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बुधवार, 25 जनवरी 2023

विशेष त्योहार: आज मनाई जाएगी 'बसंत पंचमी'

विशेष त्योहार: आज मनाई जाएगी 'बसंत पंचमी'

सरस्वती उपाध्याय 

बसंत पंचमी माघ मास के शुक्‍ल-पक्ष, तिथि पंचमी के दिन मनाई जाती है। इस दिन कला और संगीत की देवी मां सरस्‍वती की पूजा की जाती है। कला और शिक्षा जगत के लोगों के लिए यह दिन बहुत खास होता है और वे लोग विधि विधान से मां सरस्‍वती की पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं। कुछ लोगों के मन में बसंत पंचमी की तिथि को लेकर उलझन है। इनकी जानकारी के लिए हम बता रहे हैं कि बसंत पंचमी इस साल 26 जनवरी को मनाई जाएगी। ऐसी मान्‍यता है कि बसंत पंचमी के दिन मां सरस्‍वती की पूजा करने से आपकी संतान सदा तरक्‍की करती है और आपके घर में भी सकारात्‍मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है, व मन एकाग्रचित होता है।

बसंत पंचमी को लेकर पौराणिक मान्‍यता है कि इस दिन ब्रह्माजी के मुख से मां सरस्‍वती का प्राकट्य हुआ था। इसी दिन मां सरस्‍वती ने प्रकट होकर इस सृष्टि को ध्‍वनि प्रदान की थी। इस दिन से बसंत ऋतु के आरंभ के साथ ही सुहावना मौसम आरंभ हो जाता है और वातावरण में एक अलग तरह की मिठास और सकारात्‍मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ जाता है। जिन लोगों के घर में पढ़ने वाले बच्‍चे हैं, उन लोगों को बसंत पंचमी के दिन अपने घर में सरस्‍वती पूजन का आयोजन अवश्‍य करना चाहिए। ऐसा करने से उनकी संतान तीव्र बुद्धि वाली बनती है और करियर में सफलता व तरक्‍की प्राप्‍त करती हैं। बंगाली समाज के लोगों में सरस्‍वती पूजन बहुत धूमधाम से किया जाता है।

बसंत पंचमी का शुभ मुहूर्त
माघ मास की पंचमी यानी कि सरस्‍वती पंचमी का आरंभ 25 जनवरी को दोपहर में 12 बजकर 34 मिनट पर होगा और इसका समापन 26 जनवरी को सुबह 10 बजकर 28 पर होगा। इसलिए बसंत पंचमी की पूजा उदया तिथि की मान्‍यता के अनुसार 26 जनवरी को मनाई जाएगी। 26 जनवरी को बसंत पंचमी की पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 7 मिनट से दिन में 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा।

बसंत पंचमी की पूजा-विधि
बसंत पंचमी पर मां सरस्‍वती के साथ ही रति और कामदेव की पूजा भी की जाती है। बसंत पंचमी के दिन पीले वस्‍त्र धारण करना शुभ माना जाता है। पीले चावल, पीले फल और पीली मिठाई के साथ मां सरस्‍वती की विधि विधान से पूजा करें और सरस्‍वती वंदना करें। इस दिन कामदेव और रति की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में आनंद बना रहता है। पूजा में रोली, मौली, हल्दी, केसर, अक्षत, पीले या सफेद रंग का फूल, पीली मिठाई आदि चीजों का प्रयोग करें।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

15 जनवरी को मनाया जाएगा 'मकर संक्रांति' का पर्व 

15 जनवरी को मनाया जाएगा 'मकर संक्रांति' का पर्व 

सरस्वती उपाध्याय 

मकर संक्रांति का पावन पर्व इस बार 15 जनवरी 2023, रविवार को मनाया जाएगा। यह पर्व हिन्दू धर्म के लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होते हैं। इस दिन मकर राशि में सूर्य प्रवेश कर जाते हैं और इसलिए ही इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। बहुत-सी जगहों पर इसे खिचड़ी और उत्तरायण भी कहते हैं। मकर संक्रांति पर प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालुओं का मेला विभिन्न नदियों के घाटों पर लगता है। इस शुभ दिन तिल खिचड़ी का दान करते हैं।

मकर संक्रांति का शुभ मुहूर्त

उदयातिथि के अनुसार, मकर संक्रांति इस बार 15 जनवरी 2023 को मनाई जाएगी। मकर संक्रांति की शुरुआत 14 जनवरी 2023 को रात 08 बजकर 43 मिनट पर होगी। मकर संक्रांति का पुण्य काल मुहूर्त 15 जनवरी को सुबह 06 बजकर 47 मिनट पर शुरू होगा और इसका समापन शाम 05 बजकर 40 मिनट पर होगा। वहीं, महापुण्य काल सुबह 07 बजकर 15 मिनट से सुबह 09 बजकर 06 मिनट तक रहेगा। मकर संक्रांति के दिन पुण्य और महापुण्य काल में स्नान और दान करना चाहिए।

मकर संक्रांति पूजन विधि

इस दिन प्रातःकाल स्नान कर लोटे में लाल फूल और अक्षत डाल कर सूर्य को अर्घ्य दें‌। सूर्य के बीज मंत्र का जाप करें। श्रीमदभागवद के एक अध्याय का पाठ करें या गीता का पाठ करें। नए अन्न, कम्बल, तिल और घी का दान करें। भोजन में नए अन्न की खिचड़ी बनाएं। भोजन भगवान को समर्पित करके प्रसाद रूप से ग्रहण करें। संध्या काल में अन्न का सेवन न करें। इस दिन किसी गरीब व्यक्ति को बर्तन समेत तिल का दान करने से शनि से जुड़ी हर पीड़ा से मुक्ति मिलती है।

मकर संक्रांति के दिन करें ये खास उपाय 

1. मकर संक्रांति के दिन स्नान करने के पानी में काले तिल डालें। तिल के पानी से स्नान करना बेहद ही शुभ माना जाता है‌। साथ ही ऐसा करने वाले व्यक्ति को रोग से मुक्ति मिलती है।

2. मकर संक्रांति के दिन स्नान के बाद सूर्य देव को जल अर्पित करें और सूर्य देव को चढ़ाए जाने वाले जल में तिल अवश्य डालें‌। ऐसा करने से इंसान की बंद किस्मत के दरवाज़े खुलते हैं।

3. इस दिन कंबल, गर्म कपड़े, घी, दाल चावल की खिचड़ी और तिल का दान करने से गलती से भी हुए पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख समृद्धि आती है।

4. इस दिन पितरों की शांति के लिए जल देते समय उसमें तिल अवश्य डालें। ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।

5. अगर आर्थिक रूप से कोई समस्या आ रही है तो इस दिन घर में सूर्य यंत्र की स्थापना करें और सूर्य मंत्र का 501 बार जाप करें।

6. कुंडली में मौजूद किसी भी तरह का सूर्य दोष को कम करने के लिए तांबे का सिक्का या तांबे का चौकोर टुकड़ा बहते जल में प्रवाहित करें।

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

आज धूमधाम से मनाया जाएगा 'क्रिसमस डे'

आज धूमधाम से मनाया जाएगा 'क्रिसमस डे'

सरस्वती उपाध्याय 

जिंगल बेल, जिंगल बेल, जिंगल बेल, जिंगल बेल ऑल द वे... इस समय सोशल मीडिया से लेकर बाजार और घरों में यही एक धुन सुनाई दे रही है। क्रिसमस का पर्व अब पूरी दुनिया में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाने लगा है। ऐसे तो यह ईसाई धर्म का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। लेकिन अब हर धर्म के लोग इसे लेकर उत्साहित रहते हैं। महीनों पहले से लोग क्रिमसम पार्टी की तैयारी में जुट जाते हैं। वहीं कई लोगों के मन में अब भी यह सवाल उठता है कि आखिर 25 दिसंबर के दिन क्यों क्रिसमस डे मनाया जाता है? तो आज हम आपको क्रिसमस से जुड़ी कई दिलचस्प बाते बताने जा रहे हैं। 

प्रभु यीशु का हुआ था जन्म

क्रिसमस का पर्व प्रभु यीशू के जन्म की खुशी में मनाई जाती है। प्रभु यीशू (जीसस क्राइस्‍ट) को भगवान का बेटा यानी Son Of God कहा जाता था।ईसाईयों की मान्यता के मुताबिक, प्रभु यीशू का जन्म 4 ईसा पूर्व हुआ था। उनके पिता का नमा यूसुफ और मां का नाम मरियम था। यीशू का जन्म एक गौशाला में हुआ था, जिसकी पहली खबर गडरिय सब को मिली थी और उसी समय एक तारे ने ईश्वर के जन्म की भविष्यवाणी को सत्य किया था।

यीशू ने 30 साल की आयु से मानव सेवा में जुट गए थे। वह घूम घूम कर लोगों को संदेश देते थे। प्रभु यीशू के इस कदम से यहूदी धर्म के कट्टरपंथी लोग नाराज हो गए और उनका विरोध करना शुरू कर दिया। फिर एक दिन रोमन गवर्नर के सामने प्रभु यीशू को लाया गया और फिर उन्हें सूली पर चढ़ा दिया गया।  मान्यताओं के मुताबिक, सूली पर चढ़ाए जाने के बाद ईश्‍वर के चमत्‍कार से यीशू फिर से जीवित हो गए और फिर उन्‍होंने ईसाई धर्म की स्‍थापना की।

क्रिसमस डे मनाने की शुरुआत कब हुई थी?

