल का 'आखिरी बड़ा मंगल' 14 जून को हैं

साल का 'आखिरी बड़ा मंगल' 14 जून को हैं 

सरस्वती उपाध्याय  
ज्येष्ठ मास का बड़ा मंगल हनुमान की पूजा के लिए खास माना जाता है। इस साल का आखिरी बड़ा मंगल 14 जून को है। बता दें कि हिंदू मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ माह का प्रत्येक मंगलवार बड़ा मंगल होता है। बड़ा मंगल को हनुमान की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन हनुमान की पूजा करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
कहा जाता है कि जो भक्त ज्येष्ठ मास में हनुमान जी की विधिवत पूजा उपासना करता है, उन्हें विशेष लाभ प्राप्त होता है। साथ ही उनकी पूजा से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह का अंतिम मंगल 14 जून को है। इस दिन हनुमान भक्त बड़े धूम-धाम से उनकी पूजा करेंगे। लोगों में लड्डू, पुड़ी, हलुवा, चना एवं शरबत आदि का वितरण किया जाएगा।

बड़े मंगल पर करें ये उपाय...
कहा जाता है कि बड़ा मंगल को मसूर की दाल को बहते जल में प्रवाहित करने से भक्तों पर हनुमान जी की कृपा अति शीघ्र होती है। इससे भक्तों के जीवन चल रही सारी समस्या से मुक्ति मिल जाती है। घर परिवार में शांति और खुशहाली का माहौल कायम रहता है।
बड़े मंगलवार के दिन हनुमान को गुड़ से बना हुआ पुआ का भोग लगाना चाहिए। इससे भक्तों की हर इच्छा पूरी होती है. बड़े मंगल को जरुरतमंदों की मदद करने से घर में बरकत रहती है। बड़े मंगल के दिन जरूरतमंद और गरीब लोगों को जल और सर्बत पिलाने से हनुमान की कृपा बनी रहती है।
बड़े मंगल को मीठे पान का भोग लगाना उत्तम माना गया है। ऐसा करने से नौकरी और बिजनेस से जुड़ी सारी समस्या का समाधान हो जाता है।

गुरुवार, 9 जून 2022

शुक्ल-पक्ष में मनाईं जाएंगी 'निर्जला एकादशी'

शुक्ल-पक्ष में मनाईं जाएंगी 'निर्जला एकादशी' 

सरस्वती उपाध्याय 
निर्जला एकादशी का काफी अधिक महत्व है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल-पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को निर्जला एकादशी के अलावा भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। साल में पड़ने वाली 24 एकादशियों में से इसे सबसे कठिन एकादशी माना जाता है। क्योंकि इस एकादशी में बिना जल पिएं व्रत रखा जाता है। एकादशी भगवान विष्णु को अति प्रिय है। मान्यता है कि इस एकादशी में भगवान विष्णु की विधिवत तरीके से पूजा करने के साथ व्रत रखने से सभी एकादशियों के बराबर फल मिलता है। जानिए निर्जला एकादशी का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि...
 
निर्जला एकादशी तिथि और शुभ मुहूर्त...

निर्जला एकादशी तिथि- 10 और 11 जून 2022, शुक्रवार।
 
एकादशी तिथि प्रारंभ- 10 जून सुबह 7 बजकर 25 मिनट से शुरू।

एकादशी तिथि समाप्त- 11 जून सुबह 5 बजकर 45 मिनट में समाप्त।

अभिजीत मुहूर्त – 10 जून को सुबह 11 बजकर 59 मिनट से दोपहर 12 बजकर 53 मिनट तक।

शिव योग – 11 जून शाम 08 बजकर 46 मिनट से 12 जून शाम 05 बजकर 27 मिनट तक।

स्वाति नक्षत्र – 11 जून सुबह 03 बजकर 37 मिनट से 12 जून सुबह 02 बजकर 05 मिनट तक।

रवि योग- 10 जून को सुबह 5 बजकर 23 मिनट से शुरू होकर 11 जून सुबह 3 बजकर 37 मिनट तक।

सर्वार्थ सिद्धि योग- 11 जून सुबह 5 बजकर 23 मिनट से 12 जून सुबह 2 बजकर 5 मिनट तक।

पारण का समय- 11 जून सुबह 5 बजकर 49 मिनट’ से 8 बजकर 29 मिनट तक।

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान आदि करके साथ कपड़े धारण कर लें। भगवान विष्णु का मनन करके हुए निर्जला व्रत का संकल्प ले लें।

भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा अर्चना करें।
सबसे पहले एक चौकी या फिर पूजा घर में ही पीले रंग का कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की तस्वीर या फिर मूर्ति स्थापित करें। इसके बाद फूल की मदद से जल अर्पित करके शुद्धि करें।
आसन बिछाकर बैठ जाएं।
अब भगवान विष्णु को पीले रंग के फूल और माला चढ़ाएं। इसके बाद पीले रंग का चंदन, अक्षत आदि लगा दें।
इसके साथ ही भोग और तुलसी दल चढ़ा दें। अब घी का दीपक और धूप जलाकर विष्णु भगवान के मंत्र, चालीसा, स्तुति, स्तोत्र आदि का जाप कर लें।
अंत में विधिवत आरती कर लें और दिनभर निर्जल व्रत रहने के बाद दूसरे दिन सूर्योदय होने के बाद पारण करें। इसके बाद जल ग्रहण करें।

बुधवार, 8 जून 2022

महत्व: 9 जून को मनाया जाएगा, गंगा दशहरा

महत्व: 9 जून को मनाया जाएगा, गंगा दशहरा

सरस्वती उपाध्याय  
गंगा दशहरे का अपना एक अलग महत्व है। मान्यता है कि गंगा दशहरे के दिन मां गंगा धरती पर अवतरित हुई थी। इस बार गंगा दशहरा 9 जून को मनाया जाएगा। बता दें कि हिंदू पंचांग के अनुसार, गंगा दशहरा 2022 का पर्व ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन मां गंगा धरती पर अवतरित हुई थी। इस दिन गंगा स्नान करने और दान देने की परंपरा है। कहा जाता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से 10 प्रकार के पाप कट जाते हैं। इस बार गंगा दशहरा का पर्व 9 जून को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार, गंगा दशहरा के दिन चार शुभ योग का निर्माण हो रहा है।

नौकरी में बाधा से मुक्ति के लिए उपाय...

अगर आपको लंबे समय से नौकरी या व्यापार में बाधा का सामना करना पड़ रहा है तो, गंगा दशहरा के दिन एक मिट्टी का घड़ा लें। उसमें गंगा जल की कुछ बूंदें और थोड़ी शक्कर डालें। अब घड़े में पानी भरकर किसी गरीब या जरूरतमंद को दान करें। मान्यता है कि ऐसा करने से नौकरी में आने वाली बाधाएं खत्म होती हैं।

धन प्राप्ति के लिए उपाय...

गंगा दशहरा के दिन स्नान करने के बाद मंदिर में जाकर शिवलिंग का गंगा जल से अभिषेक करें और थोड़ा जल बचा लें। उसी जल से पूरे घर में छिड़काव करने से नकारात्मकता दूर होती है। इसके साथ ही धन आगमन की रुकावटें खत्म हो जाती हैं।

कर्ज से मुक्ति के लिए उपाय...

कर्ज से मुक्ति के लिए गंगा दशहरा के दिन अपनी लंबाई का एक काला धागा लें और उसे नारियल में लपेटकर शिवलिंग के समक्ष रखें। इसके बाद अपनी समस्या की समाप्ति की प्रार्थना करें और शाम को काले धागे से लिपटा नारियल बहते जल में प्रवाहित कर दें। प्रवाहित करने के बाद पीछे मुड़कर न देखें। मान्यता है कि ऐसा करने से समस्या से मुक्ति मिलती है।

बुधवार, 1 जून 2022

गंगाजल की पवित्रता बनाएं रखें, जानिए नियम

गंगाजल की पवित्रता बनाएं रखें, जानिए नियम

सरस्वती उपाध्याय
पूजा-पाठ, शुद्धिकरण कई शुभ कार्यों में गंगाजल का उपयोग किया जाता है। अधिकतर लोग गंगाजल को अपने घरों में भी रखते हैं। लेकिन नियमों का पालन नहीं कर पाते। जी हां, आपको बता दें कि हिंदू धर्म में गंगाजल को बहुत पवित्र माना जाता है। जन्म से लेकर मरण तक गंगाजल का बहुत महत्व है। सनातन धर्म में गंगा नदी को मां का दर्जा दिया गया है।
मान्यता है कि गंगाजी के दर्शन मात्र से मनुष्यों के पाप धुल जाते हैं, और गंगाजल के स्पर्श से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ऐसे में जरूरी है कि अगर घर में गंगाजल रख रहे हैं तो इसकी पवित्रता बनाए रखने के लिए इन नियमों का जरूर पालन करें...