ईसाईयों के पवित्र ग्रंथ बाइबल में प्रभु ईसा मसीह की जन्मतिथि की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। लेकिन इसके बावजूद भी हर वर्ष 25 दिसंबर के दिन ही उनका जन्मदिन मनाया जाता है। 25 दिसंबर की तारीख को लेकर कई बार काफी विवाद भी हुआ है।  रोमन कैलंडर के अनुसार पहली बार 336 इसवीं को 25 दिसंबर को पहली बार आधिकारिक तौर पर यीशू का जन्मदिन मनाया गया। कहते हैं तब से ही 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाया जाने लगा। वहीं यह भी कहा जाता है कि पश्चिमी देशों ने चौथी शताब्‍दी के मध्‍य में 25 दिसंबर को क्रिसमस डे के रूप में मनाने की मान्‍यता दी। आधिकारिक तौर पर 1870 में अमेरिका ने क्रिसमस के दिन फेडरेल हॉलिडे की घोषणा की थी।

क्रिसमस ट्री का इतिहास

क्रिसमस ट्री की शुरुआत उत्तरी यूरोप में कई हजार साल पहले हुई थी। उस वक्त फर नाम के एक पेड़ को सजाकर यह त्यौहार मनाया जाता था। धीरे-धीरे क्रिसमस ट्री का चलन बढ़ने लगा। मान्यता यह भी है कि ईसा मसीह के जन्म के वक्त सभी देवताओं ने सदाबहार पेड़ को सजाया था। तभी से इस पेड़ को क्रिसमस ट्री के नाम से पहचाना जाने लगा। क्रिसमस ट्री को कई गिफ्ट्स, लाइट्स, चॉकलेट और घंटियों समेत तमाम चीजों से सजाया जाता है।

सेंटा क्लॉज की कहानी

सेंटा के बिना तो क्रिसमस का पर्व अधूरा-सा ही लगता है। सेंटा को लेकर प्रचलित एक कहानी के अनुसार, संत निकोलस का जन्म 340 ई० की 6 दिसंबर को हुआ था। बताया जाता है कि बचपन में ही इनके माता पिता का निधन हो गया था। बड़े होने के बाद वह एक पादरी बन गए। उन्हें लोगों की मदद करना काफी पसंद था। कहा जाता है कि वह रात में बच्चों को इस लिए गिफ्ट देते थे, ताकि कोई उन्हें देख न सके। मान्यता है कि आगे चलकर यही संत निकोलस बाद में सांता क्लॉज बन गए।

शनिवार, 15 अक्तूबर 2022

दीपावली पर मिट्टी के दीयों का अलग महत्व: उजाला 

दीपावली पर मिट्टी के दीयों का अलग महत्व: उजाला 

सरस्वती उपाध्याय

दीपोत्सव यानी दीपावली रोशनी का त्योहार है। जिसके आने में अब कुछ ही दिन बचे हैं। ऐसे में बरेली के बाजारों में भी रौनक देखने को मिल रही है। रंग-बिरंगी फैंसी लाइटों और झालरों से बाजार पटे हैं। वहीं बाजार में इस बार कुछ नए आइटम भी आए हुए हैं, जो लोगों को काफी लुभा रहे हैं। हालांकि, दिवाली पर दीये का अपना एक अलग महत्व होता है, जिसे जलाने के लिए तेल/घी की आवश्यकता होती है, लेकिन इस बार दीये तेल से नहीं पानी से जलेंगे। जो बाजार में आसानी से मिल रहे हैं।

इस बार बाजार में इलेक्ट्रॉनिक दीये जगमगा रहे हैं, जिनमें पानी डालते ही उसमें लगी एलईडी लाइट जलने लगती है और खूबसूरत रोशनी आपका मन मोह लेती है। इन लाइटों की कीमत भी काफी किफायती है। इसके अलावा बाजार में लाइटिंग फाउंटेन, लालटेन, कलर इमोजी, बैलून लाइट, मल्टी लाइट दीये, शार्प लाइट, कलश लाइट, कलर फैन लाइट, कंदील और मल्टी कलर लाइटें भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं।

खास बात ये है कि बाजार में मौजूद सभी सामान स्वदेशी हैं, जिन्होंने चाइनीज झालरों और लाइटों को बुरी तरह से पटखनी दी है। हालांकि स्वदेशी सामान चाइनीज के मुकाबले महंगा है, लेकिन फिर भी ग्राहकों की पहली पसंद है।

बात करें बाजार में मिल रहे रंग बिरंगी लाइटों वाले सामानों के दामों की तो, लाइटिंग फाउंटेन की कीमत 550 से 650 रुपए , बैलून लाइट 410 से 450, लालटेन 110 से 125, इमोजी 35 से 50 और कलश लाइट दाम 120 से 135 रुपए तक हैं। वहीं पानी के दीये की कीमत 25.50 रुपए, मल्टी लाइट दीये 15 से 20 रुपए, शार्प लाइट 6000 से 8000, कलर फैन लाइट 550 रुपए की है। इनके अलावा मल्टी कलर लाइट 15 से 18 रुपये, गणेश जी की लाइट वाली मूर्ति 350 और कंडील की कीमत पांच रुपए से शुरू है।

बता दें, बाजार में मौजूद छोटी-बड़ी सभी तरह की कंदीलें स्वदेशी और हस्तनिर्मित हैं, जिन्हें घरों में रहने वाले महिलाओं ने अपने हाथों से बनाया है। इसके अलावा बाजार में तरह-तरह की रंग बिरंगी झालरें भी मौजूद हैं, जो लोगों को लुभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही हैं।

एक तिहाई बांझपन का कारण पुरुष होते हैं: खास

एक तिहाई बांझपन का कारण पुरुष होते हैं: खास

अखिलेश पांडेय   

मेलबर्न। पहली बार ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में आईवीएफ क्लिनिक ने प्रक्रिया से जुड़े युगलों में पुरुष प्रजनन संबंधी समस्याओं के स्तर और सीमा के बारे में डेटा की सूचना दी है। ‘ऑस्ट्रेलिया एंड न्यूजीलैंड असिस्टेड रिप्रोडक्शन डेटाबेस’ (एएनजेडएआरडी) द्वारा जारी किए गए नए डेटा से आज पता चला है कि 2020 में किए गए सभी आईवीएफ चक्रों में से एक-तिहाई का कारण पुरुष बांझपन था।


हालांकि पुरुषों से संबंधित अधिकतर प्रजनन समस्याओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन पुरुष शुक्राणु की गुणवत्ता और महिलाओं के प्राकृतिक गर्भाधान की संभावना में सुधार के लिए कुछ चीजें कर सकते हैं। पुरुष बांझपन के मामले में अधिकांश समस्या वृषणों के कोई भी या पर्याप्त सामान्य शुक्राणु बनाने में विफल होने के कारण होती है जो महिलाओं के गर्भधारण के लिए आवश्यक होते हैं।