रहे सावधान, शनि वक्री हो रहे हैं, 141 दिनों तक आपकी राशि को प्रभावित करेंगे।
अमूमन लोग गंगाजल को प्लास्टिक की बोतल में भरकर रखते हैं, जो कि गलत है। विज्ञान में प्लास्टिक बोतल को जहरीला माना जाता है। गंगाजल को हमेशा चांदी, पीतल या तांबे के बर्तन में भरकर रखना चाहिए।
घर में जिस स्थान पर गंगाजल रखा हो, वहां शुद्धि का बहुत ध्यान रखें। उस जगह हमेशा साफ-सफाई जरूर करें। गंगाजल की पवित्रता बनाए रखने के लिए पूजा घर में इसे रखने की सलाह दी जाती है। घर के ईशान कोण को देवताओं का स्थान माना जाता है। इसलिए गंगाजल को हमेशा घर की इस दिशा में रखना शुभ माना जाता है।

गंदे हाथों से जल स्पर्श न करें...
गंगाजल के प्रयोग से पहले ध्यान रखे की आपके हाथ स्वच्छ हों। गंदे हाथों से इसे न छूएं। घर में गंगाजल हो तो मास-मदिरा का सेवन न करें। गंदे हाथ से गंगाजल स्पर्श करने पर ग्रहदोष लगता है।

अंधेरे में न रखा हो, गंगाजल...
गंगाजल को घर में रखने से सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है और घर में ये ऊर्जा बनी रहती है। लेकिन इसके साथ ही इस बात का ध्यान रखें कि इसे कभी भी अंधेरे कमरे या अंधेरे कोने में न रखें।

सोमवार, 30 मई 2022

गाय का दूध सबसे पॉपुलर ऑप्शन हैं: न्यूट्रिशनिस्ट

गाय का दूध सबसे पॉपुलर ऑप्शन हैं: न्यूट्रिशनिस्ट 

अकांशु उपाध्याय      
नई दिल्ली। किसी व्यक्ति के दूध ना पीने की कई वजह हो सकती हैं। कुछ लोग हेल्थ से जुड़ी समस्याओं की वजह से दूध नहीं पीते हैं और कुछ लोग एक खास डाइट को फॉलो करने के लिए भी ऐसा करते हैं। खैर, उनकी वजह जो भी हो, इससे पहले कि आप भी दूध छोड़ने का मन बनाएं और अपने मेन्यू में कोई और ऑप्शन शामिल करें, आपके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है। न्यूट्रिशनिस्ट भक्ति कपूर ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम पोस्ट के ज़रिए ये समझाने की कोशिश की है कि नॉन डेयरी मिल्क ऑप्शंस आज पॉपुलैरिटी में आसमान छू रहे हैं, लेकिन ये जानने की भी ज़रूरत है कि ये गाय के दूध के मुकाबले कैसे ढेर हो जाते हैं ?
न्यूट्रिशनिस्ट ने अपनी इंस्टाग्राम पोस्ट के कैप्शन में लिखा, “गाय का दूध सबसे पॉपुलर ऑप्शन है, खासकर बच्चों के लिए। ये फैट, प्रोटीन समेत ज़रूरी विटामिन और मिनरल्स से नेचुरली मिलने वाली कैलोरी का एक बेहतर बैलेंस प्रदान करता है, जैसे विटामिन डी और कैल्शियम, क्योंकि ज़रूरी न्यूट्रिएंट्स प्रदान करना बच्चों की ग्रोथ और विकास के लिए ज़रूरी है।
उन्होंने बताया है कि दूध के विकल्प की तलाश करते समय इन चीजों पर ज़रूर विचार करें।
ऐसे न्यूट्रिशनल प्रोफ़ाइल की तलाश करें, जो असली दूध के समान हो।
बिना स्वाद के और बिना मीठे वाले विकल्प चुनें और छिपी हुई शुगर से सावधान रहें।
जब भी संभव हो, एडिटिव्स (कुछ मिला हुआ) से बचें।
ऐसे किसी भी प्रोडक्ट से बचें जो एलर्जी को ट्रिगर कर सकता है।
न्यूट्रिशनिस्ट का कहना है, “सुबह आपकी कॉफी में दूध लेने की अगर बात आती है, तो आप इसे बादाम के दूध से बदल सकते हैं। बादाम का दूध यहां अच्छा काम करता है। वहीं, जब बेकिंग की बात आती है, तो सोया दूध या जई का दूध  गाय के दूध का बेहतरीन विकल्प हो सकता है। ज्यादातर रेसिपी में आप दूध के किसी भी ऑप्शन को 1:1 के अनुपात (Ratio) में बदल सकते है।
यदि आपको दूध से एलर्जी है।
 ये आपका एक निजी या नैतिक निर्णय है।
इसकी कोई मेडिकल वजह है।
आपको दूध पीना अच्छा नहीं लगता है और जानते हैं कि इससे किन न्यूट्रिएंट्स को बदलना है।
यदि आपका डाइट कल्चर आपको ऐसा करने को कहता है।
कोई डॉक्युमेंट्री आपको ऐसा करने से डराती है।
आपको असली दूध का स्वाद पसंद है, लेकिन आप खुद को बदलने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
आपको लगता है कि हर विकल्प पौष्टिक रूप से वास्तविक दूध के बराबर है।