शुक्राणुओं की कम संख्या, शुक्राणु का सामान्य रूप से आगे न बढ़ना या असामान्य आकार के शुक्राणुओं की अधिक संख्या महिलाओं के अंडाणुओं को निषेचित करने की क्षमता को कम कर देती है। ज्यादातर मामलों में, पुरुष बांझपन का कारण अस्पष्ट है।लगभग 40 प्रतिशत पुरुषों में ही बांझपन के एक विशिष्ट कारण का पता लगाया जा सकता है। इनमें आनुवंशिक असामान्यताएं, पिछला संक्रमण, अंडकोष को आघात और शुक्राणु उत्पादन को नुकसान शामिल हैं – उदाहरण के लिए कैंसर के उपचार से।

कुछ पुरुषों के स्खलन में शुक्राणु नहीं होते हैं (एक स्थिति जिसे एज़ोस्पर्मिया कहा जाता है)। यह अवरुद्ध शुक्राणु नलियों के कारण हो सकता है, जो जन्मजात दोष हो सकता है, या पुरुष नसबंदी या अन्य क्षति कारण हो सकती है। कुछ मामलों में, कम या खराब समय पर संभोग, या यौन समस्याएं जैसे इरेक्टाइल डिस्फंक्शन या फिर स्खलन विफलता बांझपन का कारण बनती है।

सबसे कम आम समस्या पिट्यूटरी ग्रंथि (मस्तिष्क में एक ग्रंथि जो हार्मोन बनाती है, भंडारण करती है और जारी करती है) से हार्मोनल संकेतों की कमी है। यह अनुवांशिक हो सकता है या पिट्यूटरी ट्यूमर जैसे मुद्दों की वजह से हो सकता है। हार्मोन इंजेक्शन के साथ उपचार का उद्देश्य प्राकृतिक प्रजनन क्षमता को बहाल करना होता है।

मंगलवार, 4 अक्तूबर 2022

विजयदशमी: असत्य पर सत्य की विजय का पर्व 

विजयदशमी: असत्य पर सत्य की विजय का पर्व 

इस बार 'विजयदशमी' का महोत्सव (5 अक्टूबर) आज दिन बुधवार को मनाया जाएगा। 'विजयदशमी' का पर्व असत्य पर सत्य की विजय का महोत्सव है।

जय जय राम, जय जय भारत,

जय-जय पुरापाषाण, आर्यवासी।

       तेरे दरस का मन अभिलाषी...

सत्य-सनातन सभ्यता, कथा कहे अनंता,

राक्षस सुन सुमिरन, अहम और अक्रांता।

भीर-भीमकाय अंधकार में चमक रहा उजियारा,

चंद्र भी फीके पड़े चारो ओर प्रकाश फैला न्यारा।

                         तेरे दरस का मन अभिलाषी...

दूर देश में राम सबका, पर अधिकार हमारा,

व्योम से पुष्पवर्षा करते देव, शिव अति प्यारा।

जन जन के मन का वासी, वो बोले इकतारा,

ढोल-मृदंग की थाप, स्वर सुन रहा जग सारा।

                    तेरे दरस का मन अभिलाषी...

सरस्वती 'निर्भयपुत्री'


आज ही के दिन प्रभु श्री राम के द्वारा, कर कमलों के द्वारा ज्ञानी-विद्वान पंडित अहंकारी और दुराचारी विश्रवा पुत्र रावण की सत्ता एवं अत्याचार का अंत कर माता-सीता को मुक्त कराकर अपने संग लेकर आए थे। इसी उपलक्ष में प्रतिवर्ष अश्विन माह में शुक्ल-पक्ष की दशमी तिथि को रावण पर विजय प्राप्त करने के कारण 'विजयदशमी' का पर्व संपूर्ण पृथ्वी पर धूमधाम के साथ मनाया जाता है। 'विजयदशमी' को उत्तर भारत में दशहरा के रूप में मनाया जाता है। दशहरा दस प्रकार के पापों के परित्याग की प्रेरणा देता है। ज्योतिषविद पंडित ललित शर्मा के अनुसार, बुधवार को 'विजयदशमी' पूजन का शुभ मुहूर्त प्रात: 7.44 से प्रात: 9.13 तक और इसके बाद प्रात: 10.41 से दोपहर 2.09 बजे तक रहेगा। सिविल लाइन्स स्थित धार्मिक संस्थान विष्णुलोक के ज्योतिषविद पंडित ललित शर्मा के अनुसार दशहरा (विजयदशमी) आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरांत महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। इस पर्व को असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इस साल 5 अक्तूबर बुधवार को दशहरा का पावन पर्व मनाया जाएगा। दशहरा वर्ष की तीन अत्यंत शुभ तिथियों में से एक है। अन्य दो चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा तिथि हैं। दशहरा एक अबूझ मुहूर्त है, यानी इसमें बिना मुहूर्त देखे शुभ कार्य किये जा सकते हैं। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सदप्रेरणा प्रदान करता है।

इस मंत्र का करें जाप...

ज्योतिषविद पंडित ललित शर्मा के अनुसार 'विजयादशमी' के दिन भगवान श्रीराम का विधिवत पूजन करना चाहिए। ‘ओम दशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो राम: प्रचोदयात मंत्र का जाप करने से कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

शनिवार, 1 अक्तूबर 2022

प्रेरणा: 2 अक्टूबर को मनाई जाएगी 'गांधी जयंती'

प्रेरणा: 2 अक्टूबर को मनाई जाएगी 'गांधी जयंती'

सरस्वती उपाध्याय 

महात्मा गांधी भारत ही नहीं विश्व की धरोहर हैं। लोग आज भी उनसे प्रेरणा लेते हैं। इसीलिए भारत सहित दुनिया के बहुत से देशों में 2 अक्टूबर को गांधी जयंती मनाई जाती है। 2 अक्टूबर 1869 में गुजरात के पोरबंदर में मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म हुआ था। देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ाई में गांधी जी ने अहिंसा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया था। अंततः अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा तथा 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ था। दक्षिण अफ्रीका में भी बापू ने ब्रिटिश सत्ता को झुकाया था। जिसकी बदौलत देश-दुनिया में उन्हें महात्मा गांधी के नाम से जाना गया। एक अन्य मत के अनुसार स्वामी श्रद्धानन्द ने 1915 मे महात्मा की उपाधि दी थी। तीसरा मत ये है कि गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने महात्मा की उपाधि प्रदान की थी। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को रंगून रेडियो से गांधी जी के नाम जारी प्रसारण में उन्हें राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित करते हुए आजाद हिन्द फौज के सैनिकों के लिए उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएं मांगीं थीं। देश की आजादी के बाद उन्होंने कोई भी सरकारी पद लेने से इनकार कर दिया था। इसलिए देशवासियों ने उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा दिया। महात्मा गांधी भारत में सबसे अधिक सम्मानित व लोकप्रिय नेता हैं। देश में किसी भी दल की सरकार हो, सभी महात्मा गांधी के प्रति पूरा सम्मान प्रकट करती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जनप्रियता के ही कारण आज देश के सभी सरकारी कार्यालयों में उनकी तस्वीर लगी होती है, जो हर एक को शांति व अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

देश की संसद में भी महात्मा गांधी की विशाल प्रतिमा स्थापित है। जिसके समक्ष बैठकर विभिन्न दलों के सांसद अहिंसात्मक तरीके से सरकारों के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शन करते रहते हैं। भारत जैसे विशाल देश में जहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बाल गंगाधर तिलक, शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे विचारधारा के क्रांतिकारियों के रहते महात्मा गांधी ने शांति के पथ पर चलकर अंग्रेजों से देश की आजादी के लिए संघर्ष करने के लिए पूरे देश को एकजुट किया, जो उनके करिश्माई व्यक्तित्व के कारण ही संभव हो पाया था। देश की आजादी के लिए महात्मा गांधी ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। उन्होंने अपनी पारंपरिक पोशाक को भी त्याग कर शरीर पर सिर्फ एक धोती, हाथ में एक लाठी और चश्मा पहनकर आजादी के संघर्ष में अपना योगदान देने के लिए देश की जनता को जगाने अकेले ही निकल पड़े थे।

देखते ही देखते पूरे देश के लोग उनके साथ जुड़ते गए। अंततः उन्होंने अपने ही तरीके से ब्रिटिश हुकूमत को भारत छोड़कर जाने को मजबूर किया। आज महात्मा गांधी एक प्रेरणा एक प्रतीक बन चुके हैं। उनका बताया शांति का मार्ग आज पूरी दुनिया को अच्छा लग रहा है। बड़े-बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष उनके बताए मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं। उनके सिद्धांतों पर चलने का प्रयास करते हैं। देश दुनिया से आने वाला हर बड़ा नेता दिल्ली में राजघाट स्थित उनकी समाधि पर जाकर उनको श्रद्धांजलि देना नहीं भूलता है। देश में महात्मा गांधी ही एकमात्र ऐसे नेता है जिनके पूरी दुनिया में लाखों-करोड़ों चाहने वाले मौजूद है। दुनिया में जब भी कहीं युद्ध की बात आती है तो लोग अक्सर महात्मा गांधी को याद करते हैं और उनके बताए सिद्धांतों पर चलकर युद्ध को टालने का प्रयास करते हैं। इसीलिए पूरी दुनिया महात्मा गांधी को शांति का पुजारी मानती है। 

प्रति वर्ष 2 अक्टूबर को उनका जन्म दिन भारत में गांधी जयंती के रूप में और पूरे विश्व में अन्तरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के नाम से मनाया जाता है। पूरी दुनिया को शांति का सन्देश देने वाले महात्मा गाँधी को कभी भी शांति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ। हालांकि उनको 1937 से 1948 के बीच पांच बार नोबेल पुरस्कार के लिये मनोनीत किया गया था। दशकों उपरांत नोबेल समिति ने सार्वजानिक रूप से स्वीकार किया कि उन्हें अपनी इस भूल पर खेद है और यह स्वीकार किया कि पुरस्कार न देने की वजह विभाजित राष्ट्रीय विचार थे। महात्मा गांधी को यह पुरस्कार 1948 में दिया जाना था परन्तु उनकी हत्या के कारण इसे रोक देना पड़ा था। उस साल दो नए राष्ट्र भारत और पाकिस्तान में युद्ध छिड़ जाना भी एक जटिल कारण था। महात्मा गांधी भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनीतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। राजनीतिक और सामाजिक प्रगति की प्राप्ति हेतु अपने अहिंसक विरोध के सिद्धांत के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई। महात्मा गांधी ने जिस प्रकार सत्याग्रह, शांति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुए अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। 

तभी तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वर्ष 2007 से गांधी जयंती को 'विश्व अहिंसा दिवस' के रूप में मनाए जाने की घोषणा की है। गांधी जी के बारे में प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि हजार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इंसान भी धरती पर कभी आया था। विश्व पटल पर महात्मा गांधी सिर्फ एक नाम नहीं अपितु शांति और अहिंसा का प्रतीक हैं। ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी महात्मा गांधी की 30 जनवरी, 1948 को नई दिल्ली के बिड़ला भवन में नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। गांधी जी एक निष्काम कर्मयोगी थे। 

उन्होंने सदैव लोगों को सद्मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित किया। उनका मत था बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो तथा बुरा मत देखो। गांधी जी समाज में फैली छुआछूत के कट्टर विरोधी थे। गांधी जी सच्चे अर्थों में युगपुरुष थे। सत्य और अहिंसा का जो पाठ उन्होंने सिखाया वह पूरे विश्व के लिए अनुकरणीय है। उनके महान कृत्यों के कारण आज भी पूरा विश्व उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करता है। आजादी के लिए चलाए जा रहे संघर्ष काल मे महात्मा गांधी की जितनी बड़ी आवश्यकता और उपयोगिता थी वह आज भी कम नहीं हुयी है। यह इसलिए कि आज भी राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनका समाधान अस्त्र-शस्त्र से नहीं, अपितु बातचीत से ही सम्भव हो सकता है।

बुधवार, 28 सितंबर 2022

29 सितंबर को मनाया जाएगा 'वर्ल्ड हार्ट डे'

29 सितंबर को मनाया जाएगा 'वर्ल्ड हार्ट डे'

सरस्वती उपाध्याय 

हर साल दुनिया भर में हृदय रोग से लाखों लोगों की मौंत हो जाती है‌। हार्ट की समस्‍या के प्रति लोगों को जागरूक करने और मौत से बचाने के मद्देनजर वर्ल्‍ड हार्ट फेडरेशन ने ‘वर्ल्‍ड हार्ट डे’ मनाने पर विचार किया। दुनियाभर में इस दिन यह बताने का प्रयास किया जाता है कि हार्ट की बीमारियों से किस तरह खुद का बचाया जा सकता है और आखिर किन लक्षणों को देखकर तुरंत डॉक्‍टर से संपर्क करना चाहिए।आइए जानते हैं कि आखिर ‘वर्ल्‍ड हार्ट डे’ का क्‍या इतिहास है और इसे क्‍यों सेलिब्रेट करना ज़रूरी है ?

वर्ल्‍ड हार्ट डे का इतिहास...

‘वर्ल्‍ड हार्ट डे’ हर साल 29 सितंबर को मनाया जाता है।दुनियाभर में हार्ट की बीमारियों से मौत की संख्‍या बढ़ता देख विश्व स्वास्थ्य संगठन और वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन ने मिलकर वर्ल्‍ड हार्ट डे की परिकल्‍पना की। साल 1997 से 1999 तक वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन के अध्यक्ष एंटोनी बेयस डी लूना ने इस पर विचार किया और 24 सितंबर 2000 से 2011 तक इस दिन का अंतरराष्‍ट्रीय दिवस के रूप में मनाया गया। तब यह दिन सितंबर के आखिरी रविवार को मनाया जाता था।

वर्ल्‍ड हार्ट डे का महत्‍व...

दुनियाभर में हर साल करीब 17 मिलियल लोग हृदय रोग (सीवीडी) की वजह से मृत्यु के शिकार हो जाते हैं। इन मौतों का प्रमुख कारण कोरोनरी हार्ट डिजीज या स्ट्रोक रहा है। सीवीडी के बारे में एक आम गलत धारणा यह है कि यह विकसित देशों में अधिक लोगों को प्रभावित करता है, जो प्रौद्योगिकी पर अधिक निर्भर हैं और गतिहीन जीवनशैली जी रहे हैं, जबकि 80% से अधिक मौतें मध्यम आय और निम्न आय वाले देशों में होती हैं।

हार्ट डिजीज होने का मुख्‍य कारण है व्यायाम की कमी, धूम्रपान, खराब आहार आदि। इसके अलावा, उपचार के लिए धन की कमी और सही समय पर इलाज ना करा पाना भी मौत का कारण होती है। ऐसे में हर साल इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में 90 से अधिक देश हिस्सा लेते हैं और इस दिन सीवीडी के बारे में जानकारी के प्रसार के लिए प्रयास करते हैं। इसमें सरकार और संगठनों की भागीदारी अधिक होना ज़रूरी है।

बुधवार, 7 सितंबर 2022

8 सितंबर को मनाया जाएगा 'विश्व साक्षरता दिवस'

8 सितंबर को मनाया जाएगा 'विश्व साक्षरता दिवस' 

सरस्वती उपाध्याय 

हर साल 8 सितंबर को दुनियाभर में 'विश्व साक्षरता दिवस' मनाया जाता है। इसे मनाने की शुरुआत साल 1966 में हुई थी, जब यूनेस्को ने शिक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने और दुनियाभर के लोगों का इस तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिए हर साल आठ सितंबर को 'विश्व साक्षरता दिवस' मनाने का फैसला किया था। चूंकि इस बार दुनियाभर में कोरोना महामारी फैली है, इसलिए इस बार साक्षरता दिवस की थीम 'साक्षरता शिक्षण और कोविड -19: संकट और उसके बाद' पर रखी गई है। आइए जानते हैं, इस दिवस के बारे में खास बातें, जैसे कि इसे क्यों मनाया जाता है, इसका महत्व क्या है और इससे समाज में क्या बदलाव आया है। 

कब आया अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने का विचार ? 

इसे मनाने की घोषणा भले ही 26 अक्तूबर 1966 को हुई हो, लेकिन सबसे पहले इसका विचार ईरान के तेहरान में शिक्षा से जुड़े मंत्रियों के विश्व सम्मेलन के दौरान आया था। यह सम्मेलन साल 1965 में हुआ था, जिसमें निरक्षरता को खत्म करने के लिए दुनियाभर में एक जागरूकता अभियान चलाने पर चर्चा की गई थी। 

क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस ? 