गर्मियों में फिट रहना, व्यक्तिगत-पेशेवर जीवन का हिस्सा

गर्मियों में फिट रहना, व्यक्तिगत-पेशेवर जीवन का हिस्सा

सरस्वती उपाध्याय
गर्मियों में फिट रहना, हमारे व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन का हिस्सा होना चाहिए और पोषण उस लक्ष्य का एक अभिन्न अंग है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ आमतौर पर मौसम के दौरान भोजन से संबंधित प्रश्नों के शीर्ष पर रहते हैं। लेकिन, क्या 2022 की गर्मी कुछ अलग है? निश्चित रूप से, एक महामारी में दो साल बिताने के बाद, लोग छुट्टियों, सामाजिक समारोहों और सप्ताहांत के रात्रिभोज की योजना बना रहे हैं।
इस शिथिल रवैये के परिणामस्वरूप, वे पोषण के महत्व को खो रहे हैं। यह लेख गर्मियों के दौरान आपके स्वास्थ्य और पोषण को नियंत्रण में रखने में आपकी मदद करने के लिए आसान-से-आसान टिप्स प्रदान करेगा। क्या बदलते मौसम से हमारे खान-पान पर असर पड़ता है। इसका जवाब है हाँ।
जैसे-जैसे मौसम बदलता है, हम अपनी शारीरिक गतिविधि और खाने की आदतों के स्तर को भी बदलते हैं। आमतौर पर गर्मियों की भूख के लिए एक ऊष्मीय प्रकृति होती है। मौसम जितना गर्म होगा, हम उतना ही ठंडा होना चाहेंगे। गर्मियों के दौरान, शरीर पसीने के माध्यम से पानी की कमी से निपटने और स्वस्थ पाचन क्रिया को बनाए रखने के लिए अधिक पानी, तरल और हल्के पके हुए खाद्य पदार्थों की लालसा रखता है।
टोरंटो विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक सी पीटर हरमन ने इस दावे का समर्थन किया और उल्लेख किया कि गर्म जलवायु में, लोग कम खाते हैं और ‘कूलर’ खाद्य पदार्थ पसंद करते हैं। 2 मई, 2022 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, इस गर्मी में, भारत में दूध आधारित आइसक्रीम और डेयरी-आधारित पेय पदार्थों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।
लॉकडाउन के परिणामस्वरूप, स्थानीय बाजारों का बंद होना, और मिथक ‘कोल्ड’ को कोविड-19 संक्रमण से जोड़ते हुए, इन पेय पदार्थों और आइसक्रीम की बिक्री में पिछले दो सीज़न में गिरावट देखी गई। हालाँकि, गर्मियों में पोषण केवल आइसक्रीम, फलों के रस और ठंडे पेय से अधिक है। इन खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों में बड़ी मात्रा में परिष्कृत सफेद चीनी भी मौजूद होती है, जो लंबे समय तक सेवन करने पर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है।

शुक्रवार, 27 मई 2022

महत्व: 30 मई को रखा जाएगा 'वट सावित्री व्रत'

महत्व: 30 मई को रखा जाएगा 'वट सावित्री व्रत'  