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत, सामुदायिक और सामाजिक रूप से साक्षरता के महत्व पर प्रकाश डालना है। इस दिवस के माध्यम से दुनियाभर में लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है, ताकि वो अपने आने वाले कल को बेहतर बना सकें। 

साक्षरता के मामले में भारत कहां ? 

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आंकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में साक्षरता दर 77.7 फीसदी है। अगर देश के ग्रामीण इलाकों की बात करें तो वहां साक्षरता दर 73.5 फीसदी है जबकि शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 87.7 फीसदी है। साक्षरता के मामले में देश का शीर्ष राज्य केरल है, जहां 96.2 फीसदी लोग साक्षर हैं। वहीं आंध्र प्रदेश इस मामले में सबसे निचले पायदान पर है। वहां की साक्षरता दर महज 66.4 फीसदी ही है। 

पहले के मुकाबले भारत में काफी बढ़ी है साक्षरता दर...

अगर हम आजादी से वर्तमान साक्षरता दर का आंकलन करें तो स्थिति थोड़ी बेहतर नजर आती है। आजादी के बाद से देश में साक्षरता दर में 57 फीसदी की वृद्धि हुई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटिश शासन के दौरान देश में सिर्फ 12 फीसदी लोग ही साक्षर थे।

गुरुवार, 18 अगस्त 2022

कृष्ण-पक्ष की अष्टमी को मनाई जाएगी 'जन्माष्टमी'

कृष्ण-पक्ष की अष्टमी को मनाई जाएगी 'जन्माष्टमी' 

सरस्वती उपाध्याय 

हिंदू धर्म में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है‌। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं। पंचांग के अनुसार, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण-पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कृष्ण का जन्म मध्य रात्रि में हुआ था। इस लिहाज से कुछ लोग श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 18 अगस्त को मनाएंगे, वहीं उदया तिथि की गणना के अनुसार 19 अगस्त को जन्माष्टमी मनाना भी उत्तम है।

कृष्ण भगवान को पंजीरी के साथ पंचामृत का भोग बहत प्रिय है। मान्यता है कि बिना पंचामृत के श्रीकृष्ण की पूजा अधूरी रह जाती है। इस लिए इन्हें पंचामृत का भोग जरूर लगाना चाहिए।पंचामृत दूध, दही, घी, शहद, चीनी से बनकर तैयार होता है। इसे देवताओं का पेय भी कहते हैं। श्री कृष्ण पूजा में भगवान को पंचामृत का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसलिए श्री कृष्ण जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण को पंचामृत का भोग जरूर लगाना चाहिए‌। इससे भगवान कृष्ण अत्यंत प्रसन्न होते हैं तथा भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते है। जिन पर भगवान कृष्ण का आशीर्वाद होता है। उन्हें कभी किसी चीज की कमी नहीं होती। घर-परिवार में शांति बनी रहती है। नौकरी और व्यापार में तरक्की होती है। भगवान कृष्ण की कृपा से सुख समृद्धि में वृद्धि होती है। पंचामृत को चरणामृत भी कहते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि पंचामृत से प्रतिरक्षा में सुधार होता है। मस्तिष्क तेज होता है‌। पंचामृत के उपयोग से पित्त दोष भी संतुलित होता है।

बुधवार, 10 अगस्त 2022

श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाएगा 'रक्षाबंधन'

श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाएगा 'रक्षाबंधन'

सरस्वती उपाध्याय 

हर साल रक्षाबंधन का पर्व श्रावण माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस साल की पूर्णिमा तिथि 11 अगस्त को शुरू हो जाएगी। 11 अगस्त 2022 को पूर्णिमा तिथि 10 बजकर 37 मिनट पर शुरू होकर 12 अगस्त को सुबह 07 बजकर 06 मिनट पर समाप्त होगी। लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि 11 अगस्त को भद्रा है और उदया तिथि में पूर्णिमा नहीं है, इसलिए रक्षाबंधन 12 अगस्त को ही मनेगा। लेकिन लोग कई और जरूरी बातों को नजरअंदाज कर रहे हैं। पंडितों का कहना है कि इस बार 11 अगस्त को भद्रा होने के बावजूद बहनें भाईयों को राखी बांध सकती हैं।

आइए जानते हैं इसके पीछे का कारण...


रक्षाबंधन पर भद्रा रहेगी या नहीं ? 

ज्योतिषी प्रवीण मिश्रा के मुताबिक, शास्त्रों के अनुसार दूसरे दिन भी अगर पूर्णिमा यानी उदयातिथि के दिन है और उस दिन अगर पूर्णिमा तीन मुहूर्त तक है, तो हमें दूसरे दिन रक्षाबंधन मनाना चाहिए। लेकिन अगर त्रिमुहूर्त व्यापनी दिन तक नहीं है तो अगले दिन राखी नहीं मनानी चाहिए। इस हिसाब से 11 अगस्त को रक्षाबंधन मनाया जाना चाहिए। इस बार 11 अगस्त को रक्षाबंधन पर भद्रा का साया है। पहले ये जानना जरूरी है कि भद्रा क्या है? भद्रा समय का नाम है, जिसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं करते हैं। ऐसी मान्यता है कि उस समय अगर आप कुछ अच्छा काम करते हैं तो उस समय वह कार्य खराब हो जाता है। इस बार जिस समय पूर्णिमा तिथि लग रही है, उसी समय भद्रा की शुरूआत भी हो जाएगी। शास्त्रों के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को दोपहर में राखी बांधनी चाहिए, लेकिन दोपहर में अगर भद्रा हो तो उस समय राखी नहीं बांधनी चाहिए। इस बार भद्रा 11 अगस्त को 10 बजकर 37 मिनट पर शुरू होगी और रात 08 बजकर 53 मिनट तक रहेगी।

11 अगस्त को चंद्रमा मकर राशि में होगा और भद्रा पाताल लोक में होगी। भद्रा का प्रभाव इसलिए पृथ्वी पर ज्यादा नहीं पड़ रहा है। अगर कोई 11 अगस्त को जल्दी राखी बांधना चाहता है तो वह लोग राखी भद्रा पूंछ काल में बांध सकते हैं। भद्रा पूंछ काल का समय 11 अगस्त शाम को 05 बजकर 18 मिनट से 06 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। भद्रा मुख के समय राखी बांधना शुभ नहीं माना जाता है। इसका समय शाम को 06 बजकर 20 मिनट से रात 08 बजकर 05 मिनट तक रहेगा।

रक्षाबंधन 2022 पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त...

रक्षाबंधन पर 11 अगस्त की दोपहर 12 बजे से 12 बजकर 53 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा। इस 53 मिनट के शुभ मुहूर्त में आप भाई की कलाई पर राखी बांध सकेंगी। दोपहर के वक्त 02 बजकर 39 मिनट से लेकर 03 बजकर 32 मिनट तक विजय मुहूर्त रहेगा। इस शुभ मुहूर्त में भी भाई को राखी बांध सकती हैं।

11 अगस्त को जब रात 08 बजकर 53 मिनट पर भद्रा समाप्त हो जाएगी, उसके बाद आप रात 9 बजकर 50 मिनट तक राखी बांध सकते हैं। क्योंकि रात 08 बजकर 53 मिनट से रात 9 बजकर 50 मिनट तक प्रदोष काल रहेगा। वह समय भी राखी बांधने के लिए शुभ रहेगा। चूंकि, कुछ इलाकों में परंपरा है कि उदयातिथि में ही रक्षाबंधन मनाते हैं‌ अगर 12 अगस्त को आप राखी मनाना चाहते हैं, तो सुबह 7 बजे तक राखी बांधनी है।

रविवार, 17 जुलाई 2022

कृष्ण-पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है 'शिवरात्रि'

कृष्ण-पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है 'शिवरात्रि'

सरस्वती उपाध्याय
सावन शिवरात्रि का दिन भगवान भोलेनाथ के लिए सर्वोत्तम होता है। भगवान शिव को समर्पित सावन का पवित्र माह 14 जुलाई से आरंभ हो गया है। हर सावन माह के कृष्ण-पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि मनाई जाती है। इस दिन व्रत रखकर भगवान शिव की विधिवत पूजा की जाती है। इससे भगवान शिव अति प्रसन्न होकर भक्तों के सारे दुःख दर्द दूर करते है। उनकी हर इच्छा पूरी होने का आशीर्वाद देते हैं।
इस बार चतुर्दशी तिथि दो दिन पड़ रही है। ऐसे में सावन शिवरात्रि का व्रत जुलाई को रखा जायेगा या फिर 27 जुलाई को। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार सावन शिवरात्रि का व्रत 26 जुलाई को रखा जायेगा और इस व्रत का पारण 27 जुलाई को किया जाएगा।

सावन शिवरात्रि पूजा की अवधि: 42 मिनट।

सावन शिवरात्रि व्रत पूजा के दौरान न करें ये गलती। भगवान शिव जी की पूजा में तुसली पत्र नहीं चढ़ाया जाता है और नहीं इनके भोग में ही तुलसी पत्र शामिल किया जाता है। इसके पीछे की मान्यता यह है कि भगवान विष्णु ने तुलसी को अपनी पत्नी स्वीकार कर लिया था।
सावन शिवरात्रि व्रत के दिन महिलाओं को खट्टी चीज नहीं खाना चाहिए। नहीं तो व्रत का पूरा पुण्य फल नहीं मिलता। सावन शिवरात्रि की पूजा में भगवान भोलेनाथ को केतकी का फूल, सिंदूर, हल्दी, कुमकुम नहीं अर्पित किया जाता। 
भगवान शिव के जलाभिषेक में केवल तांबे के लोटे का ही इस्तेमाल करें। अन्य किसी भी प्रकार के वर्तन का उपयोग नहीं किया जाता है।

बुधवार, 13 जुलाई 2022

भगवान शिव की पूजा में सक्षम नहीं है, यह चीजें

भगवान शिव की पूजा में सक्षम नहीं है, यह चीजें 

सरस्वती उपाध्याय
देवों के देव महादेव का प्रिय महीना सावन भी 14 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। हिंदू धर्म में देवी-देवाताओं को प्रसन्न करने के लिए पूजा सामग्री का विशेष महत्व है। धर्म ग्रंथों में विस्तार से बताया गया है कि किस देवता को पूजा में कौन-सी सामग्री अर्पित करनी चाहिए और किन वस्तुओं का पूजा में होना वर्जित माना जाता है। देवों के देव महादेव का प्रिय महीना सावन भी 14 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। शिवपुराण के अनुसार कुछ ऐसी सामग्री हैं। जिन्हें शिवजी की पूजा में शामिल नहीं करना चाहिए। मान्यता है, जितनी जल्दी शिव प्रसन्न होते हैं। उतनी ही तीव्र गति से उन्हें क्रोध भी आता है। आइए जानते हैं, सावन में शिवलिंग पर कौन-सी चीजें अर्पित नहीं करनी चाहिए ?

शिवलिंग पर केतकी के फूल अर्पित करने पर भगवान शिव नाराज हो जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार केतकी के फूल ने ब्रह्मा जी का झूठ में साथ दिया था, इसलिए क्रोधित होकर भगवान शिव ने श्राप दे दिया था कि उनकी पूजा में कभी केतकी के फूल का उपयोग नहीं होगा।

शिवजी की पूजा में न शंख बजाया जाता है, न ही शंख से उनका जलाभिषेक किया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने त्रिशुल शंखचूड़ नामक राक्षस का वध किया था। उसकी राख से शंख की उत्पन्न हुआ था।

सावन में भोलेभंडारी की पूजा में तुलसीदल का पत्ता भी नहीं चढ़ाया जाता। कथा के अनुसार भगवान शिव ने तुलसी के पति जालंधर का संहार किया था। तब से ही तुलसी ने खुद को भगवान शिव की पूजन सामग्री में शामिल न होने की बात कही थी।

भगवान भोलेनाथ तो वैरागी हैं, जो अपने पूरे शरीर पर राख लगाते हैं। कुमकुम और सिंदूर विवाहित महिलाएं लगाती है और पुराणों के अनुसार शिव विनाशक हैं। सावन में शिवजी की पूजा में कभी सिंदूर या कुमकुम को शामिल न करें।
भगवान शिव को छोड़कर लगभग सभी देवी-देवताओं की पूजा में हल्दी का इस्तेमाल किया जाता है। हल्दी को सौभग्य का प्रतीक माना जाता है और शिव तो वैरागी हैं। शास्त्रों के अनुसार, शिव को हल्दी चढ़ाने से चंद्रमा कमजोर होता है।

शनिवार, 9 जुलाई 2022

10 जुलाई को मनाया जाएगा 'ईद-उल-अजहा' का पर्व

10 जुलाई को मनाया जाएगा 'ईद-उल-अजहा' का पर्व 

सरस्वती उपाध्याय 
इस्लाम धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक बकरीद (ईद-उल-अजहा) का पर्व इस साल 10 जुलाई को मनाया जाएगा। बकरीद को ईद-उल-अजहा नाम से भी जानते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बकरीद का पर्व त्याग और कुर्बानी के तौर पर मनाया जाता है। बकरीद मनाने के पीछे का कारण हजरत इब्राहिम माने जाते हैं। जानिए, बकरीद का धार्मिक महत्व के साथ इतिहास...

बकरीद का इतिहास...

इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हजरत इब्राहीम अल्लाह के पैगंबर थे। एक बार अल्लाह ने उनका इम्तिहान लेना चाहिए और उनसे ख्वाब के माध्यम से कहा कि वह सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दे दें। ऐसे में हजरत इब्राहिम अपने इकलौते बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने को तैयार हो गए थे। क्योंकि वहीं एक चीज थी जिसे वह सबसे ज्यादा प्यार करते थे। ऐसे में जब हज़रत इब्राहीम अपने बेटे की कुर्बानी देने जा रहे थे तो उन्हें रास्ते में एक शैतान मिला। उसने उन्हें ऐसा करने से रोकते हुए कहा कि बेटे की कुर्बानी कौन देता है, इसकी जगह आप चाहे तो किसी जानवर को कुर्बानी दे सकते हैं। शैतान की इस बात को हज़रत इब्राहीम को सही समझा। लेकिन वह अपने अल्लाह से झूठ नहीं बोलना चाहते थे और न ही उनके हुक्म की नाफरमानी करना चाहते थे। इसलिए वे बेटे को लेकर आगे बढ़ गए। बेटे की कुर्बानी देते समय उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली ताकि बेटे का मोह अल्लाह की मांग को पूरी करने के बीच में बाधा न बने। कुर्बानी के बाद जब उन्होंने अपनी आंखों से पट्टी हटाई तो देखकर हैरान रह गए कि उनका बेटा सही सलामत खड़ा है और उसकी जगह एक बकरा कुर्बान हो गया है। उसके बाद से ही जानवरों की कुर्बानी देने का चलन शुरू हुआ।

ईद-उल-अजहा (बकरीद) पर ऐसे अदा करें नमाज़...

इस्लाम समुदाय के लोग बकरीद के दिन सूर्योदय के बाद और जुहर की नमाज से पहले ईद उल-अजहा की नमाज अदा कर सकते हैं। ईद अल-अजहा की नमाज़ में दो रकात होती हैं, जिसमें पहली रकात में सात बार तकबीर और दूसरी में पांच बार तकबीर पढ़ी जाती है। ईद की नमाज़ के लिए कोई भी अज़ान नहीं दी जाती है, बस तय वक्त में सभी लोग आकर नमाज़ अदा करते हैं।

बकरीद पर ऐसे दी जाती है कुर्बानी... 