सरस्वती उपाध्याय      

किसी भी सुहागिन महिला के लिए वट सावित्री का व्रत बहुत अधिक महत्व रखता है। इसका फल भी करवा चौथ के व्रत के समान है। इस व्रत को करने से महिलाओं को सदा सुहागन होने का वरदान प्राप्त होता है और इनके पति को लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य का भी वरदान प्राप्त होता है। इस साल 2022 में 30 मई को वट सावित्री व्रत रखा जाएगा। इस दिन सोमवार पड़ने की वजह से सोमवती अमावस्या का फल भी व्रत रखने वाली महिलाओं को प्राप्त होगा। इसे बड़ा अमावस भी कहा जाता है। कहीं-कहीं पर बरगदाही के नाम से भी वट सावित्री व्रत को जाना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि इसी दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। इसीलिए सुहागिन महिलाओं के लिए यह व्रत बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। वट सावित्री का व्रत करने वाली महिलाएं सोलह सिंगार करके बरगद के पेड़ के पास जाकर कच्चा सूत बांधकर बरगद की परिक्रमा करती हैं और अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। बरगद के पेड़ पर जल चढ़ाकर हल्दी कुमकुम या रोली का टीका लगाकर विधिवत पूजा अर्चना करती हैं।

वट सावित्री का व्रत करने वाली सुहागिन महिलाएं अपने सास को बायना भी देती हैं। इस बायना में सुहाग का पूरा सामान रखा जाता है। एक बांस की टोकरी में साड़ी, चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, काजल, फल, भीगा चना, पूड़ी रखकर अपनी सास को भेंट करती है। ऐसी मान्यता है कि सास को सुहाग का सामान भेंट करने से सदा सुहागन होने का वरदान प्राप्त होता है और घर में सुख शांति समृद्धि बढ़ती है।

शनिवार, 7 मई 2022

8 मई को मनाया जाएगा हैप्पी 'मदर्स डे'

8 मई को मनाया जाएगा हैप्पी 'मदर्स डे'  

सरस्वती उपाध्याय

हैप्पी 'मदर्स डे' को लेकर लोगों को उत्साह है। हर साल 8 मई को मदर्स डे मनाया जाता है। इस साल मदर्स डे 8 मई, रविवार को है। हैप्पी मदर्स डे मां और बच्चों के प्रेम और स्नेह का दिन है। वैसे तो हर दिन मां और बच्चों का होता है। लेकिन बच्चे जीवन की भागदौड़ में मां को यह बता नहीं पाते कि उनके जीवन में मां कितनी अहम हैं। ऐसे में मदर्स डे मां के मातृत्व, उनकी देखभाल, निस्वार्थ प्यार को समर्पित दिन होता है। लेकिन मदर्स डे के बारे में आप कितना जानते हैं? विश्व मातृ दिवस के अवसर पर भले ही लोग अपनी-अपनी तरह से मदर्स डे का पर्व मनाते हैं। लेकिन मदर्स डे से जुड़ी कई ऐसी बाते हैं, जिनसे आप अनजान होंगे...

पहला मदर्स डे कहां मनाया गया...

मौजूदा समय में दुनिया के तमाम देश मदर्स डे मनाते हैं। अमेरिका से लेकर भारत और यूरोपीय देशों में मदर्स डे अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है लेकिन शायद आप इस बात से अनजान हो कि सबसे पहला मदर्स डे अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया और फिलाडेल्फिया में मनाया गया था। साल 1908 में पहली बार मदर्स डे मनाया गया।

6 मार्च को भी मदर्स डे...

उसके बाद से कई सारे देशों में मदर्स डे मनाने का एक तय दिन हो गया। जिसे भारत, अमेरिका समेत अन्य देशों ने अपना लिया लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि यूके में मदर्स डे 6 मार्च को मनाया जाता है।

मदर्स डे मनाने की आधिकारिक घोषणा...

भले ही साल 1908 में मदर्स डे मनाने की शुरुआत हो गई हो लेकिन आधिकारिक तौर पर मदर्स डे मनाने के लिए कानून पास हुआ। अमेरिके के राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने 9 मई 1914 को कानून पास किया, जिसमें लिखा था कि मई महीने के हर दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाएगा।

एससी ने सभी महिलाओं को 'गर्भपात' का हक दिया 

एससी ने सभी महिलाओं को 'गर्भपात' का हक दिया  अकांशु उपाध्याय  नई दिल्ली। गुरुवार को देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्...