कुर्बानी देने के लिए भी कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। इस दिन केवल स्वस्थ पशुओं की कुर्बानी दी जाती है। इसके अलावा त्याग का धन ईमानदारी से अर्जित करना चाहिए। गलत तरीके से कमाया गया धन बलिदान नहीं होता है।

मंगलवार, 5 जुलाई 2022

शुक्ल-पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है, वैवस्वत सप्तमी

शुक्ल-पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है, वैवस्वत सप्तमी

सरस्वती उपाध्याय 
वर्ष 2022 में वैवस्वत सप्तमी 6 जुलाई 2022, बुधवार को पड़ रही है। हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल-पक्ष की सप्तमी तिथि को वैवस्वत सप्तमी मनाई जाती है। सूर्यपुत्र वैवस्वत मनु ही मनु स्‍मृति के रचयिता हैं। यह दिन सूर्य देव की उपासना करने हेतु विशेष महत्व का बताया जाता है। सूर्य पुत्र वैवस्वत मनु की पौराणिक इस प्रकार है- मत्स्य पुराण के अनुसार, सत्यव्रत नाम के राजा एक दिन कृतमाला नदी में जल से तर्पण कर रहे थे। उस समय उनकी अंजुलि में एक छोटी-सी मछली आ गई। सत्यव्रत ने मछली को नदी में डाल दिया तो मछली ने कहा कि इस जल में बड़े जीव-जंतु मुझे खा जाएंगे। 
यह सुनकर राजा ने मछली को फिर जल से निकाल लिया और अपने कमंडल में रख लिया और आश्रम ले आए। रात भर में वह मछली बढ़ गई। तब राजा ने उसे बड़े मटके में डाल दिया। मटके में भी वह बढ़ गई तो उसे तालाब में डाल दिया अंत में सत्यव्रत ने जान लिया कि यह कोई मामूली मछली नहीं, जरूर इसमें कुछ बात है। तब उन्होंने ले जाकर समुद्र में डाल दिया। 
समुद्र में डालते समय मछली ने कहा कि समुद्र में मगर रहते हैं, वहां मत छोड़िए। लेकिन राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि आप मुझे कोई मामूली मछली नहीं जान पड़ती है। आपका आकार तो अप्रत्याशित तेजी से बढ़ रहा है, बताएं कि आप कौन हैं ? तब मछली रूप में भगवान विष्णु ने प्रकट होकर कहा कि आज से सातवें दिन प्रलय (अधिक वर्षा से) के कारण पृथ्वी समुद्र में डूब जाएगी।
तब मेरी प्रेरणा से तुम एक बहुत बड़ी नौका बनाओ। जब प्रलय शुरू हो तो तुम सप्त ऋषियों सहित सभी प्राणियों को लेकर उस नौका में बैठ जाना तथा सभी अनाज उसी में रख लेना। अन्य छोटे बड़े बीज भी रख लेना। नाव पर बैठ कर लहराते महासागर में विचरण करना। प्रचंड आंधी के कारण नौका डगमगा जाएगी। तब मैं इसी रूप में आ जाऊंगा। तब वासुकि नाग द्वारा उस नाव को मेरे सींग में बांध लेना। 
जब तक ब्रह्मा की रात रहेगी, मैं नाव समुद्र में खींचता रहूंगा। उस समय जो तुम प्रश्न करोगे मैं उत्तर दूंगा। इतना कह मछली गायब हो गई। राजा तपस्या करने लगे। मछली का बताया हुआ समय आ गया। वर्षा होने लगी। समुद्र उमड़ने लगा। तभी राजा ऋषियों, अन्न, बीजों को लेकर नौका में बैठ गए। और फिर भगवान रूपी वही मछली दिखाई दी। उसके सींग में नाव बांध दी गई और मछली से पृथ्वी और जीवों को बचाने की स्तुति करने लगे। 
मछली रूपी श्री विष्णु ने उसे आत्मतत्व का उपदेश दिया। मछली रूपी विष्णु ने अंत में नौका को हिमालय की चोटी से बांध दिया। नाव में ही बैठे-बैठे प्रलय का अंत हो गया। यही सत्यव्रत वर्तमान में महाकल्प में विवस्वान या वैवस्वत (सूर्य) के पुत्र श्राद्धदेव के नाम से विख्यात हुए तथा वैवस्वत मनु के नाम से भी जाने गए।

सोमवार, 4 जुलाई 2022

रक्‍त संचार को बेहतर करने में मदद, कपालभाति

रक्‍त संचार को बेहतर करने में मदद, कपालभाति

सरस्वती उपाध्याय
कपालभाति फोर्सफुली एग्जेलेशन या सांस छोड़ने की क्रिया है, जो पूरे शरीर में रक्‍त संचार को बेहतर करने में मदद करता है। शरीर में अगर कहीं नर्व दब रही है या कहीं रक्‍त के संचार में गड़बड़ है, तो आप कपालभाति की मदद से इसे ठीक कर सकते हैं। लेकिन, इसे करते वक्‍त काफी सावधानियां भी बरतने की ज़रूरत होती है। अगर आपको पेट से जुड़ी कोई समस्‍या है तो इसे ना करें। यही नहीं, प्रेग्नेंसी में भी कपालभाति नहीं करनी चाहिए। अगर आप हार्टके मरीज हैं, तो डॉक्‍टर की सलाह पर धीमी गति से ही इसे करें। अगर आप कोविड से रिकवर कर रहे हैं और आपके फेफड़े कमजोर हैं, तो भी इसे करते वक्‍त बहुत अधिक सावधानियां बरतने की ज़रूरत है।
इन बातों को रखें ख्‍याल
-पहला नियम है कि कपालभाति का अगर आप अच्‍छा प्रभाव चाहते हैं, तो आप इसे पद्मासन की मुद्रा में करें, लेकिन अगर आप पद्मासन नहीं लगा पाते हैं, तो अर्ध पद्मासन में बैठकर इसे कर सकते हैं।
-दूसरा नियम है कि आपकी कमर, गर्दन सीधी होनी चाहिए।अगर आप कुर्सी पर बैठकर इसे कर रहे हैं, तो कमर को सीधा करके ही इसे करें।
-कपालभाति फोर्सफुली एग्जेल करना है, जिसमें तेजी से नाक से हवा को बाहर निकालने का अभ्‍यास किया जाता है।
-बहुत लोग पेट पर प्रेशर लगाकर इसे करते हैं, तो ये गलत तरीका है। आपको केवल नाक से तेजी से वायू को लय में निकालना है। इस वीडियो को आप यहां दिए गए लिंक पर देख सकते हैं।
कपालभाति कैसे करें
-पहला चक्र 2 मिनट का करना है। इसे करने के लिए आप पद्मासन में बैठें और नाक से वायू को तेजी से बाहर निकालें। 2 मिनट पूरा होने पर गहरी सांस लें और रिलैक्‍स करें।
-दूसरा चक्र करने के लिए गहरी सांस लें और छोड़ें फिर गहरी सांस लें और फोर्सफुली कपालभाति करें। पूरा अभ्‍यास आप वीडियो लिंक पर देख सकते हैं।

रविवार, 3 जुलाई 2022

सावन महीने में 'भोलेनाथ' की पूजा का बहुत महत्‍व

सावन महीने में 'भोलेनाथ' की पूजा का बहुत महत्‍व  

सरस्वती उपाध्याय 
सावन मास को सभी हिंदू महीनों में सबसे ज्‍यादा पवित्र माना गया है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित है। इसी महीने से संसार को चलाने वाले भगवान विष्‍णु 4 महीने के लिए निद्रालीन हो जाते हैं। तब भगवान शिव सृष्टि का संचालन संभालते हैं। सावन महीने में भोलेनाथ की पूजा का बहुत महत्‍व है। यह शिव जी को प्रसन्‍न करन के लिए उत्‍तम समय होता है। उस पर सावन महीने के सोमवार को और भी ज्‍यादा महत्‍व दिया गया है।
इस साल सावन महीना 14 जुलाई 2022 से शुरू होगा और 12 अगस्‍त 2022 तक चलेगा। इस दौरान पहला सावन सोमवार 18 जुलाई 2022 को, दूसरा सावन सोमवार 25 जुलाई 2022 को, तीसरा सावन सोमवार 1 अगस्त 2022 को, चौथा सावन सोमवार 8 अगस्त 2022 को और पांचवा सावन सोमवार व्रत 12 अगस्त 2022 को रखा जाएगा। सावन महीने के पांचों सोमवार को व्रत रखा जाएगा।
सावन सोमवार के दिन सुबह जल्‍दी स्‍नान करके साफ कपड़े पहनें। इसके बाद दाएं हाथ में जल लेकर सावन सोमवार व्रत का संकल्‍प लें। फिर भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक करें।शिव जी को पंचामृत (दूध, दही, घी, अमृत, शहद) अर्पित करें।शिव जी को सफेद चंदन, अक्षत, सफेद फूल, धतूरा, बेल, बेल पत्र सुपारी आदि अर्पित करें। इस दौरान ॐ नमः शिवाय, मंत्र का जाप करें। धूप-दीप दिखाएं।भगवान को फल और मिठाई का भोग लगाएं। संभव हो तो जनेऊ और वस्‍त्र भी अर्पित करें। सावन सोमवार व्रत की कथा पढ़ें।आखिर में आरती करें और प्रसाद बांटें। यह व्रत पूरे दिन फलाहार लेकर रखना अच्‍छा माना जाता है। वहीं कुछ लोग एक समय भोजन करके भी यह व्रत करते हैं।

गुरुवार, 23 जून 2022

महत्व: 24 जून को मनाईं जाएंगी 'योगिनी एकादशी'

महत्व: 24 जून को मनाईं जाएंगी 'योगिनी एकादशी' 

सरस्वती उपाध्याय     
हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत अधिक महत्व होता है। हर माह में दो बार एकादशी तिथि पड़ती है। एक कृष्ण-पक्ष में और एक शुक्ल-पक्ष में। साल में कुल 24 एकादशी पड़ती हैं। आषाढ़ माह के कृष्ण-पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को योगिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को अतिप्रिय होती है। इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। इस बार 24 जून को योगिनी एकादशी मनाईं जाएंगी। हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के कृष्ण-पक्ष की एकादशी का प्रारंभ 23 जून, गुरुवार को रात 09 बजकर 41 मिनट से हो रहा है। एकादशी तिथि 24 जून, शुक्रवार को रात 11 बजकर 12 मिनट पर समाप्त होगी। उदयातिथि की मान्यता अनुसार, एकादशी व्रत 24 जून, शुक्रवार को रखा जाएगा। भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। आइए जानते हैं, योगिनी एकादशी पूजा-विधि, शुभ मुहूर्त और सामग्री की पूरी लिस्ट...

योगिनी एकादशी 2022 का शुभ मुहूर्त...

योगिनी एकादशी के दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 56 मिनट से दोपहर 12 बजकर 51 मिनट तक रहेगा। इस दिन ज्येष्ठा नक्षत्र सुबह 06 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 05 बजकर 24 मिनट से सुबह 08 बजकर 04 मिनट तक रहेगा। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04 बजकर 04 मिनट से सुबह 04 बजकर 44 मिनट तक रहेगा।

योगिनी एकादशी 2022 व्रत पारण का समय...

योगिनी एकादशी व्रत का पारण 25 जून, शनिवार को किया जाएगा। व्रत पारण का शुभ समय सुबह 05 बजकर 41 मिनट से सुबह 08 बजकर 12 मिनट के बीच रहेगा।

योगिनी एकादशी की पूजा-विधि...

सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।

घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।

भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें।

भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।

अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।

भगवान की आरती करें। 

भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं। 

इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।

इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।

एकादशी पूजा की सामग्री लिस्ट...

श्री विष्णु जी का चित्र अथवा मूर्ति
पुष्प 
नारियल 
सुपारी
फल
लौंग
धूप
दीप
घी 
पंचामृत 
अक्षत
तुलसी दल
चंदन 
मिष्ठान।

मंगलवार, 14 जून 2022

महत्व: 15 जून को मनाई जाएंगी 'मिथुन संक्रांति'

महत्व: 15 जून को मनाई जाएंगी 'मिथुन संक्रांति'

सरस्वती उपाध्याय
सूर्य का मिथुन राशि में प्रवेश करने की स्थिति सूर्य की मिथुन संक्रांति कहलाती है। मिथुन संक्रांति के दिन सूर्यदेव की पूजा का विधान है। वहीं, इस बार मिथुन संक्रांति 15 जून 2022 (बुधवार) को मनाई जाएंगी। एक साल में 12 संक्रांति होती हैं। जिसमें सूर्य अलग-अलग राशि और नक्षत्र में विराजमान होते है। सूर्य का मिथुन राशि में प्रवेश करने की स्थिति सूर्य की मिथुन संक्रांति कहलाती है। मिथुन संक्रांति के दिन सूर्यदेव की पूजा का विधान है। माना जाता है कि इसी दिन से वर्षा ऋतु की शुरूआत हो जाती है। साथ ही लोग इस दिन अच्छी फसल के लिए भगवान से अच्छी बारिश की मनोकामना करते हैं। इसे रज संक्रांति भी कहा जाता है।

त्योहार की तरह मनाई जाती है‌ मिथुन संक्रांति...

उड़ीसा में इस दिन को त्योहार की तरह मनाया जाता है। जिसे राजा परबा कहा जाता है। यहां ये चार दिन पहले से ही शुरु हो जाता है। जिसमें भू देवी यानी धरती माता की विशेष पूजा की जाती है। इस त्योहार में महिलाओं के साथ कुंवारी लड़कियां भी अच्छे वर की कामना के लिए हिस्सा लेती हैं। चार दिन तक चलने वाले इस पर्व में पहले दिन को पहिली राजा, दूसरे दिन को मिथुन संक्रांति या राजा, तीसरे दिन को भू दाहा या बासी राजा और चौथे दिन को वसुमती स्नान कहा जाता है।

क्यों की जाती है सिलबट्‌टे की पूजा ?
मान्यताओं के अनुसार जैसे महिलाओं को हर महीने मासिक धर्म होता है, जो उनके शरीर के विकास का प्रतिक है वैसे ही ये तीन दिन भू देवि यानी धरती मां के मासिक धर्म वाले होते हैं जो कि पृथ्वी के विकास का प्रतीक है। वहीं चौथा दिन धरती के स्नान का होता है। जिसे वसुमती गढ़ुआ कहते हैं।
सिलबट्‌टे को धरती माता का रूप माना गया है। इसलिए इन तीन दिनों में इसका उपयोग नहीं करना चाहिए। चौथे दिन सिलबट्‌टे को जल और दूध से स्नान कराया जाता है। फिर चंदन, सिंदूर और फूल से भू देवी यानी सिलबट्‌टे की पूजा की जाती है। इस दिन दान का बहुत महत्व है। गेहूं, गुड़, घी, अनाज आदि का दान करना चाहिए।

शुक्रवार, 10 जून 2022

साल का 'आखिरी बड़ा मंगल' 14 जून को हैं

साल का 'आखिरी बड़ा मंगल' 14 जून को हैं 

सरस्वती उपाध्याय  
ज्येष्ठ मास का बड़ा मंगल हनुमान की पूजा के लिए खास माना जाता है। इस साल का आखिरी बड़ा मंगल 14 जून को है। बता दें कि हिंदू मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ माह का प्रत्येक मंगलवार बड़ा मंगल होता है। बड़ा मंगल को हनुमान की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन हनुमान की पूजा करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
कहा जाता है कि जो भक्त ज्येष्ठ मास में हनुमान जी की विधिवत पूजा उपासना करता है, उन्हें विशेष लाभ प्राप्त होता है। साथ ही उनकी पूजा से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह का अंतिम मंगल 14 जून को है। इस दिन हनुमान भक्त बड़े धूम-धाम से उनकी पूजा करेंगे। लोगों में लड्डू, पुड़ी, हलुवा, चना एवं शरबत आदि का वितरण किया जाएगा।

बड़े मंगल पर करें ये उपाय...
कहा जाता है कि बड़ा मंगल को मसूर की दाल को बहते जल में प्रवाहित करने से भक्तों पर हनुमान जी की कृपा अति शीघ्र होती है। इससे भक्तों के जीवन चल रही सारी समस्या से मुक्ति मिल जाती है। घर परिवार में शांति और खुशहाली का माहौल कायम रहता है।
बड़े मंगलवार के दिन हनुमान को गुड़ से बना हुआ पुआ का भोग लगाना चाहिए। इससे भक्तों की हर इच्छा पूरी होती है. बड़े मंगल को जरुरतमंदों की मदद करने से घर में बरकत रहती है। बड़े मंगल के दिन जरूरतमंद और गरीब लोगों को जल और सर्बत पिलाने से हनुमान की कृपा बनी रहती है।
बड़े मंगल को मीठे पान का भोग लगाना उत्तम माना गया है। ऐसा करने से नौकरी और बिजनेस से जुड़ी सारी समस्या का समाधान हो जाता है।

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